सभोपदेशक 11:10
पाठ
उपदेशक अपने युवा श्रोता को एक अजीब आदेश देता है: अपने मन से खेद हटा दे, और अपनी देह से दुःख दूर कर। यह कोई सुखवादी नारा नहीं है, बल्कि ठीक उस वाक्य के बाद आता है जिसमें न्याय की चेतावनी दी गई थी। और फिर कारण चौंकाने वाला है: इसलिए नहीं कि जवानी अनमोल है, बल्कि इसलिए कि "लड़कपन और जवानी दोनों व्यर्थ हैं।" यानी बीत जाने वाली, भाप की तरह पकड़ में न आने वाली। पूरे अध्याय की गति यहाँ ठहरती है: बोना, बाँटना, हवा को न ताकना, उजियाले में आनन्द करना, और अब यह अंतिम, लगभग फुसफुसाया हुआ वाक्य, जो कड़वाहट को हाथ से जाने देने को कहता है क्योंकि समय स्वयं हाथ से जा रहा है।
मर्म
यहाँ जो शब्द "व्यर्थ" अनुवाद हुआ है, वह इब्रानी हेवेल है, जिसका अर्थ भाप या साँस की फुहार है। ठंड में मुँह से निकली भाप: दिखती है, फिर नहीं दिखती। उपदेशक यह नहीं कह रहा कि जवानी बेकार है, बल्कि कि वह पकड़ी नहीं जा सकती। और इसी से उसका उपदेश निकलता है। यदि जवानी टिकाऊ होती, तो उसे खेद और चिन्ता में खर्च करना केवल एक भूल होती; क्योंकि वह भाप है, उसे कड़वाहट में खर्च करना एक दुखद विडम्बना है। परमेश्वर के विषय में यह क्या कहता है? कि वे हमें अपने दिनों का स्वामी नहीं, केवल पानेवाला बनाते हैं। और शायद यही अनुग्रह है: जिसे मैं थाम नहीं सकता, उसे मुझे बचाकर रखना भी नहीं है। पर प्रश्न बना रहता है, क्या खेद को छोड़ना इतना आसान है?
सूत्र
उपदेशक की यह पुकार अकेली नहीं खड़ी। पूरे पवित्रशास्त्र में परमेश्वर अपने लोगों को बार-बार वर्तमान में लौटाते हैं: मन्ना केवल एक दिन के लिए, चिन्ता कल पर न ढोने का आदेश, और अन्त में वह व्यक्ति जो पूरी तरह एक-एक दिन जीया। यीशु मसीह ने भाप जैसी देह को ही अपना घर बनाया; उन्होंने बचपन और जवानी वैसे ही जी, जैसे हम जीते हैं, बीतते हुए दिनों में। और फिर भी उन्होंने कड़वाहट नहीं संचित की। उपदेशक हमें केवल सलाह देता है, "खेद दूर कर"; मसीह उसे संभव बनाते हैं, क्योंकि जो न्याय पद 9 में मँडराता है, वह उनके ऊपर आ पड़ा। इसलिए ईसाई पाठक इस पद को हल्केपन से नहीं, बल्कि क्षमा-प्राप्त हृदय की स्वतंत्रता से पढ़ता है। भाप अब भी भाप है, पर अब वह किसी के हाथ में उठती है।
दर्पण
खेद के नाम अलग-अलग होते हैं। वह बातचीत जो पिता के साथ कभी पूरी नहीं हुई। वह नौकरी जो किसी और को मिल गई और जिसका हिसाब आप मन में आज भी लगाते हैं। वह शरीर जो अब पहले जैसा नहीं, और उसका शोक जिसे आप किसी से कहते नहीं। उपदेशक इनमें से किसी को झूठा नहीं कहता; वह केवल पूछता है कि आप अपने गिने-चुने दिनों में से कितने इन पर खर्च करेंगे। यह पद सस्ता आशावाद नहीं बेचता, वह न्याय की चेतावनी के तुरन्त बाद आता है। पर वह यह भी नहीं मानता कि पवित्रता उदासी में रहती है। आज एक काम कीजिए: एक कागज़ पर उस एक व्यक्ति या घटना का नाम लिखिए जिस पर आपका मन बार-बार लौटता है, उसे ऊँची आवाज़ में परमेश्वर के सामने कहिए, और फिर वह कागज़ फाड़ दीजिए।
एक बारीकी
ध्यान दीजिए कि उपदेशक दो हिस्सों में बात करता है: "अपने मन से खेद" और "अपनी देह से दुःख"। वह हृदय पर रुक सकता था, जैसा धार्मिक भाषा अक्सर करती है। पर वह देह का नाम लेता है। मानो वह जानता हो कि चिन्ता कंधों में जमती है, कि क्रोध नींद चुराता है, कि शोक पेट में बैठ जाता है। बाइबल के परमेश्वर आत्मा के परमेश्वर होने के साथ-साथ देह के भी परमेश्वर हैं; उन्होंने ही पद 5 में गर्भ के भीतर हड्डियों को बढ़ते देखा है। तो जब आपकी पीठ रातभर तनी रहती है, वह भी आत्मिक जीवन का ही हिस्सा है। शायद इस पद का सबसे व्यावहारिक अनुवाद यह हो: गहरी साँस लीजिए, और मुट्ठी खोलिए।
अंतर्पाठ
भजन 90 वही प्रार्थना करता है जो उपदेशक यहाँ आदेश के रूप में देता है: हमें अपने दिन गिनना सिखाइए, ताकि हम बुद्धिमान हृदय पाएँ। वहाँ दिनों की क्षणभंगुरता प्रार्थना बन जाती है, यहाँ वह उपदेश बन जाती है। और पहाड़ी उपदेश में यीशु कल की चिन्ता न करने को कहते हैं, क्योंकि हर दिन का अपना दुःख काफ़ी है। तीनों जगह तर्क एक ही है: समय हमारा नहीं, इसलिए उसे डर से भरना व्यर्थ है। पर एक अन्तर भी है। उपदेशक भाप के सामने खड़ा होकर बोलता है; यीशु पिता के हाथ की ओर इशारा करते हुए। दोनों सच हैं, और शायद ईमानदार विश्वास दोनों के बीच ही साँस लेता है।
पृष्ठभूमि
उपदेशक की दुनिया छोटी और अनिश्चित थी। खेती बारिश पर टिकी थी, व्यापार समुद्र पर, और जीवन औसतन इतना छोटा कि "जवानी" वास्तव में जीवन का बड़ा हिस्सा थी, कोई प्रस्तावना नहीं। इसी अध्याय में वह हवा और बादल देखते रहने वाले किसान का चित्र खींचता है, वह आदमी जो सही क्षण की प्रतीक्षा में बोता ही नहीं। यह किसी सुरक्षित दरबारी की बात नहीं, बल्कि उस समाज की है जहाँ अकाल, बीमारी और सत्ता का बदलाव किसी भी वर्ष सब कुछ पलट सकते थे। ऐसे माहौल में एक बुज़ुर्ग शिक्षक युवाओं से कहता है: तुम्हारा नियंत्रण जितना तुम सोचते हो, उससे कम है, और तुम्हारा आनन्द जितना तुम मानते हो, उससे अधिक जायज़।
चिंतन
आप अपने दिन का कौन-सा हिस्सा उस बात को दोहराने में देते हैं जिसे आप बदल नहीं सकते, और उसे छोड़ देना आपको क्यों असुरक्षित लगता है?
यदि परमेश्वर आपकी देह की थकान को भी देखते हैं, तो इस सप्ताह आप अपने शरीर के साथ कौन-सा एक दयालु व्यवहार करेंगे?
Ecclesiastes में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
How Ecclesiastes teaches you to live well by keeping the end in view.
A short, sane guide through the Preacher's search for meaning.
Ecclesiastes: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Ecclesiastes 11:10 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
सभोपदेशक 11:10 का क्या अर्थ है?
सभोपदेशक 11:10 किस विषय में है?
सभोपदेशक 11:10 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
सभोपदेशक 11:10 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
सभोपदेशक 11:10 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Ecclesiastes 11 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
अपनी रोटी जल के ऊपर डाल दे, क्योंकि बहुत दिनों के बाद तू उसे फिर पाएगा।" पानी पर रोटी डालना बेवकूफी जैसा लगता है, कुछ लौटता दिखता ही नहीं। पर सुलैमान कहता है, दे दे, भले ही फल तुरन्त न दिखे। तूने जो भलाई चुपचाप की, जो माफ किया, जो सहारा दिया, वह बहता हुआ लगता है, पर परमेश्वर उसे गिनता है। क्या तू बिना रसीद के देना सीखेगा?
यदि बादल जल से भरे हों, तो वे पृथ्वी पर उसे बरसा देते हैं; और यदि वृक्ष दक्षिण या उत्तर की ओर गिरे, तो जिस स्थान पर वह गिरता है, वहीं पड़ा रहता है।"
बादल कब बरसेंगे, पेड़ किस ओर गिरेगा, यह तेरे हाथ में नहीं। पर बीज बोना तेरे हाथ में है। जो तू बदल नहीं सकता, उसकी चिंता में बैठा रहेगा, तो जो कर सकता था वह भी छूट जाएगा। आज उठ, बो दे।
जवानी एक तोहफ़ा है, और सभोपदेशक इससे इनकार नहीं करता। वह कहता है, "हे जवान, अपनी जवानी में आनन्द कर, और अपनी जवानी के दिनों में तेरा मन तुझे आनन्दित करे।" पर उसी साँस में वह जोड़ता है कि परमेश्वर तुझे इन सब बातों का न्याय में ले आएगा।
यह डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए है। जी भरकर जी, पर याद रख कि हर हँसी, हर चुनाव किसी की आँखों के सामने हो रहा है जो तुझसे प्रेम करता है।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें