इफिसियों 3:17
पाठ
पौलुस घुटनों पर है, और उसकी प्रार्थना की दूसरी माँग यह है: "विश्वास के द्वारा मसीह तुम्हारे हृदय में बसे कि तुम प्रेम में जड़ पकड़कर और नींव डालकर।" पहली माँग थी भीतरी मनुष्यत्व में आत्मा के द्वारा सामर्थ्य (पद 16); यह दूसरी माँग उसी की अगली साँस है। मसीह कहीं दूर स्वर्ग में नहीं, बल्कि विश्वासी के हृदय में स्थायी रूप से निवास करें, जैसे कोई अतिथि नहीं पर गृहस्वामी किसी घर में बस जाता है। और उस निवास का फल दो चित्रों में बँधा है: एक पेड़ जिसकी जड़ें प्रेम की मिट्टी में गहरी उतरती हैं, और एक इमारत जिसकी नींव प्रेम की चट्टान पर डाली गई है। यही वह आधार है जिस पर पद 18-19 की विशाल समझ खड़ी होगी।
मूल मर्म
ध्यान दीजिए कि पौलुस किनके लिए यह माँग रहा है। ये पहले से विश्वास करने वाले लोग हैं; मसीह उनमें पहले से हैं। तो फिर यह प्रार्थना क्यों? क्योंकि मसीह का हृदय में होना और मसीह का हृदय में बस जाना एक बात नहीं। यहाँ का शब्द स्थायी निवास का है, किसी कोने में टिक जाने का नहीं। परमेश्वर ने जो उद्धार की योजना बनाई, उसका लक्ष्य केवल पापों की क्षमा नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर स्वयं मसीह का घर बनाना है। और यह "विश्वास के द्वारा" होता है, अर्थात् हमारी योग्यता से नहीं, उसी अनुग्रह के प्रबन्ध से जिसका भेद पौलुस पद 2 से खोल रहा है। जहाँ मसीह बसते हैं, वहाँ प्रेम मिट्टी बन जाता है; जड़ें वहीं गहरी होती हैं, और जीवन की इमारत वहीं टिकती है। परमेश्वर हमें सुधारते नहीं, वे हममें रहने आते हैं।
जुड़ा हुआ सूत्र
परमेश्वर का सबसे पुराना सपना यही रहा है: अपने लोगों के बीच बसना। मिस्र से छूटे इस्राएल को सबसे पहली बड़ी आज्ञा एक तम्बू बनाने की मिली, ताकि परमेश्वर उनके बीच डेरा करें। फिर मन्दिर आया, पत्थर का, भव्य, और फिर भी ऐसा जिसमें केवल एक पुरोहित, साल में एक बार, परदे के पीछे जा सकता था। वह सारा इतिहास इस छोटे से वाक्य में आकर खुलता है: "मसीह तुम्हारे हृदय में बसे।" जो उपस्थिति कभी परदे के पीछे थी, वह अब विश्वासी की छाती के भीतर घर बनाती है। और यह संयोग नहीं कि इसी अध्याय में पौलुस कलीसिया को भेद कहता है: देह, परदा हटा हुआ, और निवास भीतर। मसीह केवल हमारे लिए मरे नहीं; वे हममें रहने आए।
दर्पण
हम में से अधिकांश मसीह को मेहमान की तरह रखते हैं। मेहमान के लिए एक कमरा साफ किया जाता है, बाकी घर वैसा ही रहता है: पैसे का हिसाब, दफ़्तर की राजनीति, वह रिश्ता जिसमें हम सालों से कड़वाहट पाल रहे हैं, वह आदत जिसे हम रविवार को भूल जाते हैं। गृहस्वामी अलग बात है। गृहस्वामी अलमारियाँ खोलता है। और ध्यान दीजिए कि जहाँ मसीह बसते हैं, वहाँ जड़ें किसमें पकड़ती हैं: सिद्धान्त में नहीं, अनुभव में नहीं, "प्रेम में"। यानी आपका आध्यात्मिक स्वास्थ्य उस मिट्टी से नापा जाएगा जिसमें आप गहरे उतरे हैं। जिस आदमी को आप हफ़्तों से टाल रहे हैं, वह आपकी जड़ों की परीक्षा है।
आज कहीं अकेले में घुटने टेकिए, जैसे पौलुस पद 14 में टेकता है, और उस एक व्यक्ति का नाम लेकर ज़ोर से कहिए: "प्रभु, मेरे हृदय में बसिए, ताकि मैं इस नाम के साथ प्रेम में जड़ पकड़ सकूँ।" नाम लीजिए, मन में नहीं, आवाज़ में।
पृष्ठभूमि
पौलुस यह पत्र जंजीरों में लिखता है और पद 1 में खुद को "मसीह यीशु का बन्दी" कहता है। इफिसुस रोमी एशिया का धड़कता हुआ शहर था, अरतिमिस के विशाल मन्दिर का शहर, जादू-टोने और ताबीज़ों का बाज़ार, जहाँ धर्म का अर्थ था शक्तियों को साधना। ऐसे शहर में एक घर में जुटे छोटे से समूह को, जिसमें यहूदी और अन्यजाति साथ बैठते थे, यह सुनाया जाता है कि असली मन्दिर पत्थर का नहीं है और असली सामर्थ्य ताबीज़ से नहीं आती, बल्कि "भीतरी मनुष्यत्व" में आत्मा के काम से। और जो आदमी यह लिख रहा है, वह कैदी है। उसके पास न मन्दिर है, न स्वतंत्रता, न सुरक्षा। उसके पास केवल वही है जो वह माँग रहा है: भीतर बसा हुआ मसीह।
एक बारीकी
"जड़ पकड़कर और नींव डालकर।" पौलुस दो चित्र आपस में मिला देता है, और यह जोड़ अटपटा है: पेड़ और इमारत एक साथ नहीं चलते। पर यही उसका इरादा है। पेड़ जीवित है, बढ़ता है, मौसम बदलते ही पत्ते बदलता है, और उसकी जड़ें धीरे-धीरे, चुपचाप, वर्षों में गहरी होती हैं। इमारत स्थिर है, नापी हुई, एक बार डाली गई नींव पर टिकी। मसीही जीवन दोनों है। वह जैविक भी है और संरचनात्मक भी; उसमें वृद्धि भी है और दृढ़ता भी। जो केवल बढ़ना चाहते हैं पर नींव नहीं चाहते, वे हर नई हवा में झुक जाते हैं। जो केवल नींव चाहते हैं पर वृद्धि नहीं, वे सही होते हैं और सूख जाते हैं। दोनों क्रियाएँ बीत चुके काम की हैं: परमेश्वर ने पहले ही आपको वहाँ रोपा और गाड़ा है, प्रेम में।
मुख्य पात्र
इस पद का केन्द्रीय पात्र पौलुस नहीं, मसीह हैं, और उनका स्वभाव इस एक क्रिया में खुलता है: वे बसना चाहते हैं। परमेश्वर के बारे में सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं कि वे सर्वशक्तिमान हैं, बल्कि यह कि वे निकट आना चाहते हैं। जिस मसीह का "अगम्य धन" पौलुस पद 8 में बताता है, वही मसीह एक साधारण मनुष्य के हृदय को अपना पता बनाने को तैयार हैं, और उस हृदय को वे उसकी हालत देखकर नहीं चुनते। वे क्रूस तक गए, जहाँ उन्हें बाहर निकाला गया, ताकि हमारे भीतर आ सकें। और वे ज़बरदस्ती नहीं करते; पद कहता है "विश्वास के द्वारा"। दरवाज़ा भीतर से खुलता है, पर खोलने की ताकत भी वही देते हैं। यह प्रभु हमारे ऊपर नहीं, हमारे भीतर राज्य करना चाहते हैं।
शास्त्र की गूँज
यूहन्ना 14 में, अपनी मृत्यु से कुछ घंटे पहले, यीशु अपने चेलों से वादा करते हैं कि जो उनसे प्रेम रखेगा, उसके पास पिता और पुत्र आकर उसके साथ वास करेंगे। पौलुस की प्रार्थना उसी वादे की माँग है; वह कुछ नया नहीं माँग रहा, वह मसीह के अपने शब्द परमेश्वर के सामने रख रहा है। और दूसरी गूँज पहाड़ी उपदेश के अन्त से आती है, जहाँ यीशु दो घरों की बात करते हैं, एक चट्टान पर, एक रेत पर, और आँधी दोनों पर समान रूप से आती है। पौलुस उसी चित्र को उठाकर पूछता है: आपकी नींव किस चीज़ में डली है? और उसका उत्तर यीशु के उत्तर से अलग नहीं: उस प्रेम में जो मसीह से आता है और मसीह जैसा दिखता है।
पहले सुनने वाले
उस कमरे में बैठे अन्यजाति विश्वासियों के लिए यह वाक्य राजनीतिक भी था। उन्हें जीवन भर बताया गया था कि परमेश्वर का घर यरूशलेम में है और वे उसके आँगन से बाहर हैं, गोयिम, बाहरी। अब उन्हें कहा जा रहा है कि वह उपस्थिति, जिसके पास वे कभी नहीं जा सकते थे, उनकी छाती के भीतर बसने आ रही है। पद 6 का भेद यहाँ व्यक्तिगत हो जाता है: वे "विरासत में सहभागी" केवल कागज़ पर नहीं हैं। और "प्रेम में जड़ पकड़कर" उनके कानों में सीधा था, क्योंकि उसी कमरे में वे लोग बैठे थे जिनसे उनका खानपान, भाषा और इतिहास अलग था। जड़ें उसी मिट्टी में डालनी थीं जहाँ दूसरा आदमी खड़ा था।
कठिन प्रश्न
अगर मसीह विश्वास के समय ही भीतर आ जाते हैं, तो पौलुस विश्वासियों के लिए यही क्यों माँगता है? और अगर यह माँगना पड़ता है, तो क्या इसका मतलब है कि वे कभी-कभी नहीं भी बसते? ईमानदारी से कहें तो पौलुस इस तनाव को सुलझाता नहीं। वह दोनों सच एक साथ पकड़े रहता है: मसीह आपके हैं, और मसीह को आपमें और गहरा जाना है। शायद इसका कारण यह है कि हृदय एक कमरा नहीं, एक घर है, और उसके कई दरवाज़े अब भी बन्द हैं। मैं यह नहीं कहूँगा कि अनुभव में यह हमेशा महसूस होता है; कई दिन ऐसे आएँगे जब भीतर कोई मौजूद नहीं लगता। उन दिनों के लिए पौलुस हमें अनुभव नहीं, घुटने देता है। वह माँगता रहता है, क्योंकि यह निवास परमेश्वर का काम है, हमारी भावना का नहीं।
मनन के प्रश्न
आपके जीवन का कौन सा कमरा अब भी मेहमान को नहीं, केवल आपको पता है, और आप उसका दरवाज़ा क्यों बन्द रखते हैं?
"प्रेम में जड़ पकड़कर": पिछले महीने में आपकी जड़ें किस मिट्टी में गहरी हुईं, प्रेम में या अपनी सही होने की ज़िद में?
पौलुस दूसरों के लिए घुटने टेकता है जबकि वह खुद जंजीरों में है। आप किसके लिए आखिरी बार तब प्रार्थना करने बैठे थे जब आपकी अपनी हालत ज़्यादा बुरी थी?
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Ephesians 3:17 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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इफिसियों 3:17 का क्या अर्थ है?
इफिसियों 3:17 किस विषय में है?
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इफिसियों 3:17 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इफिसियों 3:17 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Ephesians 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
इसी कारण मैं उस पिता के सामने घुटने टेकता हूँ," पौलुस यह जंजीरों में लिखता है। कैदखाने से वह न शिकायत करता है, न बहस। वह घुटने टेकता है। उस समय लोग अक्सर खड़े होकर प्रार्थना करते थे, घुटने टेकना गहरे बोझ की निशानी था। तेरे मन का बोझ आज कहाँ जा रहा है? पिता के सामने झुकना कमजोरी नहीं, वही सबसे सही जगह है।
पिता, मैं जानता हूँ कि जो कुछ भी मेरे हाथों से होता है, वह मेरी योग्यता से नहीं, आपके मुफ्त दिए हुए अनुग्रह से होता है। मुझे अपनी सामर्थ्य से भर दीजिए, ताकि मैं डर और झिझक छोड़कर आपके लोगों की सेवा कर सकूँ।
पिता, मेरे मन में आकर बस जा, वहीं रह जहाँ मैं किसी को नहीं आने देता। मेरी जड़ें तेरे प्रेम में गहरी कर दे, ताकि जब सब कुछ हिले, मैं टिका रहूँ। विश्वास कमज़ोर पड़े तो तू थाम लेना।
जिससे स्वर्ग और पृथ्वी पर, हर एक घराने का नाम रखा जाता है।" पौलुस घुटनों पर है, और जिस पिता के सामने झुका है, उसी से हर परिवार को उसका नाम मिला है। तेरा घर टूटा हो, तेरा उपनाम तुझे चुभता हो, या तू अकेला महसूस करता हो, फिर भी तेरी पहचान किसी इंसान के रजिस्टर में नहीं, पिता के मुँह से निकली है। वह तुझे नाम लेकर जानता है।
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