2 थिस्सलुनीकियों 1:12
पाठ
पौलुस की प्रार्थना का अन्तिम मोड़ यही है: कि प्रभु यीशु का नाम इन सतायी हुई कलीसिया के लोगों में महिमा पाए, और वे स्वयं उसमें महिमा पाएँ। और यह सब किसी मानवीय पराक्रम से नहीं, बल्कि "हमारे परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह के अनुसार" होता है। एक वाक्य में दो दिशाएँ: मसीह हममें चमके, और हम उसमें चमकें।
मर्म
ध्यान दीजिए, पौलुस यह नहीं कहते कि हम मसीह की महिमा करें। वे कहते हैं कि उसका नाम तुम में महिमा पाए। मूल यूनानी शब्द एन्दोक्सास्थे का अर्थ है "भीतर से महिमामय होकर प्रकट होना" , जैसे दीवट के भीतर रखा दीपक दीवट को ही चमकीला बना देता है। परमेश्वर अपनी महिमा किसी दूर के आकाश में नहीं, बल्कि थिस्सलुनीके के उन साधारण, डरे हुए, सताए हुए विश्वासियों के जीवन में दिखाना चाहते हैं। और उसके बाद वह अनसुनी बात: "और तुम उसमें।" परमेश्वर अपनी महिमा बाँटने से नहीं डरते। यह अनुग्रह की चरम सीमा है, कि उद्धार केवल क्षमा पर नहीं रुकता, वह हमें महिमा में सहभागी बनाता है।
सूत्र
आदम को परमेश्वर का प्रतिरूप ठहराया गया था, और वही प्रतिरूप मिट्टी में गिरा। तब से पूरी कहानी इसी की खोज है: परमेश्वर की महिमा किसी मनुष्य में फिर कैसे बसे। मन्दिर में बादल उतरा, फिर वह चला गया। और तब एक देह में वह महिमा आकर बसी, ऐसी देह में जिसे कोड़े लगे। यशायाह ने कहा था कि परमेश्वर अपने दास में महिमा पाएँगे, और पौलुस उसी धागे को यहाँ आगे बढ़ाते हैं: अब वह महिमा उन लोगों में उतर रही है जो मसीह के हैं। पद 10 में यह "उस दिन" पूरा होगा, परन्तु पद 12 कहता है कि आज भी, अभी भी, यह प्रक्रिया चालू है। भविष्य की महिमा वर्तमान में रिसने लगी है।
आईना
तो आपके जीवन में परमेश्वर की महिमा कहाँ दिख रही है? यह प्रश्न असहज है, क्योंकि हम आमतौर पर अपने प्रभाव को नापते हैं, अपनी उपयोगिता को: कितने लोगों की मदद की, कितनी सेवा दी, दफ्तर में कैसी छवि बनी। पौलुस की प्रार्थना उस पूरे हिसाब को उलट देती है। वे नहीं कहते कि तुम्हारा नाम बढ़े; वे कहते हैं मसीह का नाम तुम में बढ़े। यानी उस बीमार पिता की देखभाल में, उस पैसे के फैसले में जहाँ आपने कम लिया ताकि दूसरा न लुटे, उस वैवाहिक चुप्पी में जहाँ आपने ताना लौटाया नहीं, वहीं वह महिमा पा रहे हैं। और "अनुग्रह के अनुसार" का मतलब है: आप इसे उत्पन्न नहीं कर सकते। आप केवल उपलब्ध हो सकते हैं।
प्रश्न
लेकिन क्या यह वाकई सच लगता है? पौलुस उन लोगों के लिए यह प्रार्थना कर रहे हैं जो पद 4 के अनुसार उपद्रव और क्लेश सह रहे हैं। बाहर से देखने वाले को उनमें महिमा नहीं, अपमान दिखता था। यहीं वह गाँठ है जिसे हम खोल नहीं सकते। परमेश्वर की महिमा और मनुष्य की टूटन एक ही जीवन में साथ कैसे रह सकती हैं? पौलुस उत्तर नहीं देते। वे बस प्रार्थना करते हैं, बार बार, "सदा", क्योंकि वे भी इसे देख नहीं पा रहे थे; वे इसे माँग रहे थे। कभी कभी विश्वास का काम यही होता है: उस महिमा के लिए प्रार्थना करना जो आपको आज अपने अन्दर बिलकुल दिखाई नहीं देती। और चुप रहना।
श्रोता
थिस्सलुनीके के वे विश्वासी बहुत नए थे, कुछ ही महीनों या वर्षों के मसीही। उनमें से अधिकांश गैर-यहूदी थे, कुछ मजदूर, कुछ दास। उन्होंने मूर्तियों के मन्दिर छोड़े थे, और उसकी कीमत सामाजिक बहिष्कार से चुकाई थी: पड़ोसियों का शक, परिवार का गुस्सा, संघों से निकाला जाना। ऐसे लोगों के कानों में "तुम महिमा पाओगे" कैसा लगा होगा? उस समाज में महिमा, यूनानी डोक्सा, का अर्थ था सम्मान, प्रतिष्ठा, वह चीज़ जो अभी उनसे छीनी जा रही थी। पौलुस उन्हें यह नहीं कहते कि सम्मान की चाह गलत है। वे कहते हैं: तुम्हारा सम्मान सुरक्षित है, केवल उसका स्रोत बदल गया है। वह अब भीड़ की राय में नहीं, मसीह के नाम में रखा है।
प्रसंग
यह पत्र लगभग 51 या 52 ईसवी में लिखा गया, कुरिन्थ से, पहले पत्र के थोड़े ही समय बाद। थिस्सलुनीके मकिदुनिया का एक व्यस्त बन्दरगाह-नगर था, रोमी सड़क पर बसा, जहाँ सम्राट की भक्ति खुलेआम फैली हुई थी। ऐसे शहर में "प्रभु यीशु" कहना राजनीतिक बयान था, क्योंकि "प्रभु" तो कैसर था। कलीसिया छोटी थी, दबाव में थी, और मसीह के दूसरे आगमन के बारे में उलझन में भी। पौलुस पूरा पहला अध्याय न्याय और आगमन पर खर्च करते हैं, और फिर उसे प्रार्थना में समेट देते हैं। यह महत्वपूर्ण है: अन्तिम बातों का सही उत्तर अटकल नहीं, प्रार्थना है। पद 11 और 12 उस भयानक चित्र के बाद का साँस लेना है।
चिंतन
आपके जीवन के किस कोने में आप चाहेंगे कि मसीह का नाम महिमा पाए, पर आपको आज वहाँ केवल अंधेरा दिखता है?
यदि आपकी प्रतिष्ठा अगले वर्ष छिन जाए, तो "तुम उसमें महिमा पाओ" इस वचन का आपके लिए क्या अर्थ बचेगा?
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2 Thessalonians 1:12 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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2 थिस्सलुनीकियों 1:12 का क्या अर्थ है?
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2 थिस्सलुनीकियों 1:12 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 थिस्सलुनीकियों 1:12 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Thessalonians 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि हमारा विश्वास ठहरा हुआ नहीं, वह "बहुत बढ़ता जाता है।" धन्यवाद उस प्रेम के लिए जो हमारी कलीसिया में एक दूसरे के लिए हर दिन और गहरा होता जा रहा है। यह बढ़ोतरी तेरा ही काम है, और इसके लिए तेरा धन्यवाद करना उचित है।
पिता, धन्यवाद कि आपने हमें बुलाया और उस बुलाहट के योग्य भी आप ही ठहराते हैं। धन्यवाद कि भलाई की जो इच्छा आपने मन में डाली, उसे आप अपनी सामर्थ्य से पूरा करते हैं, और विश्वास का हर छोटा काम आपके हाथों में फलदायी बनता है।
क्योंकि परमेश्वर के निकट यह न्याय है कि जो तुम्हें क्लेश देते हैं, उन्हें बदले में क्लेश दे।" पौलुस सताए हुए विश्वासियों से यह नहीं कहता कि बदला लो। वह कहता है, हिसाब परमेश्वर के हाथ में है। तेरा आँसू भूला नहीं गया। जो घाव किसी ने तुझे दिया, उसका लेखा वही रखता है जो सच्चा न्यायी है। तू अपने कंधे से यह बोझ उतार दे।
पौलुस दो बातें अलग करता है, "जो परमेश्वर को नहीं पहचानते" और जो "सुसमाचार को नहीं मानते।" यानी सुसमाचार सिर्फ जानने की खबर नहीं, मानने की पुकार है। और याद रख, ये शब्द सताए हुए विश्वासियों को लिखे गए थे, उन्हें डराने नहीं, दिलासा देने। बदला लेना परमेश्वर का काम है, तेरा नहीं। पर एक सवाल तेरे लिए बचा रहता है, तूने सुसमाचार को सिर्फ सुना है, या उसकी मानी भी है?
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