2 पतरस 2:13
पाठ
पतरस इन झूठे उपदेशकों के बारे में कहते हैं कि जो नुकसान वे दूसरों को पहुँचाते हैं, वही अंत में उन्हीं पर लौट आएगा। उनकी पहचान यह है कि "उन्हें दिन दोपहर सुख-विलास करना भला लगता है" — यानी वे अपनी भोग-लिप्सा को छिपाने की ज़रूरत तक नहीं समझते, दिन के उजाले में, सबके सामने। और सबसे तीखी बात अंत में आती है: यह गंदगी कहीं बाहर नहीं हो रही, बल्कि कलीसिया की मेज़ पर हो रही है। "जब वे तुम्हारे साथ खाते पीते हैं, तो अपनी ओर से प्रेम भोज करके भोग-विलास करते हैं।" जिस भोजन में मसीह की देह और लहू को याद किया जाता है, उसी को वे अपनी भूख मिटाने का अवसर बना लेते हैं। पतरस इसे दो शब्द देते हैं: कलंक और दोष।
मर्म
यह पद पाप के बारे में एक ऐसी बात कहता है जो हमें असहज करती है: पाप की सज़ा हमेशा बाहर से नहीं आती, अक्सर वह पाप के भीतर से ही उगती है। "औरों का बुरा करने के बदले उन्हीं का बुरा होगा" — परमेश्वर का न्याय यहाँ कोई अलग से गिराया गया वज्र नहीं, बल्कि उस बीज की फ़सल है जो आदमी ने खुद बोया। ऊपर पद बारह में यही बात और नंगी है: "वे अपनी सड़ाहट में आप ही सड़ जाएँगे।"
और दूसरी बात, जो और भी चुभती है: परमेश्वर पाखंड को बाहरी दुश्मनों से ज़्यादा गंभीरता से लेते हैं। ये लोग कलीसिया के दुश्मन नहीं, कलीसिया के मेहमान हैं। वे प्रेम भोज में बैठते हैं, आमीन कहते हैं, और उसी मेज़ पर अपनी भूख पूजते हैं। पवित्रता का सवाल यहाँ सिद्धांत का नहीं, मेज़ पर बैठने के ढंग का है।
सूत्र
मेज़ परमेश्वर की कहानी में कभी मामूली जगह नहीं रही। फसह की रात इस्राएल ने खड़े-खड़े खाया, क्योंकि वह भोजन छुटकारे का चिह्न था। सिनै पर वाचा बाँधने के बाद पुरनिए परमेश्वर के सामने बैठकर खाते-पीते हैं। और अंत में मसीह रोटी तोड़कर कहते हैं कि यह मेरी देह है। पूरी बाइबल में भोजन वह जगह है जहाँ परमेश्वर अपने लोगों को अपने आपको देते हैं।
इसीलिए पतरस का आरोप इतना भारी है। यीशु मेज़ पर मेज़बान हैं जो खुद को परोसते हैं; ये लोग मेज़ पर बैठकर खुद को परोसे जाने की माँग करते हैं। ध्यान दीजिए, पाठ कहता है "अपनी ओर से प्रेम भोज करके" — वे मेहमान होकर मेज़बान बन बैठे हैं। जहाँ मसीह ने अपनी भूख छोड़कर हमें भरा, वहाँ ये अपनी भूख भरने के लिए दूसरों को खाली करते हैं। यही उलटी सूरत है जिसे पतरस कलंक कहते हैं।
दर्पण
सवाल यह नहीं कि आप शराब पीकर संगति में आते हैं या नहीं। सवाल यह है कि आप कलीसिया की मेज़ से क्या लेने आते हैं। क्या छोटे समूह में आपकी उपस्थिति का एक हिस्सा इसलिए है कि वहाँ अच्छे संपर्क बनते हैं, ग्राहक मिलते हैं, बेटे के लिए रिश्ता दिख सकता है? क्या आप प्रार्थना के अनुरोध सुनते समय भीतर ही भीतर सूचनाएँ इकट्ठी करते हैं? क्या आपकी सेवा का असली ईंधन यह है कि लोग आपको आत्मिक मानें?
"दिन दोपहर" वाली बात यहीं चुभती है। पाप का सबसे खतरनाक चरण वह नहीं जब हम छिपकर करते हैं, बल्कि वह जब हमें छिपाने की ज़रूरत महसूस होनी बंद हो जाती है। जब खर्च की आदत, फ़ोन पर देखी जाने वाली चीज़ें, दफ़्तर में की गई चालाकी सामान्य लगने लगे। शर्म का मर जाना विजय नहीं, सुन्नपन है।
आज का काम: अपने अगले भोजन में, अपनी थाली भरने से पहले मेज़ पर बैठे किसी एक व्यक्ति की थाली भरिए, और भरते समय मन में परमेश्वर से कहिए कि आप उनकी मेज़ पर मेहमान हैं, मालिक नहीं।
विवरण
"दिन दोपहर सुख-विलास करना" पर रुकिए। प्राचीन दुनिया में दावतें रात को होती थीं; दिन काम का समय था। दोपहर में नशे और भोग में डूबा आदमी वह था जिसने संयम का आख़िरी पर्दा भी फेंक दिया हो। यह केवल भोग का वर्णन नहीं, बेशर्मी का वर्णन है।
और यहीं पतरस एक अनदेखी सच्चाई खोलते हैं: नैतिक पतन की माप हमारे कामों से ज़्यादा हमारे शर्मिंदा होने की क्षमता से होती है। जब तक आदमी अंधेरा ढूँढ़ता है, उसके भीतर कहीं विवेक जीवित है। जब वह उजाले में वही करने लगे और उसे "भला लगे", तब सज़ा शुरू हो चुकी है। पद तेरह की सज़ा किसी भविष्य की तारीख़ पर नहीं टली; वह उसी क्षण चल रही है जब आदमी को अपनी सड़ाहट स्वादिष्ट लगने लगती है।
मुख्य पात्र
ये झूठे उपदेशक कोई नास्तिक विरोधी नहीं हैं। वे भीतर के लोग हैं, संगति में बैठने वाले, प्रेम भोज में शामिल होने वाले, शायद बोलने में सबसे प्रभावशाली। उनका आत्मिक भूगोल पतरस साफ़ खींचते हैं: भूख उनका स्वामी है, और उन्होंने उस भूख को धार्मिक भाषा पहना दी है। पद उन्नीस में वही निष्कर्ष है, "वे उन्हें स्वतंत्र होने की प्रतिज्ञा तो देते हैं, पर आप ही सड़ाहट के दास हैं।"
यह चरित्र हमें आईने की तरह डराता है, क्योंकि यह कोई राक्षस नहीं। यह वह आदमी है जिसने धीरे-धीरे अपने भीतर की आवाज़ से बहस करना छोड़ दिया। कोई एक दिन में यहाँ नहीं पहुँचता। कोई सौ छोटे समझौतों से पहुँचता है, और हर समझौते के बाद अगली बार थोड़ा आसान लगता है।
संदर्भ
पतरस यह पत्र अपने अंतिम दिनों में लिख रहे हैं, विदाई के स्वर में। पहली सदी की कलीसियाएँ घरों में जुड़ती थीं और उनका मुख्य आयोजन साझा भोजन था, जिसमें प्रभु भोज भी शामिल होता था। धनी मेज़बान भोजन देता, गरीब सदस्य भी पेट भरकर खाते; यही "प्रेम भोज" था, समानता का जीवित चिह्न।
उसी माहौल में घूमने-फिरने वाले शिक्षक आते थे, आतिथ्य के हक़दार माने जाते थे, और अच्छा बोलने वाले वक्ता को संरक्षण मिलना आम था। यहीं शोषण की गुंजाइश बनी। पद तीन में पतरस उनका असली इंजन बता देते हैं: "वे लोभ के लिये बातें गढ़कर तुम्हें अपने लाभ का कारण बनाएँगे।" मेज़ जो साझेदारी की जगह थी, उसे इन्होंने वसूली की जगह बना दिया।
चिंतन
किस बात पर मुझे पहले शर्म आती थी और अब नहीं आती, और वह बदलाव कब शुरू हुआ था?
मैं कलीसिया की मेज़ पर देने आता हूँ या लेने, और अगर कोई मुझे ध्यान से देखे तो वह क्या कहेगा?
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2 Peter 2 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
झूठे शिक्षकों के बारे में पतरस जो सबसे भारी बात कहता है, वह यह नहीं कि वे गलत हैं, बल्कि यह कि उनके कारण "सत्य के मार्ग की निन्दा की जाएगी।" उनका पाप अकेला नहीं गिरता, वह मसीह के नाम पर दाग लगाता है। आज कोई तुम्हें देखकर यीशु के बारे में राय बना रहा है। तुम्हारा जीना उसके नाम को सुंदर बना रहा है या भारी?
पिता, धन्यवाद कि आपने धर्मी लूत को, जो अधर्मियों के अशुद्ध चालचलन से दुःखी था, छुड़ा लिया। आप देखते हैं जब बुराई के बीच रहते हुए मेरा मन तड़पता है, और आप मुझे भी वहाँ से निकाल लाने में सक्षम हैं। यह जानकर मेरा मन शांत होता है।
पिता, जो मुझसे बड़े और सामर्थी हैं, वे भी दूसरों पर दोष लगाने में जल्दी नहीं करते। मुझे भी यह संयम सिखा। मेरी जीभ को थाम, जब मन किसी को नीचा दिखाने के लिए मचल उठे। मुझे नम्रता दे, ताकि मेरे शब्दों से तेरा आदर हो।
धन्यवाद, पिता, कि आपने हमारी आँखों को पाप की लालसा से छुड़ाया और हमारा मन थिर किया, जिससे हम फुसलानेवालों के जाल में न फँसें। धन्यवाद कि आपने ऐसे छल के विषय में हमें समय रहते चेताया और अपने वचन से हमें सँभाला।
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