निर्गमन 3:14
पाठ
जलती हुई झाड़ी के सामने खड़ा मूसा एक व्यावहारिक सवाल पूछता है, उस आदमी का सवाल जो जानता है कि मिस्र में लोग उससे क्या पूछेंगे: "जब मैं इस्राएलियों के पास जाकर उनसे यह कहूँ, 'तुम्हारे पूर्वजों के परमेश्वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है,' तब यदि वे मुझसे पूछें, 'उसका क्या नाम है?' तब मैं उनको क्या बताऊँ?" आग में से उत्तर आता है, और वह उत्तर किसी शब्दकोश जैसा नहीं, एक घोषणा जैसा है: "मैं जो हूँ सो हूँ।" फिर परमेश्वर उसे मूसा के हाथ में एक संदेश की तरह थमा देते हैं: "तू इस्राएलियों से यह कहना, 'जिसका नाम मैं हूँ है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।'" नाम माँगा गया था, नाम मिला भी, पर ऐसा नाम जो पकड़ में आने से इनकार करता है।
मूल मर्म
प्राचीन दुनिया में नाम जानना एक तरह की पकड़ थी। देवता का नाम जानने का अर्थ था उसे पुकारने, मनाने, और कहीं न कहीं उसे अपने काम में लगाने की चाबी पा लेना। मूसा शायद यही चाहता था, और परमेश्वर ठीक यहीं रुक जाते हैं। "मैं जो हूँ सो हूँ" कोई परिभाषा नहीं देता; यह कहता है कि परमेश्वर किसी और चीज़ से परिभाषित नहीं होते। वे किसी नदी, तूफ़ान, फ़सल या राष्ट्र के देवता नहीं हैं जिनकी सीमा उनके कार्यक्षेत्र से तय हो। वे हैं, और उनका होना किसी पर निर्भर नहीं। पर ध्यान दीजिए कि यह घोषणा कहाँ आती है: दासों की चिल्लाहट सुनने के तुरंत बाद। जो अपने आप में पूर्ण है, वही नीचे उतरता है। परमेश्वर की स्वतंत्रता उन्हें दूर नहीं करती, वह उनके छुटकारा देने को अजेय बनाती है।
जोड़ने वाला धागा
इस नाम का धागा पूरे बाइबिल में खिंचा चला जाता है, और वह कहीं टूटता नहीं। इस्राएल का पूरा इतिहास इसी एक वाक्य की व्याख्या बन जाता है: जो हैं, वे वहाँ होते हैं जहाँ उनके लोग हैं, मिस्र में, जंगल में, निर्वासन में। भविष्यद्वक्ता बार-बार इसी नाम पर लौटते हैं जब सब कुछ ढह चुका होता है। और फिर, सदियों बाद, एक गलीली आदमी मंदिर के आँगन में खड़ा होकर कहता है कि अब्राहम के होने से पहले "मैं हूँ", और सुननेवाले पत्थर उठा लेते हैं, क्योंकि वे ठीक-ठीक समझ गए थे कि उसने कौन-सा नाम अपने ऊपर ले लिया है। यूहन्ना का सुसमाचार यीशु के मुँह में बार-बार यही दो शब्द रखता है। झाड़ी में जो आग बिना भस्म किए जलती रही, वह अंततः देह लेकर हमारे बीच बस गई।
दर्पण
हम नाम इसलिए माँगते हैं कि हाथ में कुछ पकड़ में आ जाए। आप भी शायद परमेश्वर से वही चाहते हैं जो मूसा चाहता था: एक गारंटी, एक सूत्र, एक ऐसा आश्वासन जिसे मिस्र जाते समय जेब में रखा जा सके। बैंक का बैलेंस कब ठीक होगा, रिपोर्ट क्या कहेगी, वह बेटा कब लौटेगा जिसने घर और विश्वास दोनों छोड़ दिए। और उत्तर आता है, पर वह उत्तर आपके नियंत्रण में नहीं आता। परमेश्वर खुद को देते हैं, अपनी योजना का नक्शा नहीं। यह खीझ पैदा करता है, और यही हमें बचाता भी है, क्योंकि जिस परमेश्वर को हम संभाल सकें वह हमें फ़िरौन के सामने नहीं खड़ा कर सकता। आज, अभी: एक काग़ज़ पर वह एक बात लिखिए जिसकी गारंटी आप परमेश्वर से चाहते हैं, और उसके नीचे ये शब्द लिखकर ज़ोर से पढ़िए, "जिसका नाम मैं हूँ है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।"
श्रोताओं का चेहरा
पहले सुननेवाले ईंट बनाते लोग थे, और बाद में वे जो जंगल में यह कहानी दोहराते थे। उनके चारों ओर मिस्र था, जहाँ हर देवता का नाम, मंदिर, पुरोहित और इलाक़ा तय था, और फ़िरौन खुद को देवता का पुत्र कहता था। उस दुनिया में "मैं जो हूँ सो हूँ" सुनना डरावना और मुक्तिदायक दोनों था। यह किसी नील नदी का देवता नहीं जो मिस्र की सीमा पर रुक जाए। चार सौ साल की चुप्पी के बाद उन्होंने यह नहीं सुना कि परमेश्वर कौन-से विभाग के मालिक हैं, बल्कि यह कि वे हैं, और उनका होना फ़िरौन की ताक़त से पहले भी था और उसके बाद भी रहेगा। दास के लिए इससे बड़ी ख़बर कोई नहीं।
मुख्य पात्र
इस दृश्य का मुख्य पात्र मूसा नहीं, वह आवाज़ है जो आग में से आती है। गौर कीजिए कि वे मूसा के सवालों पर नाराज़ नहीं होते। "मैं कौन हूँ" पर भी नहीं, "क्या नाम है" पर भी नहीं। वे बहस नहीं करते, वे उत्तर देते हैं, पर हर बार उत्तर को मूसा की पकड़ से थोड़ा ऊपर रखते हैं। यह परमेश्वर अपने बारे में कोई सफ़ाई नहीं देते, फिर भी अपने लोगों की चिल्लाहट पर "चित्त लगाया है"। यही इस चरित्र का तनाव है: पूर्ण स्वतंत्रता और गहरी संलग्नता एक साथ। जो किसी के मोहताज नहीं, वही दुख पर झुकते हैं। यह दया कमज़ोरी नहीं, चुनाव है।
एक बारीकी
इब्रानी में जो शब्द यहाँ है, "एह्येह", ठीक वही शब्द है जो दो पद पहले बोला गया था, जब परमेश्वर ने कहा, "निश्चय मैं तेरे संग रहूँगा।" वही क्रिया, वही रूप। यानी नाम और वादा एक ही धातु से गढ़े गए हैं। मूसा ने जो नाम सुना, वह अमूर्त दर्शन नहीं था, वह उसी वचन की गूँज थी जो अभी-अभी उसके कानों में पड़ा था। "मैं हूँ" का अर्थ है "मैं तेरे संग रहूँगा"। इसीलिए यह नाम ठंडा नहीं लगता। यह कहता है: तू मुझे नाप नहीं सकता, पर तू मुझ पर टिक सकता है, क्योंकि जहाँ तू जाएगा, वहाँ मैं पहले से हूँ।
चिंतन
परमेश्वर से आप इस समय कौन-सी गारंटी माँग रहे हैं, और यदि उसकी जगह केवल उनकी उपस्थिति मिले तो क्या वह आपके लिए काफ़ी होगी?
मूसा को नाम इसलिए मिला कि वह लौटकर दूसरों से बोल सके; आपके जीवन में वह "मिस्र" कौन-सा है जहाँ यह नाम लेकर लौटना है?
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Exodus 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
मूसा ने पूछा, "मैं कौन हूँ जो फ़िरौन के पास जाऊँ," और परमेश्वर ने उसकी पहचान पर बात ही नहीं की। उत्तर मिला, "निश्चय मैं तेरे संग रहूँगा।" और जो चिन्ह दिया गया वह आगे चलकर, इसी पहाड़ पर उपासना करते समय दिखेगा। यानी पक्का सबूत बाद में मिलेगा, पहले चलना होगा। तेरा सवाल भी शायद यही है, और उसका उत्तर भी वही एक है।
तब वे तेरी सुनेंगे," परमेश्वर मूसा से यह बात तब कहते हैं जब मूसा ने अभी एक शब्द भी नहीं बोला। सुनवाई का वादा बोलने से पहले मिल गया।
और ध्यान दे, मूसा को अकेले नहीं भेजा गया। पुरनियों को साथ लेकर जाना था। जिस बुलाहट से तू घबरा रहा है, उसमें परमेश्वर तेरे साथ लोग भी देता है और नतीजा भी अपने हाथ में रखता है।
तू बस कहने की हिम्मत जुटा।
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