निर्गमन 14:21
पाठ
मूसा का हाथ उठता है, और उसके बाद जो होता है वह एक पल की बात नहीं है: "यहोवा ने रात भर प्रचण्ड पुरवाई चलाई।" पूरी रात। हवा समुद्र पर गरजती रही, पानी पीछे हटता रहा, और जहाँ कुछ क्षण पहले डूबने के सिवा कुछ न था, वहाँ सूखी भूमि उभर आई। आयत में तीन चीज़ें एक साथ हैं: एक आदमी का बढ़ा हुआ हाथ, परमेश्वर की भेजी हुई आँधी, और बीच से चिरा हुआ समुद्र। इस्राएली अभी चले नहीं, वे अभी किनारे पर खड़े हैं, पीछे फ़िरौन के छः सौ रथ और सामने खुलता हुआ रास्ता, जो रात भर खुलता रहा जबकि वे अंधकार में खड़े इंतज़ार करते रहे।
मर्म
यह आयत परमेश्वर के छुटकारे के बारे में एक बात कहती है जिसे हम बार-बार भूलते हैं: वे रास्ता बनाते हैं, पर अक्सर रात भर लगाकर। चमत्कार जादू नहीं है; यहोवा हवा का इस्तेमाल करते हैं, उसी सृष्टि का, जिसमें उन्होंने आरम्भ में जल को हटाकर सूखी भूमि प्रकट की थी। यहाँ भी वही शब्द गूँजता है, "सूखी भूमि हो गई", जैसे उत्पत्ति का पहला सप्ताह मिस्र के किनारे पर दोहराया जा रहा हो। छुटकारा नई सृष्टि है, अराजकता के पानी पर परमेश्वर का अधिकार। और ध्यान दें कि मूसा का हाथ समुद्र को नहीं चीरता; वह केवल उठता है। आज्ञाकारिता का इशारा और परमेश्वर का सामर्थ्य एक ही आयत में हैं, पर एक-दूसरे के बराबर नहीं। हम हाथ उठाते हैं; आँधी वे भेजते हैं।
सूत्र
बाइबल की कहानी में समुद्र कभी शांत पृष्ठभूमि नहीं होता; वह वह जगह है जहाँ मनुष्य का बस नहीं चलता। इसलिए जब परमेश्वर जल को चीरकर सूखी भूमि निकालते हैं, तो वे केवल एक भौगोलिक समस्या नहीं सुलझाते, वे अपनी प्रभुता का हस्ताक्षर छोड़ते हैं। यही हस्ताक्षर सदियों बाद गलील की झील पर दिखता है, जब यीशु आँधी को डाँटते हैं और शिष्य काँपते हुए पूछते हैं कि यह कौन है। जिसने मिस्र के किनारे हवा भेजी थी, वही नाव में सो रहा था। और उससे भी गहरा सूत्र यह है: यहाँ इस्राएल सूखी भूमि पर चलकर बचता है जबकि पानी किसी और पर लौटता है। क्रूस पर वह क्रम उलट जाता है, वहाँ न्याय का जल उसी पर गिरता है जो निर्दोष था, ताकि हम सूखी भूमि पर चल सकें।
दर्पण
हमें रात भर वाला परमेश्वर पसंद नहीं। हमें वह परमेश्वर चाहिए जो हाथ उठते ही पानी हटा दे, जो रिपोर्ट आने से पहले ही बता दे कि गाँठ कैंसर नहीं है, जो बेटे को उसी हफ़्ते घर लौटा दे जिस हफ़्ते हमने उपवास रखा था, जो नौकरी जाने और नई नौकरी मिलने के बीच का खालीपन मिटा दे। पर यहाँ परमेश्वर रास्ता तो बनाते हैं, धीरे-धीरे, अंधेरे में, उस गति से जो हमारी घबराहट से मेल नहीं खाती। और उस रात इस्राएल को यह भी नहीं दिखता था कि कुछ हो रहा है; बस हवा का शोर था और पीछे रथों की आवाज़। शायद आपकी भी एक ऐसी ही रात चल रही है, जहाँ आपको लगता है कि कुछ नहीं बदल रहा, जबकि पानी एक-एक इंच पीछे हट रहा है। इसके साथ एक दूसरी बात भी सामने आती है: हमारा यह छिपा हुआ घमंड कि रास्ता हमने बनाया, हमारी मेहनत से, हमारी समझदारी से। मूसा का हाथ ज़रूरी था, पर उसने समुद्र नहीं चीरा।
आज सोने से पहले एक कागज़ पर उस एक स्थिति का नाम लिखिए जिसमें आप महीनों से इंतज़ार कर रहे हैं, उसके नीचे बड़े अक्षरों में लिखिए "रात भर", और वह कागज़ अपने तकिए के पास रखकर सो जाइए।
श्रोता
जिन लोगों ने यह कहानी पहली बार सुनी, वे जानते थे कि बाल-सपोन कोई साधारण जगह नहीं है। वह नाम एक देवता का था, तूफ़ानों और समुद्र का देवता, जिसकी पूजा नाविक करते थे। परमेश्वर ने जानबूझकर अपने लोगों को ठीक उसी की नाक के नीचे डेरा डालने को कहा, और फिर वहीं हवा और समुद्र पर अपना अधिकार दिखाया। यह केवल बचाव नहीं, एक सार्वजनिक चुनौती थी। और "पुरवाई" का ज़िक्र मिस्र में रहने वालों के कानों में अलग ही बजता था: पूरब की वह गरम, मारक हवा जो फ़सलें झुलसाती और टिड्डियाँ लाती थी। जिस हवा को वे विनाश की हवा जानते थे, उसी को यहोवा ने मुक्ति का औज़ार बना दिया। बाद की पीढ़ियाँ, खासकर निर्वासन में बैठे लोग, इस आयत को आशा की तरह दोहराती थीं।
कठिन प्रश्न
यह आयत खुद ही एक असुविधा खड़ी करती है: अगर हवा ने पानी हटाया, तो चमत्कार कहाँ रहा? पाठ छिपाता नहीं कि साधन क्या था, वह साफ़ कहता है कि यहोवा ने रात भर प्रचण्ड पुरवाई चलाई। कोई भी प्राकृतिक व्याख्या यहाँ परमेश्वर को हटाती नहीं, क्योंकि कहानी खुद कारण और कर्ता दोनों बताती है। पर इससे हमारी एक असली तकलीफ़ दूर नहीं होती: जब परमेश्वर सृष्टि के भीतर से काम करते हैं, तो हम प्रायः संयोग और उनके हाथ में फ़र्क नहीं कर पाते। जिसे आप उत्तर मानते हैं, पड़ोसी उसे किस्मत कहता है, और आपके पास अकाट्य प्रमाण नहीं होता। यह कसक बनी रहती है। इस्राएल के पास भी केवल एक चीज़ थी: उन्हें रास्ता याद था, और याद था कि वह रास्ता तब खुला जब उनके पास कोई रास्ता नहीं था।
अंतर्पाठ
एक पीढ़ी बाद यहोशू की किताब में यही दृश्य छोटे पैमाने पर लौटता है: यरदन का पानी रुकता है और लोग सूखी भूमि पर पार करते हैं। परमेश्वर दोहराते हैं, ताकि नई पीढ़ी भी कह सके कि यह हमारे साथ हुआ, केवल हमारे दादाओं के साथ नहीं। और पौलुस पहले कुरिन्थियों के दसवें अध्याय में इसी पार जाने को बपतिस्मा कहता है, मानो वह चिरा हुआ समुद्र हर उस व्यक्ति की तस्वीर हो जो मसीह के साथ पानी से होकर नई ज़िंदगी में निकलता है। दोनों जगह एक ही पैटर्न है: जहाँ मृत्यु का जल था, वहाँ परमेश्वर चलने लायक ज़मीन बनाते हैं, और आप उस ज़मीन पर अपने दम से नहीं, एक खुले हुए रास्ते पर चलते हैं।
चिंतन
आपकी कौन-सी "रात भर" इस समय चल रही है, और आप उसमें परमेश्वर की निष्क्रियता मान रहे हैं या उनका धीमा काम?
आपके जीवन में वह कौन-सी चीज़ है जिसे आप अपनी मेहनत का फल कहते हैं, जबकि सच यह है कि आपने सिर्फ़ हाथ उठाया था?
Exodus में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
Traces how God rescues a people for himself, from slavery to Sinai.
An accessible chapter by chapter guide that keeps pointing to Jesus.
Exodus: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Rich, sermon shaped exposition of the whole exodus story.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Exodus 14:21 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
निर्गमन 14:21 का क्या अर्थ है?
निर्गमन 14:21 किस विषय में है?
निर्गमन 14:21 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
निर्गमन 14:21 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
निर्गमन 14:21 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Exodus 14 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
और मिस्री, फ़िरौन के सब घोड़े, रथ और सवार उनका पीछा करते हुए समुद्र के बीच में उनके पीछे चले गए।" जो रास्ता इस्राएल के लिए बचाव था, वही मिस्रियों के लिए जाल बन गया। चमत्कार देख लेना काफ़ी नहीं; सवाल यह है कि तू उस रास्ते पर किसके बुलावे से चल रहा है। परमेश्वर का काम देखकर भी दिल कठोर रह सकता है।
तब यहोवा ने मूसा से कहा," इसी छोटे से वाक्य से वह अध्याय शुरू होता है जिसमें लाल समुद्र सामने और फ़िरौन पीछे होगा। ध्यान दे, संकट से पहले परमेश्वर बोलता है। जिस मोड़ पर तू आज खड़ा है, शायद वह भटकना नहीं, बल्कि उसकी कही हुई बात है। क्या तू उसकी आवाज़ को अपनी घबराहट से पहले सुनने को तैयार है?
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें