2 तीमुथियुस 4
पाठ
पौलुस मरने से पहले तीमुथियुस को अंतिम आदेश देता है: परमेश्वर और मसीह यीशु की उपस्थिति में, वचन का प्रचार कर, समय और असमय तैयार रह, क्योंकि एक दिन आएगा जब लोग खरा उपदेश सह नहीं सकेंगे और अपनी अभिलाषाओं के अनुसार उपदेशक चुन लेंगे। फिर आवाज़ बदल जाती है: "अब मैं अर्घ के समान उण्डेला जाता हूँ।" दौड़ पूरी हुई, मुकुट रखा हुआ है। और उसी साँस में वह अपना कोट, अपनी पुस्तकें, और मरकुस को माँगता है, क्योंकि देमास उसे छोड़ गया और पहली पेशी में कोई साथ खड़ा नहीं हुआ।
मूल बात
इस अध्याय का धड़कता हुआ केंद्र यह है कि परमेश्वर की वफ़ादारी और मनुष्य के अकेलेपन एक ही समय में सच हो सकते हैं। पौलुस झूठ नहीं बोलता: "सब ने मुझे छोड़ दिया था।" वह इसे आध्यात्मिक भाषा से ढकता नहीं। और ठीक उसके बाद कहता है: "परन्तु प्रभु मेरा सहायक रहा, और मुझे सामर्थ्य दी।" ध्यान दीजिए कि प्रभु ने उसे जेल से नहीं छुड़ाया; प्रभु ने उसे प्रचार करने की ताक़त दी। उद्धार यहाँ परिस्थिति के बदलने का नाम नहीं है, बल्कि उस राज्य तक पहुँचाए जाने का, जिसकी गारंटी वह न्यायी है जो जीवितों और मरे हुओं का न्याय करेगा। कृपा यहाँ आरामदेह नहीं, टिकाऊ है।
साझा सूत्र
"अर्घ के समान उण्डेला जाता हूँ" पौलुस की अपनी खोज नहीं है; यह मंदिर की भाषा है। पुराने नियम की बलियों के साथ दाखरस उँडेला जाता था, चुपचाप, वेदी पर, बिना किसी तालियों के। पौलुस अपने खून को मुख्य बलिदान नहीं कहता, वह उसे उस बलिदान के साथ बहाया गया अर्घ कहता है। मुख्य बलिदान मसीह का है, एक बार, सदा के लिए। शिष्य का जीवन उस पर उँडेला हुआ अनुषंग है, अर्थपूर्ण किंतु सहायक। यही पूरे शास्त्र का सूत्र है: परमेश्वर अपने लोगों को अपने काम में शामिल करते हैं, पर उनका काम मसीह के काम की जगह कभी नहीं लेता। इसलिए मुकुट "धार्मिकता का" है, कमाई का नहीं।
दर्पण
अब सीधे आपसे। "कानों की खुजली" आपके बारे में भी है। आप वह उपदेशक, वह पॉडकास्ट, वह लेखक चुनते हैं जो आपको वही कहे जो आप पहले से मानते हैं, और जिसे सुनकर आपको अपनी नौकरी, अपने पैसे या अपने पारिवारिक झगड़े में कुछ बदलना न पड़े। यह अध्याय पूछता है: पिछली बार आपने कब कोई ऐसी बात सुनी जिसने आपको असहज किया और आपने उसे सुनना बंद नहीं किया?
और देमास। वह विधर्मी नहीं बना, वह केवल "इस संसार को प्रिय" जानने लगा। कीमत बढ़ गई और उसने हिसाब लगाया। आप और मैं भी हिसाब लगाते हैं, चुपचाप: यह मित्रता, यह प्रतिष्ठा, यह सुविधा, इतनी महँगी सेवा के लायक नहीं।
फिर वह कोट। मरता हुआ प्रेरित ठंड से डरता है और किताबें चाहता है। आपकी कमज़ोरी शर्म की बात नहीं; पौलुस ने भी माँगा।
आज यह कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जो अभी अकेले संघर्ष कर रहा है, और अगले दस मिनट में उसे संदेश भेजकर पूछिए कि वह कैसा है। पौलुस ने भी बुलाया था: "मेरे पास शीघ्र आने का प्रयत्न कर।"
कठिन सवाल
पद 14 और पद 16 एक साथ पढ़ने में असहज लगते हैं। सिकन्दर के बारे में पौलुस कहता है, "प्रभु उसे उसके कामों के अनुसार बदला देगा", और अपने भागे हुए साथियों के बारे में, "भला हो, कि इसका उनको लेखा देना न पड़े"। एक ही अध्याय में न्याय की माँग और क्षमा की प्रार्थना। क्या पौलुस असंगत है?
मुझे लगता है वह ईमानदार है। जिसने जान-बूझकर विरोध किया, उसे वह परमेश्वर के हाथ में सौंपता है, अपने हाथ में नहीं; यह बदला लेने से इनकार है, बदले की कामना नहीं। जो डर के कारण भाग गए, उन्हें वह क्षमा माँगता है। पर रेखा कहाँ खिंचती है, दुष्टता और कायरता के बीच, यह पौलुस भी हमें नहीं बताता। हमें उस अंतर को परमेश्वर के न्याय पर छोड़ना होगा, जो हमसे बेहतर पढ़ता है।
एक बारीकी
"समय और असमय तैयार रह।" ग्रीक शब्द है एउकाइरोस, अच्छा अवसर, ठीक मौसम। पौलुस कहता है: सही मौसम में और ग़लत मौसम में। यह वाक्य उस आदमी का है जो जंजीरों में बैठा है और सर्दी से पहले कोट माँग रहा है, यानी जिसके लिए "असमय" कोई सैद्धांतिक बात नहीं थी। हम आमतौर पर सही क्षण की प्रतीक्षा करते हैं: जब रिश्ता ठीक हो जाए, जब मन शांत हो, जब सामने वाला ग्रहणशील दिखे। पौलुस उस प्रतीक्षा को हमारे हाथ से छीन लेता है। और साथ ही वह "सब प्रकार की सहनशीलता" जोड़ता है, ताकि असमय बोलना असंवेदनशील बोलना न बन जाए।
अंतर्पाठ
"मैं तो सिंह के मुँह से छुड़ाया गया" के साथ दिया गया संकेत दानिय्येल 6 की ओर है। दानिय्येल शेरों के बीच से जीवित निकला; पौलुस अगली पेशी में जीवित नहीं निकलेगा, फिर भी वही भाषा बोलता है। इससे साफ़ होता है कि उसके लिए छुटकारा मौत से बचना नहीं, बल्कि "अपने स्वर्गीय राज्य में उद्धार करके पहुँचाए" जाना है।
दूसरा प्रतिध्वनि: पौलुस पहले फिलिप्पियों को लिख चुका था कि वह लक्ष्य की ओर दौड़ रहा है, अभी पहुँचा नहीं। यहाँ, अंत में, वह कह सकता है: "मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है।" वही आदमी, वही दौड़, बस अब अंतिम मोड़ पर।
चिंतन
पिछले महीने आपने कौन-सी सच्ची बात सुनी जो आपको चुभी, और आपने उसके साथ क्या किया?
अगर आज आपकी दौड़ ख़त्म हो जाए, तो आपके जीवन में क्या "अर्घ के समान उण्डेला" गया कहा जा सकेगा?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस जंजीरों में है, अंत पास है, और आखिरी सांसों में वह तीमुथियुस से कहता है, "तू वचन का प्रचार कर; समय और असमय तैयार रह।" सुविधा का इंतज़ार मत कर। और ध्यान दे, डाँटने के साथ वह "सब प्रकार की सहनशीलता" जोड़ता है। सच बोलना आसान है, सच बोलकर उस इंसान के साथ धीरज से ठहरे रहना कठिन। तू किसके लिए ठहरा हुआ है?
पौलुस मृत्यु के करीब है, जंजीरों में है, और उसके मन में क्या है? नाम। "प्रिस्का और अक्विला को, और उनेसिफुरुस के घराने को नमस्कार।" उनेसिफुरुस ने रोम में उसे ढूंढ़कर ताज़गी दी थी, अब पौलुस उसके घर वालों को याद कर रहा है। अंतिम घड़ी में भी रिश्ते नहीं भूले। तुम्हारे मन में आज किसका नाम है, जिसे तुमने कब से याद नहीं किया?
पौलुस लिखता है, "क्योंकि ऐसा समय आएगा, जब लोग खरा उपदेश न सह सकेंगे पर कानों की खुजली के कारण अपनी अभिलाषाओं के अनुसार अपने लिये बहुत सारे उपदेशक बटोर लेंगे।" ध्यान दे, वे शिक्षकों को ठुकराते नहीं, बल्कि बटोरते हैं। खतरा सुनना छोड़ देना नहीं, बल्कि वही सुनना है जो मन को गुदगुदाए। आज खुद से पूछ: मैं वह सुनता हूँ जो मुझे अच्छा लगता है, या वह जो मुझे बदलता है?
पौलुस, जिसके हाथों से परमेश्वर ने अनोखे सामर्थ्य के काम किए थे, लिखता है: "त्रुफिमुस को मैंने मिलेतुस में बीमार छोड़ा।" चंगाई हर बार नहीं आई। वह अपने साथी को बीमार छोड़कर आगे बढ़ा, और यह बात उसने छिपाई नहीं। तेरी वह प्रार्थना जिसका उत्तर अब तक नहीं मिला, तुझे विश्वास से बाहर नहीं करती। परमेश्वर की नज़र में तू भूला नहीं गया है।
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