बाइबल व्याख्या

सभोपदेशक 1

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

एक आवाज़ बिना भूमिका के बोल उठती है: "व्यर्थ ही व्यर्थ, व्यर्थ ही व्यर्थ! सब कुछ व्यर्थ है।" फिर वह आवाज़ हमें प्रकृति के अनवरत चक्कर दिखाती है, सूरज जो उगता और डूबता और फिर वहीं लौट जाता है, हवा जो घूमकर अपनी परिधि में आ जाती है, नदियाँ जो समुद्र को कभी भर नहीं पातीं। पीढ़ियाँ आती-जाती हैं, पृथ्वी बनी रहती है, और कुछ भी सचमुच नया नहीं है। अंत में उपदेशक अपने बारे में बताता है: उसने बुद्धि से सब कुछ खोजने में मन लगाया, और पाया कि यह भी वायु को पकड़ने जैसा है, और बुद्धि बढ़ाने से खेद ही बढ़ता है।

मर्म

यह अध्याय परमेश्वर के विषय में लगभग चुप है, और यही उसकी सबसे तीखी बात है। एक ही बार वे नाम लेकर आते हैं, और तब भी सुकून देने के लिए नहीं: "यह बड़े दुःख का काम है जो परमेश्वर ने मनुष्यों के लिये ठहराया है कि वे उसमें लगें।" यानी जीवन की यह बेचैन खोज कोई दुर्घटना नहीं, परमेश्वर की ठहराई हुई बात है। हमें ऐसा बनाया गया है कि हम अर्थ खोजें, और ऐसी दुनिया में रखा गया है जो हमारी पकड़ में नहीं आती। उपदेशक नास्तिक नहीं है; वह एक ऐसा विश्वासी है जो झूठी तसल्ली से इनकार करता है। वह हमें उस जगह खड़ा करता है जहाँ केवल परमेश्वर ही उत्तर हो सकते हैं, और अभी उत्तर नहीं देते।

जोड़नेवाला सूत्र

"जो टेढ़ा है, वह सीधा नहीं हो सकता।" यह वाक्य पूरे पुराने नियम की एक चुपचाप कराह है। मनुष्य टेढ़ेपन को सीधा नहीं कर सकता; न बुद्धि से, न परिश्रम से, न धर्म-कर्म से। सृष्टि स्वयं इस चक्र में फँसी है, वही सूरज, वही हवा, वही अधूरापन। और तब, इसी चक्र के भीतर, कोई आता है जिसके विषय में कहा जाता है कि वह सब कुछ नया कर देता है। मसीह का पुनरुत्थान इस अध्याय की एक ही पंक्ति को तोड़ता है: "सूर्य के नीचे कोई बात नई नहीं है।" खाली कब्र सूर्य के नीचे हुई एक नई बात है। पर ध्यान दीजिए, उपदेशक हमें जल्दबाज़ी से वहाँ नहीं ले जाता। पहले वह हमें खालीपन में बैठने देता है, क्योंकि जो व्यर्थता को नहीं जानता, वह छुटकारे को भी नहीं समझेगा।

दर्पण

आप सोमवार को फिर वही ईमेल खोलेंगे जो शुक्रवार को बंद किए थे। बरतन फिर धुलेंगे, बच्चे फिर वही बहस छेड़ेंगे, वेतन आकर वहीं चला जाएगा जहाँ पिछले महीने गया था। उपदेशक की नदियाँ आपके घर से होकर बहती हैं। और भीतर वह प्यास बनी रहती है: "न तो आँखें देखने से तृप्त होती हैं, और न कान सुनने से भरते हैं।" एक और वीडियो, एक और खबर, एक और पदोन्नति, और फिर भी खाली। यह पाठ आपकी उस चुपचाप उम्मीद को उघाड़ता है कि थोड़ी और मेहनत, थोड़ी और समझदारी से जीवन आखिरकार जुड़ जाएगा। नहीं जुड़ेगा। और यह जानना कड़वा है, पर यह कड़वाहट आपको उस जगह से हटाती है जहाँ आप परमेश्वर की जगह खड़े थे।

पृष्ठभूमि

आवाज़ "दाऊद के पुत्र", "यरूशलेम में इस्राएल का राजा" की है, यानी उस व्यक्ति की जिसके पास सब कुछ था: खज़ाना, सत्ता, अंतरराष्ट्रीय ख्याति वाली बुद्धि। यह किसी हारे हुए, गरीब, हाशिये पर पड़े आदमी की शिकायत नहीं है, जिसे हम आसानी से नज़रअंदाज़ कर देते। यह शिखर से आई रिपोर्ट है। प्राचीन पूर्व में राजा अपनी उपलब्धियाँ पत्थरों पर खुदवाते थे ताकि नाम बना रहे; उपदेशक ठीक उसी संस्कृति के बीच कहता है, "प्राचीनकाल की बातों का कुछ स्मरण नहीं रहा।" स्मारक भी भूल जाते हैं। जहाँ ज्ञान-साहित्य आमतौर पर वादा करता है कि बुद्धिमानी सफल जीवन देती है, वहाँ यह आवाज़ भीतर से ही उस वादे पर सवाल उठाती है।

एक बारीकी

"व्यर्थ" के लिए इब्रानी शब्द है हेवेल, जिसका मूल अर्थ है भाप, साँस, सर्दी में मुँह से निकलती वह धुँधली लकीर। यह "बेकार" नहीं कहता; यह कहता है "पकड़ में न आनेवाला"। इसीलिए अगली छवि इतनी सटीक है: "मानो वायु को पकड़ना है।" जीवन बुरा नहीं है, वह क्षणिक और फिसलनदार है। आप उसे हाथ में भरकर रख नहीं सकते। यह फर्क बहुत बड़ा है, क्योंकि "सब बेकार है" कहकर आदमी उदासीन हो जाता है, पर "सब भाप जैसा है" कहकर वह सावधान हो जाता है। भाप को पकड़ा नहीं जाता, पर उसे देखा जा सकता है, उसमें साँस ली जा सकती है। शायद यहीं से उपदेशक की बाद की सलाह उगती है: जो आज मिला है, उसे कृतज्ञता से ग्रहण करो।

अंतर्पाठ

पौलुस लिखता है कि सृष्टि "व्यर्थता के अधीन" कर दी गई, और यह अपनी इच्छा से नहीं हुआ, बल्कि अधीन करनेवाले की ओर से; और वह भी आशा के साथ (रोमियों 8)। वही शब्द, वही निदान, पर एक जोड़ी हुई दिशा: यह चक्र किसी दिन टूटेगा। दूसरी ओर भजन 90 खड़ा है, जहाँ मूसा भी पीढ़ियों के बह जाने को देखता है और तब प्रार्थना करता है कि हमें अपने दिन गिनना सिखाइए। दोनों जगह निष्कर्ष निराशा नहीं, बल्कि सजगता है। उपदेशक हमें प्रश्न देता है, बाइबल की बाकी आवाज़ें उसे न तो दबातीं हैं न झटपट सुलझातीं; वे उसके साथ चलती हैं जब तक कि उत्तर देह धारण करके न आ जाए।

चिंतन

आपके जीवन का कौन-सा चक्र इस समय आपको सबसे अधिक थकाता है, और क्या आप उसे परमेश्वर के सामने बिना समाधान माँगे रख सकते हैं?

यदि "बहुत बुद्धि के साथ बहुत खेद भी होता है", तो आप जो जानते हैं उसका बोझ आप किसके पास ले जाते हैं?

पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें

आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।

स्वीकारोक्ति

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संत अगस्तीन

अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।

उद्देश्य भरा जीवन

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रिक वॉरेन

चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।

परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास

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भाई लॉरेन्स

रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।

जंगल का छिपने का स्थान

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कोरी टेन बूम

नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।

जीसस कॉलिंग

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Ecclesiastes 1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

सभोपदेशक 1 का क्या अर्थ है?
एक आवाज़ बिना भूमिका के बोल उठती है: "व्यर्थ ही व्यर्थ, व्यर्थ ही व्यर्थ! सब कुछ व्यर्थ है।" फिर वह आवाज़ हमें प्रकृति के अनवरत चक्कर दिखाती है, सूरज जो उगता और डूबता और फिर वहीं लौट जाता है, हवा जो घूमकर अपनी परिधि में आ जाती है, नदियाँ जो समुद्र को कभी भर नहीं पातीं। पीढ़ियाँ आती-जाती हैं, पृथ्वी बनी रहती है, और कुछ भी सचमुच नया नहीं है। अंत में उपदेशक अपने बारे में बताता है: उसने बुद्धि से सब कुछ खोजने में मन लगाया, और पाया कि यह भी वायु को पकड़ने जैसा है, और बुद्धि बढ़ाने से खेद ही बढ़ता है।
सभोपदेशक 1 किस विषय में है?
"जो टेढ़ा है, वह सीधा नहीं हो सकता।" यह वाक्य पूरे पुराने नियम की एक चुपचाप कराह है। मनुष्य टेढ़ेपन को सीधा नहीं कर सकता; न बुद्धि से, न परिश्रम से, न धर्म-कर्म से। सृष्टि स्वयं इस चक्र में फँसी है, वही सूरज, वही हवा, वही अधूरापन। और तब, इसी चक्र के भीतर, कोई आता है जिसके विषय में कहा जाता है कि वह सब कुछ नया कर देता है। मसीह का पुनरुत्थान इस अध्याय की एक ही पंक्ति को तोड़ता है: "सूर्य के नीचे कोई बात नई नहीं है।" खाली कब्र सूर्य के नीचे हुई एक नई बात है। पर ध्यान दीजिए, उपदेशक हमें जल्दबाज़ी से वहाँ नहीं ले जाता। पहले वह हमें खालीपन में बैठने देता है, क्योंकि जो व्यर्थता को नहीं जानता, वह छुटकारे को भी नहीं समझेगा।
सभोपदेशक 1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आवाज़ "दाऊद के पुत्र", "यरूशलेम में इस्राएल का राजा" की है, यानी उस व्यक्ति की जिसके पास सब कुछ था: खज़ाना, सत्ता, अंतरराष्ट्रीय ख्याति वाली बुद्धि। यह किसी हारे हुए, गरीब, हाशिये पर पड़े आदमी की शिकायत नहीं है, जिसे हम आसानी से नज़रअंदाज़ कर देते। यह शिखर से आई रिपोर्ट है। प्राचीन पूर्व में राजा अपनी उपलब्धियाँ पत्थरों पर खुदवाते थे ताकि नाम बना रहे; उपदेशक ठीक उसी संस्कृति के बीच कहता है, "प्राचीनकाल की बातों का कुछ स्मरण नहीं रहा।" स्मारक भी भूल जाते हैं। जहाँ ज्ञान-साहित्य आमतौर पर वादा करता है कि बुद्धिमानी सफल जीवन देती है, वहाँ यह आवाज़ भीतर से ही उस वादे पर सवाल उठाती है।
सभोपदेशक 1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पौलुस लिखता है कि सृष्टि "व्यर्थता के अधीन" कर दी गई, और यह अपनी इच्छा से नहीं हुआ, बल्कि अधीन करनेवाले की ओर से; और वह भी आशा के साथ (रोमियों 8)। वही शब्द, वही निदान, पर एक जोड़ी हुई दिशा: यह चक्र किसी दिन टूटेगा। दूसरी ओर भजन 90 खड़ा है, जहाँ मूसा भी पीढ़ियों के बह जाने को देखता है और तब प्रार्थना करता है कि हमें अपने दिन गिनना सिखाइए। दोनों जगह निष्कर्ष निराशा नहीं, बल्कि सजगता है। उपदेशक हमें प्रश्न देता है, बाइबल की बाकी आवाज़ें उसे न तो दबातीं हैं न झटपट सुलझातीं; वे उसके साथ चलती हैं जब तक कि उत्तर देह धारण करके न आ जाए।
सभोपदेशक 1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि "बहुत बुद्धि के साथ बहुत खेद भी होता है", तो आप जो जानते हैं उसका बोझ आप किसके पास ले जाते हैं?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Ecclesiastes 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 16

सुलैमान अपने ही मन से बात करता है: "मैंने अपने मन में कहा, 'देख, जितने यरूशलेम में मुझसे पहले थे, उन सबसे मैंने बड़ी और बहुत बुद्धि प्राप्त की है।'" सब कुछ पा लिया, फिर भी मन को समझाना पड़ रहा है। जो सचमुच भरा हो, उसे अपनी उपलब्धियाँ गिनकर खुद को तसल्ली नहीं देनी पड़ती। तू रात में अपने मन से क्या कहता है?

प्रार्थना संपादकीय पर पद 18

पिता, जितना ज़्यादा मैं समझने लगता हूँ, उतना ही दिल भारी होता जाता है। दुनिया का दर्द अब मुझसे छिपा नहीं रहता। मुझे जानने से मत रोक, पर मेरे ज्ञान को तेरी शांति के साथ थाम कर रख। जो मैं समझ नहीं पाता, उसे तेरे हाथों में छोड़ना सिखा।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 4

एक पीढ़ी जाती है, और दूसरी पीढ़ी आती है; परन्तु पृथ्वी बनी रहती है।" जिस मिट्टी पर तू आज चल रहा है, उस पर तेरे दादा भी चले थे। ज़मीन को तेरा नाम याद नहीं रहेगा, पर परमेश्वर को रहेगा। सोच, तू अपना छोटा सा जीवन किसके लिए खर्च कर रहा है, उसके लिए जो रह जाएगा या उसके लिए जो मिट जाएगा?

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