एस्तेर 1:1
पाठ
"क्षयर्ष नामक राजा के दिनों में ये बातें हुईं" — पूरी पुस्तक इसी एक वाक्य से खुलती है, और ध्यान दीजिए कि समय की गिनती किसके नाम से हो रही है। इस्राएल के इतिहास में आमतौर पर वर्ष दाऊद या हिजकिय्याह के राज्यकाल से गिने जाते थे; यहाँ एक विदेशी सम्राट घड़ी की सूई बन गया है। और फिर उस सम्राट का विस्तार: "एक सौ सत्ताईस प्रान्तों पर, अर्थात् भारत से लेकर कूश देश तक राज्य करता था।" एक ही वाक्य में हमें काल, शासक और साम्राज्य का नक्शा मिल जाता है। जो नहीं मिलता, वह है परमेश्वर का नाम। यह चूक नहीं है; यह पुस्तक का पहला, जानबूझकर किया गया संकेत है।
मूल बात
भारत से कूश तक, यानी सिंधु नदी से लेकर आज के सूडान तक। यह भाषा जानी-पहचानी लगती है, और लगनी भी चाहिए। इससे पहले पवित्रशास्त्र में इतनी चौड़ी सीमाएँ केवल दो जगह खींची गई थीं: परमेश्वर की उस वाचा में जो अब्राहम की संतान को दी गई, और सुलैमान के राज्य के वर्णन में, जहाँ नदी से लेकर दूर देशों तक शान्ति थी। अब वह विश्व-व्यापी वैभव किसी और के हाथ में है, और परमेश्वर की प्रजा उस साम्राज्य के एक सौ सत्ताईस प्रान्तों में बिखरी हुई एक अल्पसंख्यक भीड़ है। यही इस पद का धार्मिक मर्म है: निर्वासन केवल भूगोल नहीं, एक स्थिति है, जहाँ जो कुछ परमेश्वर ने अपने लिए कहा था, वह किसी और के नाम से लिखा दिखाई देता है। और फिर भी पुस्तक लिखी गई, क्योंकि वहाँ भी परमेश्वर काम करते रहे, नाम लिए बिना।
जोड़ने वाला सूत्र
निर्वासन में एक विदेशी दरबार, एक शक्तिशाली राजा, और उस दरबार के भीतर परमेश्वर की प्रजा का एक अकेला व्यक्ति जिसके हाथ में अचानक बहुतों का जीवन आ जाता है। यह ढाँचा पवित्रशास्त्र में नया नहीं है; यूसुफ फ़िरौन के महल में ठीक यही भूमिका निभा चुका है, और वहाँ भी परमेश्वर पर्दे के पीछे से काम करते रहे जबकि सारे दस्तावेज़ मिस्र के राजा के नाम से लिखे जा रहे थे। एस्तेर की पुस्तक उसी धागे को आगे बढ़ाती है, बस इस बार धागा और पतला है, इतना पतला कि परमेश्वर का नाम भी दिखाई नहीं देता। और यह पैटर्न मसीह में अपने चरम पर पहुँचता है: एक राजा जो अपना वैभव प्रदर्शित करने के बजाय उसे छिपा लेता है, और जिसकी सबसे बड़ी विजय ठीक उस क्षण होती है जब लगता है कि साम्राज्य जीत गया।
दर्पण
आपका समय भी किसी और के नाम से गिना जाता है। तिमाही के लक्ष्य, स्कूल का सत्र, ईएमआई की तारीख़, बॉस का कैलेंडर; ये तय करते हैं कि आपका साल कब शुरू होता है और कब ख़त्म। और उन सब कागज़ों पर परमेश्वर का नाम कहीं नहीं लिखा। यही इस पद की चुभन है। हम मान बैठते हैं कि जहाँ परमेश्वर का नाम नहीं छपा, वहाँ वे काम भी नहीं कर रहे; कि दफ़्तर, अस्पताल और अदालत धर्मनिरपेक्ष इलाके हैं जहाँ बस टिके रहना ही काफ़ी है। एस्तेर 1:1 इसी धारणा पर पहला वार करता है, सम्राट के नाम को इतनी शान से लिखकर कि पाठक बेचैन हो जाए और पूछे: तो फिर परमेश्वर कहाँ हैं?
आज अपने कैलेंडर या फ़ोन पर इस सप्ताह का एक दिन चुनिए और उसके नीचे एक वाक्य लिखिए: उस दिन परमेश्वर ने बिना नाम लिए क्या किया, ऐसा जो तब आपको दिखाई नहीं दिया था।
संदर्भ
क्षयर्ष, जिसे यूनानी इतिहास ज़ेरक्सीस कहता है, ईसा पूर्व 486 से 465 तक फ़ारसी साम्राज्य का सम्राट था। शूशन उसके चार राजधानियों में से एक थी, सर्दियों का महल, जहाँ से भारत की सीमा तक और नील नदी के दक्षिण में कूश तक आदेश जाते थे। यह वही व्यवस्था है जिसने पहले कुस्रू के द्वारा यहूदियों को यरूशलेम लौटने की अनुमति दी थी। पर सब नहीं लौटे। जो पद 1 के इस विशाल नक्शे में बिखरे रह गए, उनका मंदिर से कोई सीधा संबंध नहीं, कोई राजा नहीं, कोई भविष्यद्वक्ता आवाज़ नहीं। वे साम्राज्य की डाक व्यवस्था, उसकी भाषाओं और उसके अटल कानूनों के बीच जी रहे थे, जहाँ एक लिखा हुआ आदेश बदला नहीं जा सकता था।
मुख्य पात्र
"यह वही क्षयर्ष है" — इस वाक्यांश में लेखक की हल्की-सी मुस्कान छिपी है। जैसे कोई परिचय कराते समय कहे, हाँ, वही, जिसके बारे में आपने सुना है। और परिचय किससे बनता है? गिनती से: एक सौ सत्ताईस प्रान्त, दो महाद्वीप, दो नदियों के बीच का सारा संसार। यह आदमी अपने विस्तार के अलावा किसी और चीज़ से नहीं पहचाना जाता। उसके पास कोई गुण नहीं गिनाया गया, न न्याय, न बुद्धि, न भक्ति; केवल क्षेत्रफल। और आगे की कहानी इस परिचय की हवा निकाल देगी, जब यही सम्राट अपनी ही मेज़ पर एक स्त्री को नहीं संभाल पाएगा और सलाहकारों से पूछेगा कि अब क्या करूँ। जो मनुष्य अपनी पहुँच से अपनी पहचान बनाता है, वह भीतर से सबसे असुरक्षित होता है।
प्रश्न
तो परमेश्वर का नाम गायब क्यों है? आसान उत्तर यह होगा कि वे तो हर पंक्ति के पीछे हैं, बस लिखे नहीं गए। यह सच है, पर पूरा सच नहीं। खटकने वाली बात यह है कि जिन यहूदियों की कहानी यह पुस्तक कहती है, वे उस जगह हैं जहाँ शायद उन्हें नहीं होना चाहिए था, लौटने का द्वार खुला था और वे नहीं लौटे। पवित्रशास्त्र इस पर कोई फ़ैसला नहीं सुनाता। वह न उन्हें दोषी ठहराता है, न उनके चुनाव को पवित्र बताता है। वह बस दिखाता है कि परमेश्वर वहाँ भी उन्हें छोड़ते नहीं। यह राहत देता है और असहज भी करता है, क्योंकि इसका अर्थ है कि उनकी वफ़ादारी हमारी सही जगह पर होने की शर्त पर नहीं टिकी। यह अनुग्रह है, और अनुग्रह हमेशा थोड़ा बेचैन करने वाला होता है।
चिंतन
आपके जीवन का "क्षयर्ष" कौन है, यानी वह नाम या व्यवस्था जिससे आप अपना समय और अपनी सुरक्षा नापते हैं?
अगर परमेश्वर आपकी कहानी में अपना नाम लिखे बिना काम कर रहे हों, तो आप उन्हें कैसे पहचानेंगे?
Esther में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
Finds God's unseen hand in the one Bible book that never names him.
Esther: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Esther 1:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
एस्तेर 1:1 का क्या अर्थ है?
एस्तेर 1:1 किस विषय में है?
एस्तेर 1:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
एस्तेर 1:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
एस्तेर 1:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Esther 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
उन दिनों में जब राजा क्षयर्ष शूशन नामक राजगढ़ में अपने राज्य के सिंहासन पर विराजमान था," कहानी यहाँ से शुरू होती है, मगर एक सिंहासन पर नहीं। वह राजगढ़ आज खंडहर है, और परमेश्वर के लोग आज भी जीवित हैं। जो तुझे आज सबसे बड़ा और अटल दिखता है, वह भी एक दिन "उन दिनों में" बन जाएगा। तू अपना भरोसा किस सिंहासन पर रखे हुए है?
सोने के पात्र, और हर एक दूसरे से अलग। इतनी दौलत कि दोहराने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी, और दाखमधु "राजा की उदारता के योग्य" बहुतायत से। फिर भी यही दावत क्रोध और शर्म में खत्म होती है। भरे हुए प्याले खाली दिल को नहीं भर सकते। सोचो, तुम जो दिखाने में लगे हो, क्या वह तुम्हें भीतर से शांत कर पाया है?
राज्य के तीसरे वर्ष में खश्शयार्ष अपने हाकिमों, कर्मचारियों, सेनापतियों को बुलाता है। सारा साम्राज्य एक मेज़ के चारों ओर, केवल यह दिखाने के लिए कि वह कितना बड़ा है। मगर जिस कहानी में उसका वैभव सबसे ऊँचा दिखता है, उसी में परमेश्वर चुपचाप अपनी एस्तेर को तैयार कर रहा था। तेरे आसपास की शानो-शौकत से घबरा मत। जो दिखाई नहीं देता, वही अंत में सब कुछ बदलता है।
सात प्रधान, जो "राजा का दर्शन करते थे" और राज्य में सबसे ऊँचे पदों पर बैठे थे। इतनी पहुँच, इतना अधिकार, और फिर भी उस रात इनमें से एक ने भी नशे में चूर राजा को नहीं रोका। पास होना और सच बोलना दो अलग बातें हैं। तू जिनके पास बैठता है, क्या उनसे सच कहने का साहस भी रखता है?
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें