इफिसियों 1:3
पाठ
पौलुस अपनी चिट्ठी की औपचारिक अभिवादन के तुरंत बाद रुककर परमेश्वर की स्तुति में फूट पड़ता है: "हमारे परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह के पिता का धन्यवाद हो कि उसने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आत्मिक आशीष दी है।" यह कोई प्रार्थना की माँग नहीं है, कोई विनती नहीं कि परमेश्वर कुछ दें; यह एक घोषणा है कि वे पहले ही दे चुके हैं। क्रिया भूतकाल में है, बीत चुके काम की तरह। और आशीष की जगह भी अजीब है: पृथ्वी पर गोदाम में नहीं, बल्कि "स्वर्गीय स्थानों में", वहाँ जहाँ मसीह जी उठकर बैठाए गए हैं, जैसा पौलुस इसी अध्याय के बीसवें पद में कहेगा। पूरा वाक्य एक ही धुरी पर घूमता है: मसीह में।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि पौलुस परमेश्वर को कैसे पुकारता है: "प्रभु यीशु मसीह के पिता।" यह कोई सजावटी उपाधि नहीं। परमेश्वर की पहचान अब पुत्र से अलग करके नहीं बताई जा सकती, और हमारी आशीष भी नहीं। "सब प्रकार की आत्मिक आशीष" का अर्थ यह नहीं कि हमें हर तरह की सुख-सुविधा मिलेगी; इसका अर्थ है कि जो कुछ परमेश्वर अपने पुत्र को देते हैं, उसमें हमें भी हिस्सा मिला है, क्योंकि हम उसमें हैं। चुनाव, गोद लेना, क्षमा, विरासत, आत्मा की छाप, आगे के पद यही खोलते हैं। यहाँ धर्मशास्त्र का दिल धड़कता है: उद्धार कोई वस्तु नहीं जो मसीह हमें थमा दें और चले जाएँ, बल्कि एक स्थान है, एक व्यक्ति के भीतर होना। इसीलिए यह आशीष हमारे प्रदर्शन पर नहीं, उनकी स्थिति पर टिकी है।
मूल धागा
"आशीष" शब्द बाइबल में कोई हल्का शब्द नहीं है। उत्पत्ति की शुरुआत में परमेश्वर सृष्टि को आशीष देते हैं, फिर मनुष्य के पाप के बाद शाप का लंबा साया पड़ता है, और तब अब्राहम को बुलाकर परमेश्वर वादा करते हैं कि उसके द्वारा पृथ्वी के सब कुल आशीष पाएँगे। पूरा पुराना नियम उसी वादे की धीमी, टेढ़ी-मेढ़ी यात्रा है: भूमि, संतान, मंदिर, राजा, सब आशीष के छोटे-छोटे किश्त। पौलुस यहाँ कहता है कि किश्तें खत्म हुईं। "सब प्रकार की आत्मिक आशीष" एक ही व्यक्ति में जमा कर दी गई है, और वह व्यक्ति क्रूस पर शाप बनकर मरा और जी उठकर स्वर्गीय स्थानों में बैठा है। इसीलिए दसवें पद में पौलुस कहता है कि परमेश्वर "सब कुछ वह मसीह में एकत्र करे।" इतिहास बिखरा हुआ नहीं है; वह एक केंद्र की ओर खिंच रहा है, और वह केंद्र एक नाम रखता है।
दर्पण
हममें से ज्यादातर लोग आशीष को गिनते हैं जैसे बैंक बैलेंस गिनते हैं: नौकरी टिकी रही, रिपोर्ट साफ आई, बच्चा ठीक-ठाक निकल गया। और जिस दिन ये चीजें बिगड़ती हैं, उस दिन भीतर एक चुपचाप सवाल उठता है कि क्या परमेश्वर अब भी मेरे पक्ष में हैं। यह पद उस हिसाब-किताब को उलट देता है। आपकी सबसे गहरी संपत्ति उस जगह रखी है जहाँ बीमारी, मंदी, बदनामी या तलाक का कागज पहुँच ही नहीं सकता, क्योंकि वह "स्वर्गीय स्थानों में" मसीह के पास है। इसका मतलब यह नहीं कि आपका नुकसान छोटा है; इसका मतलब यह है कि नुकसान आपकी पहचान नहीं छू सकता। आज दस मिनट निकालिए, कागज पर लिखिए कि इस समय आप किस चीज के खोने से सबसे ज्यादा डरते हैं, और फिर उसके नीचे लिखिए: "यह मेरी आशीष नहीं है, मसीह मेरी आशीष है", और उसे ऊँची आवाज में पढ़िए।
प्रश्न
अगर सब आशीष पहले ही दी जा चुकी हैं, तो हम माँगते क्यों हैं? और उससे भी चुभने वाला सवाल: वे मसीही जो भूख में मरते हैं, जो जेल में सड़ते हैं, जिनकी प्रार्थना का कोई जवाब नहीं आता, क्या वे भी "सब प्रकार की आत्मिक आशीष" के मालिक हैं? पौलुस खुद कैद से यह चिट्ठी लिख रहा है, इसलिए उसे भोला नहीं कहा जा सकता। वह यह नहीं कहता कि दुख आशीष का खंडन करता है, और न ही यह कि दुख असल में आशीष है। वह बस आशीष को कहीं और रख देता है, वहाँ जहाँ हमारे हाथ अभी नहीं पहुँचते। यह उत्तर आराम से ज्यादा एक चुनौती है: विश्वास का अर्थ है उस धन पर भरोसा करना जिसकी रसीद तो है, पर जिसका खजाना अभी दिखता नहीं।
मुख्य पात्र
इस पद में सक्रिय एकमात्र पात्र परमेश्वर हैं, और उनका एक ही काम बताया गया है: उन्होंने दिया। कोई शर्त नहीं, कोई सौदा नहीं, कोई पूर्व-योग्यता नहीं। वे पहले "प्रभु यीशु मसीह के पिता" हैं और उसी रिश्ते के भीतर हमारे परमेश्वर। यही उनके चरित्र की कुंजी है: वे पिता हैं, और पिता होना उनका अस्थायी मूड नहीं, उनका शाश्वत स्वभाव है। जो परमेश्वर अनंत से पुत्र को प्रेम करते आए हैं, वे उस प्रेम की धारा को अब बाहर की ओर मोड़ देते हैं। इसलिए उदारता उनके लिए कोई प्रयास नहीं; वह उनका होना है। और यही कारण है कि पौलुस का पहला प्रतिसाद तर्क नहीं, धन्यवाद है। ऐसे परमेश्वर के सामने विश्लेषण से पहले स्तुति आती है।
श्रोताओं का चित्र
इफिसुस में अर्तिमिस का विशाल मंदिर खड़ा था, और शहर जादू-टोने, ताबीजों और आत्मिक शक्तियों के डर से भरा था। लोग "आशीष" खरीदते थे: सही मंत्र, सही देवता, सही कीमत। इस माहौल में जब कोई सुनता है कि आशीष "स्वर्गीय स्थानों में" रखी है, तो उसके कान खड़े हो जाते हैं, क्योंकि यही तो वह जगह है जहाँ वे डरावनी शक्तियाँ वास करती मानी जाती थीं। पौलुस कहता है: हाँ, वही इलाका, और वहाँ अब मसीह बैठे हैं, "सब प्रकार की प्रधानता, और अधिकार, और सामर्थ्य" के ऊपर। पहले सुनने वालों के लिए यह सिर्फ मीठा वचन नहीं था, यह डर से आजादी का ऐलान था। उन्हें अब किसी शक्ति को खुश करने की जरूरत नहीं थी।
चिंतन
आप व्यवहार में किसे अपनी असली आशीष मानते हैं: वह जो आपके हाथ में है, या वह जो मसीह में सुरक्षित है? इसका उत्तर आपके पिछले सप्ताह की चिंताओं में कहाँ दिखता है?
अगर परमेश्वर पहले ही सब कुछ दे चुके हैं, तो आपकी प्रार्थना का लहजा कैसे बदलना चाहिए?
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Ephesians 1:3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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इफिसियों 1:3 का क्या अर्थ है?
इफिसियों 1:3 किस विषय में है?
इफिसियों 1:3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इफिसियों 1:3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इफिसियों 1:3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Ephesians 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आपने मसीह को कलीसिया का सिर ठहराया और हमें उसकी देह में जोड़ा। धन्यवाद कि हम अकेले नहीं, बल्कि उसी की परिपूर्णता में सम्मिलित हैं, जो सब में सब कुछ पूर्ण करता है। जहाँ हम अधूरे हैं, वहाँ वही हमें भरता है।
और सब कुछ उसके पाँवों तले कर दिया और उसे सब वस्तुओं पर शीश ठहराकर कलीसिया को दे दिया।" ध्यान दो, मसीह को सब पर प्रधान ठहराया गया, पर वह दिया किसे गया? कलीसिया को, यानी तुझे भी। जो चीज़ें आज तुझे कुचल रही हैं, वे उसके पाँवों तले हैं। और वह सिर, तुझसे अलग नहीं, तेरा अपना है।
पौलुस यहाँ प्रार्थना करता है, उपदेश नहीं देता। वह चाहता है कि तू जान ले "कि उसकी सामर्थ्य हमारी ओर जो विश्वास करते हैं, कितनी महान है।" ध्यान दे, यह सामर्थ्य कहीं दूर आकाश में नहीं, बल्कि तेरी ओर मुड़ी हुई है। वही शक्ति जिसने मसीह को कब्र से उठाया, आज तेरी थकी हुई ज़िन्दगी की ओर बह रही है। क्या तू उसे माँगता है, या अपने ही बल से लड़ता रहता है?
पिता, मेरे मन की आँखें खोल दे। बहुत बार मैं सिर्फ अपनी चिंताओं को देख पाता हूँ और भूल जाता हूँ कि तूने मुझे किस आशा के लिए बुलाया है। मुझे दिखा कि तेरी नज़र में मैं कितना कीमती हूँ, ताकि मैं फिर से भरोसे के साथ चल सकूँ।
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