बाइबल व्याख्या

यहेजकेल 36:26

बाइबल

पाठ

बाबेल की नहर के किनारे, निर्वासितों की बस्ती में, एक आवाज़ उठती है जो न धमकी देती है और न शर्त रखती है, केवल वादा करती है: "मैं तुम को नया मन दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा; और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुम को माँस का हृदय दूँगा।" कल्पना कीजिए उन चेहरों की जो यह सुन रहे हैं। वे लोग जिनका मन्दिर राख हो चुका है, जिनके बेटे तलवार से गिरे, जिनके पड़ोसी हँसते हैं, "ये यहोवा की प्रजा हैं, परन्तु उसके देश से निकाले गए हैं।" उनसे नहीं कहा जाता, "सुधर जाओ।" उनसे कहा जाता है: तुम्हारे भीतर जो पत्थर हो गया है, उसे मैं स्वयं निकालूँगा। शल्यक्रिया परमेश्वर करेंगे, रोगी केवल लेटा रहेगा।

मर्म

यहाँ चोट खाने लायक कुछ है। परमेश्वर यह नहीं कहते कि इस्राएल के मन में अभी भी कोई अच्छाई बची है जिसे जगाया जा सके। वे कहते हैं: वह हृदय पत्थर है। पत्थर सुनता नहीं, पिघलता नहीं, बढ़ता नहीं। उसे सुधारा नहीं जा सकता, केवल बदला जा सकता है। और इससे भी अधिक चुभने वाली बात पिछले पदों में खड़ी है: "मैं इसको तुम्हारे निमित्त नहीं, परन्तु अपने पवित्र नाम के निमित्त करता हूँ।" यह अनुग्रह है, पर ऐसा अनुग्रह जो हमारी योग्यता को पूरी तरह चुप करा देता है। परमेश्वर अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए हमें बचाते हैं, और ठीक इसीलिए यह बचाव टिकाऊ है। जो उद्धार मेरी दृढ़ता पर टिका हो, वह मेरी अगली असफलता तक ही जीवित रहता है। जो उनके नाम पर टिका हो, वह उनके साथ ही अटल रहता है।

सूत्र

निर्वासन की मिट्टी में बोया गया यह वादा वहीं नहीं रुकता। अगले ही पद में परमेश्वर कहते हैं, "मैं अपना आत्मा तुम्हारे भीतर देकर ऐसा करूँगा कि तुम मेरी विधियों पर चलोगे," और यहीं वह रेखा खिंचती है जो सीधे पिन्तेकुस्त तक जाती है। पुरानी वाचा में व्यवस्था पत्थर की पटियाओं पर लिखी गई थी और हृदय पत्थर का रह गया; नई वाचा में पटिया हटती नहीं, पर लिखने की जगह बदल जाती है। जब यीशु मसीह ने रात में नीकुदेमुस से कहा कि जल और आत्मा से नया जन्म लेना होगा, तो वे कोई नई बात नहीं गढ़ रहे थे, वे इस्राएल के एक शिक्षक से पूछ रहे थे कि यहेजकेल का यह पद तूने पढ़ा क्यों नहीं। पद 25 का शुद्ध जल और पद 26 का नया मन, दोनों मिलकर वही हैं जिसे मसीह ने ऊपर से जन्म कहा।

दर्पण

पत्थर का हृदय कोई नाटकीय पाप नहीं होता। वह धीरे-धीरे बनता है। वह उस भाई का नाम है जिसका फ़ोन आप अब नहीं उठाते और अब बुरा भी नहीं लगता। वह वह विवाह है जिसमें झगड़े बंद हो गए क्योंकि उम्मीद बंद हो गई। वह वह प्रार्थना है जो आप रोज़ करते हैं और जिसका एक शब्द भी अब भीतर तक नहीं पहुँचता। पत्थर होने की सबसे बड़ी पहचान यही है कि पत्थर को अपना पत्थरपन महसूस नहीं होता। और यही इस पद की राहत है: आपको अपने भीतर संवेदना जगाने का बल जुटाना नहीं है, क्योंकि वह बल आपके पास है ही नहीं। जिसने पत्थर को पहचाना है, वही उसे निकालेंगे। आज एक कागज़ पर उस एक व्यक्ति या स्थिति का नाम लिखिए जहाँ आपका मन सुन्न हो चुका है, और उस नाम को सामने रखकर पद 26 ज़ोर से बोलकर परमेश्वर से माँगिए कि वहाँ माँस का हृदय दें।

मुख्य पात्र

इस पूरे खण्ड में क्रियाओं के कर्ता को गिनिए: मैं ले लूँगा, मैं इकट्ठा करूँगा, मैं छिड़कूँगा, मैं दूँगा, मैं निकालूँगा, मैं अपना आत्मा दूँगा। इस्राएल इस वाक्य-विन्यास में कहीं भी कर्ता नहीं, केवल कर्म है। यही इस अध्याय का परमेश्वर है: वह जो अपनी प्रजा की बेशर्मी से थका नहीं, पर जिसकी प्रेरणा भावुक दया नहीं, बल्कि अपने नाम की पवित्रता है। और फिर भी इस कठोर तर्क के भीतर अद्भुत कोमलता है। वे शल्यचिकित्सक की तरह काटते हैं, पर घाव खाली नहीं छोड़ते; निकाले गए पत्थर की जगह वे धड़कता हुआ माँस रखते हैं। जो परमेश्वर जलजलाहट में बिखेर सकते हैं, वही करुणा में पुनर्निर्माण करते हैं, और दोनों बार कारण एक ही है: वे यहोवा हैं।

श्रोताओं का परिचय

ये लोग तत्त्वज्ञानी नहीं थे, शरणार्थी थे। 587 ईसा पूर्व के बाद बाबेल में बैठे वे जानते थे कि प्राचीन संसार में देशों की हार का मतलब देवताओं की हार होती थी। उनकी शर्मिंदगी व्यक्तिगत नहीं, धार्मिक थी: पड़ोसी जातियाँ उनकी दुर्दशा देखकर यहोवा की सामर्थ्य पर हँसती थीं। इसलिए जब उन्होंने सुना कि परमेश्वर अपने नाम के निमित्त काम करेंगे, तो उनके कानों में यह अपमान नहीं, आश्वासन था। और ध्यान दीजिए कि यह वादा केवल भीतरी अनुभव का नहीं है। इसके साथ खेत, फल, बसे हुए नगर, मिटे हुए अकाल जुड़े हैं। नया हृदय और जुती हुई ज़मीन एक ही वाक्य के दो हिस्से हैं, क्योंकि परमेश्वर का उद्धार आत्मा को बचाकर शरीर को छोड़ नहीं देता।

अन्तर्पाठ

यहेजकेल इसी वादे को पहले भी बोल चुके हैं, अध्याय 11 में, जब यरूशलेम अभी खड़ा था; वहाँ यह चेतावनी के बीच आशा की किरण थी, यहाँ यह खण्डहरों पर खड़ा घोषणापत्र है। और इसके ठीक बाद अध्याय 37 में सूखी हड्डियों की घाटी आती है, जहाँ वही आत्मा मुर्दा शरीरों में साँस भरती है। दोनों दृश्य एक ही सत्य के दो चित्र हैं: इस्राएल के पास खोई हुई क्षमता नहीं, मृत्यु है, और मृत्यु का इलाज सुधार नहीं, पुनरुत्थान है। इसीलिए इब्रानियों की चिट्ठी में छिड़काव और शुद्ध किए गए विवेक की भाषा लौटती है, मानो यहेजकेल का पद 25 और 26 मसीह के लहू में अपनी पूर्ति पा गए हों।

चिंतन

आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा आपने चुपचाप "अब यह नहीं बदलेगा" कहकर बंद कर दिया है, और क्या आप उसे परमेश्वर की शल्यक्रिया की मेज़ पर रखने को तैयार हैं?

यदि आपका उद्धार आपकी योग्यता पर नहीं, परमेश्वर के नाम की प्रतिष्ठा पर टिका है, तो इससे आपकी असफलताओं के प्रति आपका रवैया व्यावहारिक रूप से कैसे बदलना चाहिए?

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The Message of Ezekiel

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Ezekiel 36:26 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यहेजकेल 36:26 का क्या अर्थ है?
बाबेल की नहर के किनारे, निर्वासितों की बस्ती में, एक आवाज़ उठती है जो न धमकी देती है और न शर्त रखती है, केवल वादा करती है: "मैं तुम को नया मन दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा; और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुम को माँस का हृदय दूँगा।" कल्पना कीजिए उन चेहरों की जो यह सुन रहे हैं। वे लोग जिनका मन्दिर राख हो चुका है, जिनके बेटे तलवार से गिरे, जिनके पड़ोसी हँसते हैं, "ये यहोवा की प्रजा हैं, परन्तु उसके देश से निकाले गए हैं।" उनसे नहीं कहा जाता, "सुधर जाओ।" उनसे कहा जाता है: तुम्हारे भीतर जो पत्थर हो गया है, उसे मैं स्वयं निकालूँगा। शल्यक्रिया परमेश्वर करेंगे, रोगी केवल लेटा रहेगा।
यहेजकेल 36:26 किस विषय में है?
निर्वासन की मिट्टी में बोया गया यह वादा वहीं नहीं रुकता। अगले ही पद में परमेश्वर कहते हैं, "मैं अपना आत्मा तुम्हारे भीतर देकर ऐसा करूँगा कि तुम मेरी विधियों पर चलोगे," और यहीं वह रेखा खिंचती है जो सीधे पिन्तेकुस्त तक जाती है। पुरानी वाचा में व्यवस्था पत्थर की पटियाओं पर लिखी गई थी और हृदय पत्थर का रह गया; नई वाचा में पटिया हटती नहीं, पर लिखने की जगह बदल जाती है। जब यीशु मसीह ने रात में नीकुदेमुस से कहा कि जल और आत्मा से नया जन्म लेना होगा, तो वे कोई नई बात नहीं गढ़ रहे थे, वे इस्राएल के एक शिक्षक से पूछ रहे थे कि यहेजकेल का यह पद तूने पढ़ा क्यों नहीं। पद 25 का शुद्ध जल और पद 26 का नया मन, दोनों मिलकर वही हैं जिसे मसीह ने ऊपर से जन्म कहा।
यहेजकेल 36:26 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इस पूरे खण्ड में क्रियाओं के कर्ता को गिनिए: मैं ले लूँगा, मैं इकट्ठा करूँगा, मैं छिड़कूँगा, मैं दूँगा, मैं निकालूँगा, मैं अपना आत्मा दूँगा। इस्राएल इस वाक्य-विन्यास में कहीं भी कर्ता नहीं, केवल कर्म है। यही इस अध्याय का परमेश्वर है: वह जो अपनी प्रजा की बेशर्मी से थका नहीं, पर जिसकी प्रेरणा भावुक दया नहीं, बल्कि अपने नाम की पवित्रता है। और फिर भी इस कठोर तर्क के भीतर अद्भुत कोमलता है। वे शल्यचिकित्सक की तरह काटते हैं, पर घाव खाली नहीं छोड़ते; निकाले गए पत्थर की जगह वे धड़कता हुआ माँस रखते हैं। जो परमेश्वर जलजलाहट में बिखेर सकते हैं, वही करुणा में पुनर्निर्माण करते हैं, और दोनों बार कारण एक ही है: वे यहोवा हैं।
यहेजकेल 36:26 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यहेजकेल इसी वादे को पहले भी बोल चुके हैं, अध्याय 11 में, जब यरूशलेम अभी खड़ा था; वहाँ यह चेतावनी के बीच आशा की किरण थी, यहाँ यह खण्डहरों पर खड़ा घोषणापत्र है। और इसके ठीक बाद अध्याय 37 में सूखी हड्डियों की घाटी आती है, जहाँ वही आत्मा मुर्दा शरीरों में साँस भरती है। दोनों दृश्य एक ही सत्य के दो चित्र हैं: इस्राएल के पास खोई हुई क्षमता नहीं, मृत्यु है, और मृत्यु का इलाज सुधार नहीं, पुनरुत्थान है। इसीलिए इब्रानियों की चिट्ठी में छिड़काव और शुद्ध किए गए विवेक की भाषा लौटती है, मानो यहेजकेल का पद 25 और 26 मसीह के लहू में अपनी पूर्ति पा गए हों।
यहेजकेल 36:26 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि आपका उद्धार आपकी योग्यता पर नहीं, परमेश्वर के नाम की प्रतिष्ठा पर टिका है, तो इससे आपकी असफलताओं के प्रति आपका रवैया व्यावहारिक रूप से कैसे बदलना चाहिए?
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Ezekiel 36 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 14

धन्यवाद, प्रभु, कि आपने ठान लिया है कि जो भूमि निगलती और उजाड़ती रही, वह फिर मनुष्यों को न खाएगी और अपने लोगों को निर्वंश न करेगी। जहाँ हमारे जीवन में बार बार नुकसान का चक्र चलता रहा, वहाँ आपका वचन उसे तोड़ता है। आपने हमें उजड़ने के लिए नहीं, बसने के लिए बुलाया है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 36

मुझ यहोवा ही ने इस उजड़े हुए स्थान को बनाया और उसमें पौधे लगाए हैं।" ध्यान दे, परमेश्वर उजड़े हुए को छोड़कर कहीं नया बाग़ नहीं लगाता। वह उसी खंडहर पर काम शुरू करता है जिसे तू छिपाना चाहता है। और वह वादा जोड़ता है, "मैं ऐसा ही करूँगा।" तेरे जीवन का वह सूना कोना उसके हाथ के लिए बहुत ज़्यादा नहीं है।

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