यहेजकेल 3
पाठ
परमेश्वर यहेजकेल को एक पुस्तक खिलाते हैं, और वह उसके मुँह में मधु जैसी मीठी लगती है; फिर उसी व्यक्ति को उन बंदियों के पास भेजा जाता है जो सुनने से इन्कार करेंगे, और इसीलिए उसका माथा "हीरे के तुल्य" कड़ा कर दिया जाता है। आत्मा उसे उठाकर तेलाबीब ले जाती है, जहाँ वह सात दिन व्याकुल होकर चुप बैठा रहता है; उसके बाद उसे "पहरुआ" ठहराया जाता है, और चेतावनी देने या न देने का पूरा लेखा उसके कंधों पर रखा जाता है। अंत में एक अजीब आदेश: घर के भीतर बैठ, द्वार बंद कर, मौन रह, और बोल तभी जब परमेश्वर तेरा मुँह खोलें।
मर्म
यह अध्याय एक बात बहुत साफ करता है: परमेश्वर का वचन पहले भीतर उतरता है, फिर बाहर निकलता है। "अपनी अंतड़ियाँ इससे भर ले" का मतलब यह नहीं कि यहेजकेल कुछ जानकारी याद कर ले, बल्कि कि वह संदेश उसकी पाचन-क्रिया का हिस्सा बन जाए, उसका खून बन जाए। और दूसरी बात, जो उतनी ही कड़ी है: सफलता बुलाहट की शर्त नहीं है। परमेश्वर पहले ही बता देते हैं कि लोग नहीं सुनेंगे, और फिर भी भेजते हैं। विश्वासयोग्यता की माप परिणाम नहीं, आज्ञाकारिता है। साथ ही पहरुए की जिम्मेदारी दिखाती है कि परमेश्वर दुष्ट की मृत्यु नहीं चाहते; वे चेतावनी भेजते हैं ताकि वह "अपना दुष्ट मार्ग छोड़कर जीवित रहे।" न्याय की घोषणा भी अनुग्रह का एक रूप है।
सूत्र
खाई हुई पुस्तक पूरे बाइबल में गूँजती है। प्रकाशितवाक्य 10 में यूहन्ना को भी एक छोटी पुस्तक खाने को दी जाती है, मुँह में मीठी और पेट में कड़वी: परमेश्वर के दूतों का अनुभव सदियों बाद भी वही रहता है। और इस पूरे चित्र की चरम-परिणति वह है जिसके बारे में यूहन्ना लिखता है कि वचन देह बन गया। यहेजकेल को वचन निगलना पड़ा; मसीह स्वयं वचन थे, और उन्होंने यरूशलेम पर आँसू बहाए क्योंकि वह सुनना नहीं चाहता था। यहेजकेल का माथा कड़ा किया गया; मसीह का चेहरा यरूशलेम की ओर दृढ़ किया गया, और उस चेहरे पर थूका गया। पहरुए का लेखा भी अंत में उन पर आता है जो हमारे खून का लेखा अपने ऊपर लेते हैं।
आईना
पूछिए अपने आप से, ईमानदारी से: आप पढ़ाते, बोलते, गवाही देते समय वास्तव में क्या चाहते हैं? कि लोग सुनें, या कि लोग आपको पसंद करें? यहेजकेल को ठीक इस जगह चोट लगती है। परमेश्वर कहते हैं, "न उनके मुँह देखकर तेरा मन कच्चा हो।" चेहरे पढ़ना हमारी सबसे गहरी लत है: पति का उठा हुआ भौंह, बेटी की ऊब, बॉस की चुप्पी, समूह में वह एक व्यक्ति जो हाथ मोड़कर बैठा है। हम सच को उतना ही बोलते हैं जितना चेहरे अनुमति दें। और दूसरी ओर, वह सात दिन की चुप्पी हमें भी आईना दिखाती है: हम जिस दर्द को समझे बिना उस पर राय दे देते हैं, यहेजकेल उसमें सात दिन बैठा रहा। वचन मीठा था, पर पेट में उतरने पर कड़वा लगा, क्योंकि उसने लोगों से प्यार किया।
आज, दस मिनट में: एक कागज पर वह एक सच्ची बात लिखिए जो आप किसी खास व्यक्ति से कहने से डरते हैं, उसका नाम ऊपर लिखिए, और नीचे लिख दीजिए: "चाहे वे सुनें, या न सुनें।" फिर उस कागज को अपनी बाइबल में रख दीजिए और उस नाम के लिए प्रार्थना कीजिए।
एक बारीकी
पद 14 पर रुकिए: "मैं कठिन दुःख से भरा हुआ, और मन में जलता हुआ चला गया।" तीन पद पहले वही पुस्तक मधु जैसी मीठी थी। यह विरोधाभास नहीं, यह सच्चे बुलाहट का स्वाद है। इब्रानी शब्द "मार" का अर्थ है कड़वा, वही कड़वाहट जो नाओमी ने अपने नाम में ढाल ली थी। परमेश्वर का वचन मीठा है क्योंकि वह परमेश्वर का है; और कड़वा है क्योंकि उसकी विषयवस्तु विनाश है और उसके सुननेवाले आपके अपने लोग हैं। जो व्यक्ति परमेश्वर का संदेश बिना कड़वाहट के, हल्के मन से, लगभग मज़े से सुनाता है, उसने अभी उसे निगला नहीं, केवल चखा है। और ध्यान दें: उसी वाक्य में लिखा है, "यहोवा की शक्ति मुझ में प्रबल थी।" कड़वाहट और सामर्थ्य साथ-साथ चलते हैं।
शास्त्र का संवाद
यिर्मयाह भी कहता है कि परमेश्वर के वचन उसे मिले और उसने उन्हें खा लिया, और वे उसके हृदय के हर्ष थे; फिर वही यिर्मयाह परमेश्वर से झगड़ता है कि उसने उसे धोखा दिया। यहेजकेल 3 उसी तनाव का दूसरा रूप है, पर यहाँ परमेश्वर यह तनाव छिपाते नहीं, पहले ही बता देते हैं। और यहेजकेल 33 में पहरुए की यही तस्वीर दोहराई जाती है, लेकिन तब यरूशलेम गिर चुका है और लोग सुनने को तैयार हैं। एक ही आदेश, दो अलग घड़ियाँ: पहले बंद कानों के सामने, बाद में टूटे हृदयों के सामने। जो आज अनसुना लगता है, वह कल उन्हीं लोगों की एकमात्र आशा बन सकता है।
पहले सुननेवाले
कबार नदी के किनारे तेलाबीब में बैठे वे लोग 597 ईसा पूर्व में बाबेल ले आए गए बंदी थे, पढ़े-लिखे, सम्मानित, और अब जड़ से उखड़े हुए। यरूशलेम अभी खड़ा था, मंदिर अभी चल रहा था, और अफवाहें थीं कि जल्दी वापसी होगी। उनके कानों में यहेजकेल का संदेश राजद्रोह जैसा लगा होगा। पर एक बात ने उन्हें हिला दिया होगा: परमेश्वर का तेज, जो मंदिर में बंद माना जाता था, उन्हें बेबीलोन की नहर के किनारे दिखा। वे जिसे परमेश्वर की अनुपस्थिति समझ रहे थे, वहाँ परमेश्वर बोल रहे थे। निर्वासन परमेश्वर से दूरी नहीं था; वह परमेश्वर के वचन का नया पता था।
चिंतन के प्रश्न
आपके बोलने और चुप रहने का फैसला ज्यादातर किसके चेहरे से तय होता है, और परमेश्वर उस चेहरे की जगह क्या रखना चाहते हैं?
आपने परमेश्वर का वचन पिछली बार कब "निगला" था, यानी कब वह आपको मीठा और कड़वा, दोनों लगा?
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Ezekiel 3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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