निर्गमन 36
पाठ
मूसा बसलेल, ओहोलीआब और उन सब कारीगरों को बुलाते हैं जिनके हृदय में परमेश्वर ने बुद्धि डाली और जिनमें काम करने का उत्साह जागा। इस्राएली इतनी भेंटें लाते हैं कि कारीगर काम छोड़कर मूसा के पास आते हैं और कहते हैं, "जिस काम के करने की आज्ञा यहोवा ने दी है उसके लिये जितना चाहिये उससे अधिक वे ले आए हैं।" मूसा को पूरी छावनी में घोषणा करवानी पड़ती है कि कोई और भेंट न लाए। इसके बाद अध्याय का शेष भाग निवास के पर्दों, तख्तों, बेंड़ों और खम्भों के बनने का बारीक ब्योरा देता है।
मर्म
पूरे बाइबल में यही एकमात्र जगह है जहाँ चंदा इकट्ठा करना बन्द करवाना पड़ा। यह विस्तार संयोग नहीं है; लेखक चाहता है कि हम ठिठकें। कुछ ही हफ्ते पहले यही लोग अपने सोने के कुण्डल उतारकर बछड़ा ढलवा चुके थे। उदारता अपने आप में पुण्य नहीं है, वह उतनी ही आसानी से मूर्ति गढ़ सकती है जितनी आसानी से निवास। जो चीज़ यहाँ बदली है वह मात्रा नहीं, दिशा है: वही हाथ, वही सोना, पर अब परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार। और ध्यान दीजिए कि परमेश्वर का दिया हुआ वरदान यहाँ "बुद्धि" कहलाता है, ऐसी बुद्धि जो कपड़ा बुनती और लकड़ी मढ़ती है। आत्मा की भरपूरी का पहला वर्णन बाइबल में किसी उपदेशक के बारे में नहीं, एक कारीगर के बारे में है।
सूत्र
निवास इसलिए बन रहा है कि परमेश्वर अपनी प्रजा के बीच बसना चाहते हैं। पर्दों को अंकड़ों से जोड़ा जाता है ताकि "निवास मिलकर एक हो गया", और यही जुड़ाव पूरे अध्याय का स्वर है: अलग-अलग टुकड़े, एक ही नाप, एक ही संरचना। यह उस कहानी की ओर इशारा करता है जो यूहन्ना में पूरी होती है, जहाँ वचन देहधारी होकर हमारे बीच "तम्बू खड़ा" करता है। मसीह में परमेश्वर का बसना अब बबूल की लकड़ी और बकरी के बाल से नहीं, बल्कि एक शरीर से होता है, और उसके बाद उन लोगों से जिन्हें आत्मा जोड़ता है। अध्याय 36 का बीचवाला बेंड़ा, जो "एक सिरे से दूसरे सिरे तक" पहुँचता है, इस पूरी बात की छाया है।
दर्पण
यहाँ जो बात चुभती है वह यह है कि इन लोगों को रुकने के लिए कहना पड़ा। हममें से कितनों के बारे में यह कहना पड़ेगा? हम अपने बजट में परमेश्वर के काम के लिए एक जगह रखते हैं, सावधानी से नापी हुई, ताकि गाड़ी की किश्त, बच्चों की फीस और छुट्टी का प्लान न हिले। वह जगह कभी इतनी नहीं भर जाती कि कोई कहे, बस, अब और मत लाइए। दूसरी चुभन कारीगरों में है: उन्होंने अपना काम छोड़कर आकर ईमानदारी से बताया कि ज़रूरत से ज़्यादा आ गया है। जिनके हाथ में संसाधन थे, उन्होंने उसे रोककर नहीं रखा। दफ्तर में, कलीसिया की समिति में, घर के हिसाब-किताब में, यही परीक्षा है: जब आपके पास ज़रूरत से अधिक हो, क्या आप बोलते हैं या चुप रह जाते हैं?
अन्तर्पाठ
निर्गमन 32 इस अध्याय की छाया की तरह पीछे खड़ा है। वहाँ भी लोग स्वेच्छा से सोना लाए थे, और उससे बछड़ा बना। यह तुलना हमें बताती है कि दिल की उदारता को दिशा चाहिए, वरना वह भक्ति नहीं, आत्म-अभिव्यक्ति बन जाती है। दूसरी ओर 2 कुरिन्थियों 8 में पौलुस मकिदुनिया की कलीसियाओं की चर्चा करता है, जिन्होंने गरीबी में भी सामर्थ्य से बाहर देकर आग्रह किया कि उन्हें भी देने दिया जाए। वहाँ भी देना एक विनती बन गया, बोझ नहीं। दोनों जगह एक ही सच है: जहाँ अनुग्रह वास्तव में छू जाता है, वहाँ देना नियम से नहीं, दबाव के रिसने से होता है।
प्रश्न
तो क्या ज़्यादा देना भी गलत हो सकता है? मूसा की घोषणा असहज करती है। हम मानकर चलते हैं कि परमेश्वर के काम में सीमा नहीं होती। पर यहाँ सीमा है, और वह आज्ञा से तय होती है, हमारे उत्साह से नहीं। निवास एक नापा हुआ ढाँचा है: अट्ठाईस हाथ, चार हाथ, पचास फंदे। परमेश्वर ने जो माँगा वह पूरा हो गया, और उससे आगे लाना समर्पण नहीं, अपनी धार्मिकता का प्रदर्शन बनने लगता। इसका सहज उत्तर मैं नहीं दे सकता, क्योंकि हममें से अधिकांश इस समस्या के आसपास भी नहीं हैं। पर सवाल बना रहता है: क्या मेरा देना उस काम की सेवा कर रहा है जो परमेश्वर ने ठहराया, या मेरी अपनी छवि की?
पृष्ठभूमि
यह सीनै पर्वत की तलहटी है, मिस्र से निकले लगभग एक वर्ष के भीतर। ये लोग गुलाम थे; जो सोना, चाँदी और महीन कपड़ा वे ला रहे हैं, वह मिस्रियों से मिली विदाई-सम्पत्ति है, उनके दुःख का मुआवज़ा। रेगिस्तान में यही उनकी पूरी पूँजी थी, कोई बैंक नहीं, कोई खेत नहीं। और वे यह सब एक तम्बू के लिए दे रहे हैं। साथ ही यह अध्याय बछड़े के पाप और परमेश्वर की क्षमा के तुरन्त बाद आता है, इसलिए हवा में एक हल्कापन है, माफ किए गए लोगों का हल्कापन। बसलेल और ओहोलीआब यहूदा और दान गोत्र से हैं, यानी सबसे बड़े और सबसे हाशिये के गोत्र से; परमेश्वर का चुनाव सामाजिक क्रम की परवाह नहीं करता।
चिंतन
आपके बजट, कैलेंडर और ऊर्जा में वह कौन-सी जगह है जहाँ कोई आपसे कहेगा, "बस, अब और मत लाइए"?
कारीगरों ने बताया कि ज़रूरत से ज़्यादा आ गया है; आपके हाथ में जो अधिक है, उसके बारे में आप किससे और कब सच बोलेंगे?
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Exodus 36 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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निर्गमन 36 का क्या अर्थ है?
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Exodus 36 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, उन छोटे अंकड़ों की तरह मुझे भी जोड़ने वाला बना दे, तोड़ने वाला नहीं। जहाँ रिश्ते ढीले पड़ गए हैं, वहाँ मेरे शब्दों और धीरज से उन्हें कस दे। जो काम किसी की नज़र में नहीं आता, वही तू देखता है, और उसी से तेरा घर एक होता है।
उसने निवास के लिये बबूल की लकड़ी के खड़े तख्ते बनाए।" बबूल रेगिस्तान का साधारण, काँटेदार पेड़ है। परमेश्वर ने उसी लकड़ी को चुना, और हर तख्ता अकेले खड़ा नहीं था, दूसरों से जुड़कर ही निवास बना। तुम्हें भी लगता होगा कि तुम बस एक साधारण तख्ता हो। पर तुम्हारी जगह खाली रहेगी तो दीवार अधूरी रहेगी।
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