दानिय्येल 12
पाठ
दानिय्येल को अन्तिम दर्शन का अन्तिम टुकड़ा सुनाया जाता है: मीकाएल उठेगा, ऐसा संकट आएगा जैसा जातियों के इतिहास में कभी न हुआ, और जिनके नाम परमेश्वर की पुस्तक में लिखे हैं वे बच निकलेंगे। मिट्टी में सोए हुए बहुत से लोग जागेंगे, कुछ सदा के जीवन के लिये और कुछ सदा की लज्जा के लिये; बुद्धिमान तारों की तरह चमकेंगे। फिर नदी के दोनों तटों पर खड़े दो पुरुष और जल के ऊपर सन का वस्त्र पहने पुरुष के बीच वह प्रश्न उठता है जो हर सतायी हुई पीढ़ी पूछती है: "इन आश्चर्यकर्मों का अन्त कब तक होगा?" उत्तर में दिन गिने जाते हैं, और दानिय्येल को कहा जाता है: जा, ठहरा रह, विश्राम कर।
मूल बात
"नित्य होमबलि उठाई जाएगी" वाक्य पढ़ते हुए हमें कुछ महसूस नहीं होता, पर पहले सुननेवालों के लिये यह उनके संसार का ढह जाना था। यरूशलेम में सुबह और साँझ, हर दिन, बिना नागा, भेड़ का बच्चा चढ़ता था; धुएँ की वह लकीर आकाश में इस बात का चिन्ह थी कि परमेश्वर अभी भी अपनी प्रजा के बीच बसते हैं। उस धुएँ का बुझ जाना, और उसकी जगह "घिनौनी वस्तु" का खड़ा होना, इसका अर्थ था: वेदी पर अशुद्ध पशु, यूनानी सैनिक आँगन में, तोरा की पोथियाँ जलाई जा रही हैं, और खतना करानेवाली माएँ मार डाली जा रही हैं। इस अन्धकार के बीच यह अध्याय कहता है कि परमेश्वर हार नहीं गए हैं। इतिहास की आखिरी आवाज़ अत्याचारी की नहीं, बल्कि उनकी है जो नामों की पुस्तक रखते हैं।
जोड़ने वाला सूत्र
पद 2 पुराने नियम में एक दरवाज़ा खोलता है जो उससे पहले लगभग बन्द था: मुर्दों का जागना, दो दिशाओं में। जो लोग अपने विश्वास के कारण मारे जा रहे थे, उनके लिये यह सिद्धान्त नहीं, जीने का सहारा था, क्योंकि यदि मरने के बाद कुछ नहीं, तो शहीद सबसे बड़ा मूर्ख है। यही धागा सीधे यीशु मसीह के मुँह तक जाता है, जब वे कहते हैं कि कब्रों में सो रहे लोग उनकी आवाज़ सुनकर निकल आएँगे (यूहन्ना 5:28-29 इसी पद की गूँज है)। पर एक फर्क है: दानिय्येल को मुहर लगाकर पुस्तक बन्द करनी पड़ती है, जबकि मसीह के जी उठने के बाद वह मुहर टूट चुकी है। जो दानिय्येल ने दूर से सुना और "कुछ न समझा", वह ईस्टर की सुबह मिट्टी में पैरों के निशान बन गया।
दर्पण
हमारी वेदी पर सुअर नहीं चढ़ाया गया, पर हम भी उस अनुभव को जानते हैं जब जीवन का नित्य क्रम अचानक उठा लिया जाता है: नौकरी का पत्र, जाँच की रिपोर्ट, वह फोन जो रात में आता है, और वह लम्बा समय जिसमें कुछ नहीं बदलता। ध्यान दीजिए, स्वर्गदूत दानिय्येल को यह नहीं बताता कि संकट टल जाएगा; वह उसे बताता है कि संकट का अन्त है और उसका नाम सुरक्षित है। यह हमारी सबसे गहरी माँग पर चोट करती है, कि परमेश्वर हमें कष्ट से बचाएँ, और उसकी जगह कुछ कठोर पर मजबूत रखती है: वे हमें कष्ट के पार लाएँगे। और बुद्धिमानों की चमक कहीं और नहीं, "जो बहुतों को धर्मी बनाते हैं" उनमें दिखती है, यानी उन लोगों में जिन्होंने दूसरों को अन्धकार में थामे रखा। आज एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जो इस समय अपनी "साढ़े तीन काल" में से गुज़र रहा है, और उसे अभी संदेश भेजकर कहिए कि आप उसके लिये प्रार्थना कर रहे हैं।
प्रश्न
यह अध्याय दिन गिनता है: 1290, 1335. और फिर भी दानिय्येल को कहा जाता है कि बातें बन्द और मुहरबन्द हैं। यह ईमानदारी से खटकता है। यदि संख्या दी गई है, तो समझ क्यों नहीं दी गई? दो हज़ार वर्षों की गणनाएँ, नक्शे और भविष्यवाणी-तालिकाएँ इस बात की गवाही हैं कि हम इस बन्द दरवाज़े को जबरन खोलना चाहते हैं। परन्तु पाठ स्वयं दानिय्येल को गणित नहीं, धीरज सिखाता है: "क्या ही धन्य है वह, जो धीरज धरकर तेरह सौ पैंतीस दिन के अन्त तक भी पहुँचे।" शायद संख्याएँ इसलिये दी गई हैं कि हम जान लें कि कष्ट का एक छोर है, न कि इसलिये कि हम तारीख निकाल सकें। यह रहस्य आरामदेह नहीं है। पर यह हमें उन बातों की ओर लौटाता है जो खुली हैं: शुद्ध होना, समझना, ठहरे रहना।
एक बारीकी
नदी के जल के ऊपर खड़ा वह पुरुष शपथ खाते समय दोनों हाथ स्वर्ग की ओर उठाता है. प्राचीन संसार में शपथ के लिये एक हाथ उठाया जाता था; दो हाथ उठाना अतिशयोक्ति है, जैसे कोई अपनी पूरी देह से गवाही दे रहा हो। और वह किसकी शपथ खाता है? "सदा जीवित रहनेवाले की।" उन लोगों के लिये जो देख रहे थे कि उनके बूढ़े शिक्षक और जवान बेटे मारे जा रहे हैं, यह नाम ही उत्तर था: जो सदा जीवित हैं, वे मरे हुओं को जिला सकते हैं। स्वर्गदूत जानता है कि दानिय्येल के कान में यह वादा कितना असम्भव लगेगा, इसलिये वह अपनी बात को स्वर्ग की सबसे ऊँची जमानत से बाँध देता है।
मुख्य पात्र
दानिय्येल यहाँ बूढ़ा है, निर्वासन में, और वह इस दर्शन से न तो प्रबुद्ध निकलता है न विजयी। वह साफ कहता है: "यह बात मैं सुनता तो था परन्तु कुछ न समझा।" यह बाइबल के एक महान भविष्यद्वक्ता की स्वीकारोक्ति है, और यह हमें बहुत छूट देती है। वह पूछता है, उत्तर अधूरा मिलता है, और तब उसे तीन आदेश दिए जाते हैं: जा, ठहरा रह, विश्राम कर। यहाँ "विश्राम" का अर्थ मृत्यु भी है; उसे बताया जा रहा है कि वह वादे की पूर्ति देखने से पहले मर जाएगा। और फिर भी: "उन दिनों के अन्त में तू अपने निज भाग पर खड़ा होगा।" जिसने अपना देश खो दिया, उसे कब्र के उस पार एक भाग मिलेगा। दानिय्येल का विश्वास समझ पर नहीं, उस आवाज़ पर टिका है जो उसका नाम जानती है।
चिन्तन
आपके जीवन का कौन सा "नित्य" क्रम उठा लिया गया है, और आप उसकी जगह किस बात पर भरोसा रखने की चेष्टा कर रहे हैं?
दानिय्येल को "कुछ न समझा" कहने के बाद भी चलते रहने को कहा गया. आप किस अनुत्तरित प्रश्न को समझने की शर्त पर परमेश्वर की आज्ञा मानना टाल रहे हैं?
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Daniel 12 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
दानिय्येल 12 का क्या अर्थ है?
दानिय्येल 12 किस विषय में है?
दानिय्येल 12 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
दानिय्येल 12 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
दानिय्येल 12 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Daniel 12 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आपने दानिय्येल से कहा, "बहुत लोग पूछ-ताछ करेंगे और इससे ज्ञान बढ़ भी जाएगा।" जो बातें अभी मुहरबंद हैं, उन्हें आप अपने ठहराए समय पर खोलते हैं। धन्यवाद कि मेरी अनसुलझी उलझनें आपके हाथ में सुरक्षित हैं, और खोजनेवाले मन को आप ज्ञान देते हैं।
पिता, जब मुश्किलें ऐसी लगती हैं जैसी पहले कभी न देखी हों, तब याद दिला कि तू मेरे लिए खड़ा है। मेरा नाम तेरी पुस्तक में लिखा है, यही मेरा भरोसा है। डर के बीच मुझे थामे रख, और मुझे तेरे बचाने वाले हाथ पर आराम करना सिखा।
पिता, धन्यवाद कि जो बातें अन्त समय तक बन्द और मुहरबन्द हैं, वे आपके हाथ में सुरक्षित हैं। धन्यवाद कि दानिय्येल की तरह मुझे सब कुछ जानना ज़रूरी नहीं, आप कहते हैं "चला जा" और मैं भरोसे के साथ आगे बढ़ सकता हूँ। आपका समय सही है, यही मेरा चैन है।
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