यशायाह 40
पाठ
निर्वासन की लंबी चुप्पी के बाद अचानक एक स्वर गूँजता है: "मेरी प्रजा को शान्ति दो, शान्ति दो!" यरूशलेम से कहा जाना है कि उसकी कठिन सेवा पूरी हुई, उसके अधर्म का दण्ड अंगीकार किया गया। फिर एक पुकारनेवाला जंगल में यहोवा के लिये राजमार्ग चौरस करने को कहता है, और घोषणा करता है कि सब प्राणी घास हैं पर परमेश्वर का वचन सदैव अटल रहेगा। अध्याय का दूसरा भाग सवालों की झड़ी है: किसने महासागर को चुल्लू से मापा, किसने यहोवा को सलाह दी? जातियाँ डोल की एक बूँद हैं, हाकिम भूसे की तरह उड़ जाते हैं। और अंत में उस थकी हुई प्रजा से, जो कहती है "मेरा मार्ग यहोवा से छिपा हुआ है," वादा किया जाता है कि जो बाट जोहते हैं वे उकाबों के समान उड़ेंगे।
मर्म
यह अध्याय दो चीज़ों को एक साथ पकड़ता है जिन्हें हम आम तौर पर अलग रखते हैं: परमेश्वर की विशालता और उनकी कोमलता। जो आकाश को मलमल के समान तानते हैं, वही "भेड़ों के बच्चों को अँकवार में लिए रहेगा।" यह दो अलग चित्र नहीं, एक ही तर्क की दो कड़ियाँ हैं। इस्राएल की शिकायत यह नहीं थी कि परमेश्वर बहुत छोटे हैं, बल्कि यह कि वे बहुत दूर हैं, इतने दूर कि "मेरा परमेश्वर मेरे न्याय की कुछ चिन्ता नहीं करता।" यशायाह का उत्तर विचित्र है: वह सांत्वना देने के लिए परमेश्वर को छोटा नहीं करता, उन्हें और बड़ा करता है। पौलुस इसी जगह से रोमियों 11 में पहुँचता है, "उसने किस से सम्मति ली," ताकि दिखाए कि परमेश्वर की योजना हमारी समझ से बड़ी है और इसीलिए भरोसेमंद है। जो साम्राज्यों को धूल की तरह तौलते हैं, उन्हें आपकी थकान उठाने में कोई कठिनाई नहीं। जिस परमेश्वर से हम डरते हैं कि वे बहुत ऊँचे हैं, वही झुकने के लिए काफ़ी बड़े हैं।
सूत्र
चारों सुसमाचार लेखक इस अध्याय के तीसरे पद पर हाथ रखते हैं। मरकुस तो अपनी पूरी पुस्तक ही इसी से शुरू करता है: जंगल में पुकारनेवाला यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला है, और जिसका मार्ग वह सुधार रहा है वह यीशु हैं। यह मामूली बात नहीं। यशायाह में जो आ रहा है वह यहोवा स्वयं हैं, "प्रभु यहोवा सामर्थ्य दिखाता हुआ आ रहा है।" सुसमाचार उस आगमन को नासरत के एक बढ़ई पर लागू करते हैं। पद 10 और 11 का जोड़ा, बदला देने वाला भुजबल और भेड़ों के बच्चों को अँकवार में लेने वाली गोद, गतसमनी और गुलगुता में एक ही देह में मिलता है। और पद 8, जिसे पतरस अपनी पहली पत्री में उठाकर कहता है कि यही अटल वचन तुम्तक सुसमाचार के रूप में पहुँचा है, बंधकों की सांत्वना को हर पीढ़ी की सांत्वना बना देता है।
दर्पण
पद 27 की शिकायत धर्मत्यागियों की नहीं, थके हुए विश्वासियों की है। यह वह आदमी है जो बीस साल से चर्च जा रहा है और जिसकी प्रार्थना बीमार माँ के लिए, बेरोज़गार बेटे के लिए, टूटती शादी के लिए बिना उत्तर के लौट आई है। वह परमेश्वर के अस्तित्व से इनकार नहीं करता; वह बस मान लेता है कि उसकी फ़ाइल कहीं खो गई है। यशायाह इस पर आँसू नहीं पोंछता, वह प्रश्न पूछता है: "क्या तुम नहीं जानते? क्या तुम ने नहीं सुना?" यानी तुम्हारी थकान झूठ नहीं है, पर तुम्हारा निष्कर्ष झूठ है। ध्यान दें, पद 31 में उड़ने के बाद दौड़ना और फिर केवल चलना आता है; यह उतार नहीं, यथार्थ है। आज ही एक काग़ज़ पर अपनी असली शिकायत एक वाक्य में लिखिए, ठीक पद 27 की भाषा में, और फिर उसके नीचे पद 28 पूरा हाथ से उतारकर ज़ोर से पढ़िए।
संदर्भ
यह अध्याय एक नई दुनिया में खुलता है। यरूशलेम गिर चुका है, मंदिर राख है, और यहूदी बेबीलोन में हैं, वहाँ जहाँ हर वसंत में मरदूक की मूर्ति को गाड़ी पर लादकर जुलूस निकाला जाता था। पद 19 और 20 का व्यंग्य इसी दृश्य पर तना है: कारीगर मूरत को इतना स्थिर कराता है "कि वह हिल न सके," क्योंकि गिरने वाला देवता शर्मनाक होता है। बंधुआ लोग उस साम्राज्य की भव्यता देखकर मान बैठे थे कि उनका परमेश्वर हार गया। यशायाह उन्हें अदालत में नहीं, स्वर्गीय दरबार में ले जाता है, जहाँ एक आदेश गूँजता है और दूत सांत्वना का समाचार लेकर निकलते हैं।
एक बारीकी
पद 2 में एक काँटा छिपा है: "यहोवा के हाथ से तू अपने सब पापों का दूना दण्ड पा चुका है।" दूना? क्या परमेश्वर ज़रूरत से ज़्यादा मारते हैं? इब्रानी शब्द का चित्र कपड़े को मोड़कर दोहरा करने का है, यानी पूरा नाप, अंत तक भरा हुआ पैमाना, कुछ बाक़ी नहीं। यह न्याय की अधिकता नहीं, न्याय की समाप्ति की घोषणा है। और यही वह जगह है जहाँ से क्रूस का तर्क निकलता है: जब दण्ड पूरा भर चुका हो, तब आगे केवल सांत्वना बचती है। ध्यान दीजिए, वाक्य कर्मवाच्य में है, "अंगीकार किया गया"; प्रजा ने अपने बल पर कुछ चुकाया नहीं, परमेश्वर ने हिसाब बंद घोषित किया।
मुख्य पात्र
इस अध्याय का नायक वह परमेश्वर है जो हुक्म देने के बजाय बहस करता है। वे तारों को नाम लेकर बुलाते हैं, उस संस्कृति के बीच जहाँ वही तारे भाग्य के देवता माने जाते थे। वे जातियों को डोल की एक बूँद कहते हैं और उसी साँस में एक थकी हुई औरत की चाल के हिसाब से धीरे धीरे चलते हैं। सबसे मार्मिक वाक्य पद 28 है: "वह न थकता, न श्रमित होता है।" यह केवल शक्ति का दावा नहीं, चरित्र का है। जो थकता नहीं, वही थके हुओं के साथ चलने को तैयार है, और उसकी बुद्धि अगम होने के कारण ही हम उसकी चुप्पी को उपेक्षा पढ़ना बंद कर सकते हैं।
चिंतन
आप किस स्थिति में चुपचाप मान बैठे हैं कि आपका मार्ग परमेश्वर से छिपा हुआ है, और वह मान्यता आपकी प्रार्थना को कैसे बदल चुकी है?
यशायाह सांत्वना के लिए परमेश्वर को छोटा नहीं, बड़ा करता है; आपके दिलासा देने के तरीक़े में इस अध्याय से क्या सुधरना चाहिए?
Isaiah में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
Isaiah: An Introduction and Commentary
A lifetime of Isaiah study distilled into one accessible volume.
Keeps the big storyline of judgment and comfort wonderfully clear.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Isaiah 40 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यशायाह 40 का क्या अर्थ है?
यशायाह 40 किस विषय में है?
यशायाह 40 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यशायाह 40 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यशायाह 40 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Isaiah 40 में आपको क्या स्पर्श करता है?
इस अंश पर अभी तक कोई अंतर्दृष्टि साझा नहीं की गई है। पहले बनें और कुछ छोड़ें: एक अंतर्दृष्टि, प्रार्थना या धन्यवाद।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें
