1 कुरिन्थियों 2
पाठ
पौलुस कुरिन्थ में वक्तृत्व की चमक लेकर नहीं आया; उसने जानबूझकर अपना विषय सीमित कर लिया था: "तुम्हारे बीच यीशु मसीह, वरन् क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़ और किसी बात को न जानूँ।" वह निर्बलता, भय और थरथराहट के साथ बोला, ताकि विश्वास मनुष्यों के तर्क पर नहीं, परमेश्वर की सामर्थ्य पर टिके। फिर वह पलटकर कहता है कि उसके पास ज्ञान तो है, पर वह इस संसार का नहीं, बल्कि परमेश्वर का गुप्त ज्ञान है, जिसे संसार के हाकिम पहचान न सके और इसीलिए उन्होंने तेजोमय प्रभु को क्रूस पर चढ़ा दिया। यह भेद केवल पवित्र आत्मा के द्वारा खुलता है, क्योंकि जैसे मनुष्य की गहराई उसी की आत्मा जानती है, वैसे परमेश्वर की गहराई केवल परमेश्वर का आत्मा।
मूल
अध्याय की धुरी वह उद्धरण है जो पौलुस यशायाह से उठाता है: "जो आँख ने नहीं देखी, और कान ने नहीं सुनी… वे ही हैं, जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखनेवालों के लिये तैयार की हैं।" यशायाह 64 में यह पुकार निर्वासन के अंधकार से उठती थी, जहाँ भविष्यवक्ता तरस रहा था कि परमेश्वर आकाश फाड़कर उतर आएँ। पौलुस कहता है: वह उतरना हो चुका, और वह गोलगोथा में हुआ। जिसे कोई आँख अनुमान नहीं लगा सकती थी, वह एक सूली पर लटका हुआ आदमी निकला। इसीलिए अध्याय के अंत में यशायाह 40 की वह चुनौती, "प्रभु का मन किसने जाना है", उलटकर अनुदान बन जाती है: "हम में मसीह का मन है।" ज्ञान अब चढ़ाई नहीं, उपहार है, और उपहार देनेवाला आत्मा है।
सूत्र
परमेश्वर का छिपा हुआ ज्ञान अचानक प्रकट नहीं हुआ; पूरे पुराने नियम में वह पर्दे के पीछे चलता रहा। छोटा भाई चुना जाता है, बाँझ स्त्री को पुत्र मिलता है, दास मिस्र में प्रधान बनता है, दुखी सेवक की मार से चंगाई आती है। परमेश्वर की चाल हमेशा उलटी दिखी है, और मनुष्य की आँख उसे लगातार चूकती रही। इसलिए पौलुस का यह वाक्य कि हाकिमों ने "तेजोमय प्रभु को क्रूस पर" चढ़ा दिया, केवल एक ऐतिहासिक भूल नहीं बताता, बल्कि एक पुरानी आदत खोलता है। लूका भी यही कहता है कि यरूशलेम के प्रधानों ने मसीह को न पहचानकर, अनजाने में भविष्यद्वक्ताओं के वचन पूरे किए (प्रेरितों 13:27)। क्रूस वह जगह है जहाँ मनुष्य का अंधापन और परमेश्वर की योजना एक ही बिंदु पर टकराते हैं, और योजना जीत जाती है।
दर्पण
हम में से बहुत लोग विश्वास को तर्क के सहारे खड़ा रखना चाहते हैं। दफ्तर में बुद्धिमान दिखना, समूह में सबसे अच्छा उत्तर देना, बच्चों के सवालों का जवाब ऐसा देना कि हम कमजोर न लगें। पौलुस "निर्बलता और भय के साथ, और बहुत थरथराता हुआ" कुरिन्थ गया, और यही उसकी सेवकाई की सबसे मजबूत बात निकली। यह सोचिए कि आपने पिछली बार कब किसी के सामने माना कि आप नहीं जानते। वह क्षण शर्म का नहीं, जगह बनाने का था, क्योंकि जहाँ हमारी चतुराई खत्म होती है वहीं आत्मा का प्रमाण शुरू होता है। साथ ही यह पद हमें डराता भी है: हाकिम धार्मिक और शिक्षित लोग थे, फिर भी चूक गए।
आज एक काम कीजिए: जिस विषय में आपने हाल ही में किसी को अपनी समझ से हराया है, उस व्यक्ति को छोटा सा संदेश भेजिए और लिखिए कि उस बात में आपको स्वयं भी पूरी स्पष्टता नहीं है।
चिंतन
अगर आपके विश्वास से "क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह" को निकाल दिया जाए, तो जो बचेगा वह परमेश्वर का ज्ञान होगा या केवल आपका अपना?
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1 Corinthians 2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 कुरिन्थियों 2 का क्या अर्थ है?
1 कुरिन्थियों 2 किस विषय में है?
1 कुरिन्थियों 2 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 कुरिन्थियों 2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 कुरिन्थियों 2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Corinthians 2 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
आत्मिक जन तो सब बातों को परखता है, परन्तु वह स्वयं किसी से परखा नहीं जाता।" पौलुस उन लोगों से यह कह रहा था जिन्हें कुरिन्थुस की सभा में कमजोर और मूर्ख समझा जाता था। जिसके भीतर परमेश्वर का आत्मा बसता है, उसका मूल्य लोगों की राय के तराजू पर नहीं तुलता। तू आज किसकी नज़र से अपने आप को देख रहा है?
पौलुस को शब्दों की कमी नहीं थी, फिर भी वह कहता है, "जिनको हम मनुष्यों के ज्ञान की सिखाई हुई बातों में नहीं, परन्तु आत्मा की सिखाई हुई बातों में... सुनाते हैं।" सोचो, परमेश्वर की बातें समझाने के लिए भी उसे परमेश्वर पर ही निर्भर रहना पड़ा। तुम्हारी तैयारी, तुम्हारे तर्क, तुम्हारी भाषा अच्छी हो सकती है, पर किसी का दिल खोलना आत्मा का ही काम है। आज बोलने से पहले थोड़ा रुककर उससे माँग लो।
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