1 शमूएल 25:25
पाठ
अबीगैल धूल में, दाऊद के पाँवों पर, और उसके मुँह से पहला वाक्य अपने पति के बारे में है: "मेरा प्रभु उस दुष्ट नाबाल पर चित्त न लगाए; क्योंकि जैसा उसका नाम है वैसा ही वह आप है; उसका नाम तो नाबाल है, और सचमुच उसमें मूर्खता पाई जाती है।" वह बचाव नहीं करती, सफ़ाई नहीं देती, सच को ढँकती भी नहीं। और फिर वह एक छोटी-सी बात जोड़ती है जो पूरे दृश्य को मोड़ देती है: "परन्तु मुझ तेरी दासी ने अपने प्रभु के जवानों को जिन्हें तूने भेजा था न देखा था।" मैं वहाँ नहीं थी। मुझे पता होता तो यह न होता। एक वाक्य में निदान, और एक वाक्य में खुली हुई संभावना।
मूल बात
नाम और स्वभाव का यह जोड़ कुछ ऐसा खोलता है जिसे हम जल्दी से पाट देना चाहते हैं। क्या नाबाल मूर्ख इसलिए हुआ कि उसका नाम ऐसा था, या नाम उस पर चिपक गया क्योंकि वह वैसा ही जीता रहा? पाठ उत्तर नहीं देता, और शायद यही उसकी गंभीरता है। बाइबल में मूर्खता बुद्धि की कमी नहीं, हृदय की एक दिशा है: वह आदमी जो मानता है कि सब कुछ उसका है और किसी का कुछ देना नहीं। "क्या मैं अपनी रोटी-पानी… लेकर ऐसे लोगों को दे दूँ?" यह वाक्य उसका पूरा धर्मशास्त्र है। और यहाँ ठहरिए: परमेश्वर इस कठोर हृदय को तोड़ने के लिए दाऊद की तलवार नहीं चुनते, बल्कि एक स्त्री के शब्द, जो गधे पर चढ़कर पहाड़ की आड़ से उतरती है। बचाव अकसर उस दिशा से आता है जिधर हम देख ही नहीं रहे थे।
जोड़ने वाला सूत्र
अबीगैल का वाक्य इससे एक पद पहले शुरू होता है: "हे मेरे प्रभु, यह अपराध मेरे ही सिर पर हो।" वह दोष अपने ऊपर लेती है जो उसने किया ही नहीं, और उसी साँस में उस दोषी का नाम भी लेती है जिसे वह बचा रही है। यह बीच में खड़े होने का काम है, और पवित्रशास्त्र इस मुद्रा को बार-बार दोहराता है: मूसा टूटी हुई पटियाओं के बाद पर्वत पर, और अन्ततः वह जो अपराध अपने सिर पर लेकर मूर्खों के बीच खड़ा हुआ। मसीह की ओर यह इशारा खींचा हुआ नहीं है; यह पाठ के भीतर से उठता है। जहाँ कोई बीच में आकर खड़ा होता है, वहाँ तलवार रुक जाती है। और ध्यान दीजिए कि दाऊद, जो आगे चलकर राजा होगा, आज बचाया जा रहा है, अपने ही क्रोध से।
दर्पण
हम में से अधिकांश नाबाल के घर में रहते हैं, किसी न किसी रूप में। कोई ऐसा रिश्तेदार जिससे "कोई बोल भी नहीं सकता", कोई बॉस जिसकी कठोरता पर पूरा दफ़्तर चुप रहता है, या कोई पुराना झगड़ा जिसमें हम बरसों से दाऊद की तरह तलवार बाँधे चल रहे हैं और उसे न्याय कहते हैं। अबीगैल दो काम करती है जो हम शायद ही एक साथ कर पाते हैं: वह सच को नरम नहीं करती, और फिर भी विनाश को रोकने के लिए दौड़ती है। हम आमतौर पर इनमें से एक चुनते हैं। या तो हम सच बोलकर पुल जला देते हैं, या शान्ति के नाम पर झूठ ढोते रहते हैं। उसका "मैंने उन जवानों को न देखा था" इस बात की ईमानदारी है कि नुक़सान वहाँ भी होता है जहाँ हमारा इरादा नहीं था। आज एक काम कीजिए: अपने घर या काम की वह एक बात जिसे आप सालों से ढँकते आए हैं, परमेश्वर के सामने ज़ोर से, एक ही सीधे वाक्य में, बिना नरम किए कह दीजिए।
कठिन प्रश्न
पर क्या अबीगैल अपने पति को धोखा नहीं दे रही? उसने "अपने पति नाबाल से कुछ न कहा", उसके माल में से दो सौ रोटी और पाँच भेड़ें उठाईं, और बाहर जाकर उसे दुष्ट और मूर्ख कहा। पाठ इस पर कोई नैतिक टिप्पणी नहीं करता, न बचाव, न निन्दा। यह असहज है, और इसे चिकना कर देना बेईमानी होगी। कभी-कभी वफ़ादारी का अर्थ किसी को उसकी अपनी मूर्खता के परिणाम से बचाना होता है, उसकी अनुमति के बिना। पर यह सिद्धान्त नहीं बन सकता, वरना हर विश्वासघात अपने लिए यही बहाना गढ़ लेगा। पाठ हमें एक पतली रेखा पर छोड़ देता है और कहता नहीं कि वह रेखा कहाँ है। शायद इसलिए कि ऐसे क्षणों में नियम नहीं, विवेक काम आता है, और दाऊद ने उसी को धन्य कहा।
पहले सुननेवाले
जिन लोगों ने यह कहानी पहली बार सुनी, वे जानते थे कि दाऊद का घराना राजगद्दी तक पहुँचा था, और वे यह भी जानते थे कि उस घराने पर खून के दाग लगे। ऊरिय्याह का नाम उनकी स्मृति में था। इसलिए उनके कानों में यह दृश्य एक राहत की साँस था: देखो, एक बार वह रुका था। और नाबाल का नाम उनके लिए केवल नाम नहीं था; इस्राएल में मूर्ख वह था जो व्यवहार में नास्तिक है, जो मानता है कि हिसाब कभी नहीं माँगा जाएगा। भेड़ कतरने का समय फ़सल और उदारता का उत्सव था, जब मेहमान को खाली नहीं लौटाया जाता। नाबाल ने उसी दिन, उसी उत्सव में, दरवाज़ा बन्द किया। श्रोता समझ गए कि यह कंजूसी नहीं, परमेश्वर की नज़रअंदाज़ी थी।
शास्त्र की गूँज
भजन 14 कहता है कि मूर्ख अपने मन में कहता है कि कोई परमेश्वर नहीं; नाबाल इसी वाक्य का जीता-जागता रूप है, क्योंकि उसका "मेरी रोटी, मेरा पानी, मेरे पशु" किसी देनेवाले को स्वीकार नहीं करता। और पौलुस की वह चेतावनी कि बदला लेना हमारा काम नहीं, परमेश्वर का है, यहाँ कहानी के रूप में घटती है: अबीगैल दाऊद को यही याद दिलाती है, और दस दिन बाद वही होता है जो उसने कहा था। दाऊद की तलवार म्यान में रही, और फिर भी न्याय हुआ। यह जोड़ संयोग नहीं; पुराना नियम अकसर वही सिखाता है कहानी से, जो नया नियम कहता है आज्ञा से।
चिंतन के प्रश्न
किस व्यक्ति के बारे में मैंने भीतर ही भीतर यह तय कर लिया है कि "इससे कोई बोल भी नहीं सकता", और क्या वह निर्णय मेरी थकान से आया है या सचमुच सच्चाई से?
अबीगैल कहती है, "मैंने नहीं देखा था।" मेरे जीवन में इस समय क्या है जो मैं देख नहीं रहा, और मैं किससे पूछ सकता हूँ कि वह मुझे दिखाए?
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1 Samuel 25:25 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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1 शमूएल 25:25 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Samuel 25 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
अबीगैल ने पहले भेंट भेजी, फिर कहा, "तुम मेरे आगे-आगे चलो, मैं तुम्हारे पीछे-पीछे आती हूँ।" वह सिर्फ रोटी और दाखमधु भेजकर बैठी नहीं रही, वह स्वयं गई। दाऊद का क्रोध उपहारों से नहीं, उसके आमने-सामने खड़े होने से थमा। तू भी किसी टूटे रिश्ते में कुछ भेजकर काम चला रहा है? कभी-कभी जाना खुद ही पड़ता है।
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