बाइबल व्याख्या

यहेजकेल 36:24

बाइबल

पाठ

एक ही वाक्य में तीन क्रियाएँ, और तीनों का कर्ता परमेश्वर स्वयं हैं: "मैं तुम को जातियों में से ले लूँगा, और देशों में से इकट्ठा करूँगा; और तुम को तुम्हारे निज देश में पहुँचा दूँगा।" यह आयत बिखरे हुए लोगों से कहती है कि उन्हें वहाँ से उठाया जाएगा जहाँ वे फेंक दिए गए थे, बटोरा जाएगा जैसे कोई गिरे हुए दानों को बटोरता है, और उस भूमि पर रखा जाएगा जो उनकी अपनी है। इस्राएल यहाँ कुछ नहीं करता, न लौटने का निर्णय लेता, न पश्चाताप की शर्त पूरी करता। वह केवल वह है जिसे ले जाया जाता है। और ध्यान दीजिए कि यह वचन उस परिच्छेद के ठीक बीच में खड़ा है जहाँ अभी-अभी परमेश्वर ने कहा था, "मैं इसको तुम्हारे निमित्त नहीं करता।"

मर्म

यहाँ रुककर पूछने लायक एक प्रश्न है: परमेश्वर पहले शुद्ध क्यों नहीं करते, फिर इकट्ठा क्यों नहीं करते? क्रम उल्टा लगता है। शुद्ध जल छिड़कना, नया मन देना, आत्मा भीतर रखना, ये सब आयत 25 से आगे आते हैं। पहले वे अशुद्ध लोगों को, उन्हीं लोगों को जिनकी चाल चलन को उन्होंने ऋतुमती की अशुद्धता कहा था, अपने देश में ले आते हैं। अनुग्रह परिवर्तन के बाद नहीं, पहले आता है। यह बात हमारे भीतर की उस गहरी धारणा को तोड़ती है कि परमेश्वर की निकटता योग्यता का इनाम है। परन्तु यहाँ एक अँधेरा कोना भी है जिसे हम जल्दी रोशन नहीं कर सकते: यदि यह उनके निमित्त नहीं, तो क्या वे केवल परमेश्वर के नाम की प्रतिष्ठा का साधन हैं? या क्या यही सबसे सुरक्षित आधार है, कि मेरा उद्धार मेरी स्थिरता पर नहीं, उनके नाम की पवित्रता पर टिका है?

सूत्र

बटोरना परमेश्वर का पुराना काम है। जो बिखरा है उसे इकट्ठा करना उनकी पहचान है, जैसे चरवाहा जो भेड़ों को गिनता है, और यहेजकेल इस अध्याय के अंत में ठीक यही चित्र उठाते हैं: उजड़े नगर "अनगिनत मनुष्यों के झुण्डों से भर जाएँगे।" जब यीशु मसीह अपने आप को अच्छा चरवाहा कहते हैं और कहते हैं कि उनकी और भी भेड़ें हैं जिन्हें वे लाएँगे, तो वे इसी वचन के भीतर से बोल रहे हैं। परन्तु सूत्र केवल चित्र का नहीं है। यहाँ जो तीन क्रियाएँ हैं, ले लेना, इकट्ठा करना, पहुँचा देना, वही क्रूस पर पूरी होती हैं: वहाँ परमेश्वर अपने नाम की पवित्रता और बिखरे हुओं की वापसी को एक साथ जोड़ देते हैं। और फिर भी हम अभी भी बिखरे हुए हैं, अभी भी लौटाए जाने की प्रतीक्षा में। वादा पूरा हुआ है और अब भी पूरा हो रहा है।

दर्पण

आप जानते हैं कि बिखर जाना क्या है। वह बिखराव हमेशा भौगोलिक नहीं होता। कभी वह एक टूटा हुआ परिवार है जिसके सदस्य त्योहारों पर अलग-अलग कमरों में बैठते हैं; कभी वह आपका अपना भीतर है, जहाँ सुबह की प्रार्थना और दोपहर के निर्णय एक-दूसरे को नहीं पहचानते। हम सोचते हैं कि पहले हमें अपने टुकड़े जोड़ने होंगे, फिर परमेश्वर हमें स्वीकारेंगे। यह आयत उस क्रम को उलट देती है, और यही बात सबसे अधिक खटकती है: हम ऐसे अनुग्रह पर भरोसा नहीं करना चाहते जिसमें हमारा कोई योगदान न हो। क्योंकि जो मैंने नहीं कमाया, उस पर मेरा नियंत्रण भी नहीं है। आज एक काम कीजिए: कागज़ पर अपने जीवन का वह एक हिस्सा लिखिए जिसे आप अब भी परमेश्वर के सामने लाने योग्य नहीं मानते, और उस कागज़ को हाथ में लेकर ज़ोर से कहिए, "मैं तुम को जातियों में से ले लूँगा।"

पृष्ठभूमि

यहेजकेल बाबेल में बोल रहे हैं, कबार नदी के किनारे बसी निर्वासितों की बस्ती में। यरूशलेम गिर चुका है, मंदिर जल चुका है, राजा अंधा करके ले जाया जा चुका है। उस संसार में हार केवल सैनिक नहीं, धार्मिक घटना थी: जिस जाति का देश छिन जाए, उसके देवता को दुर्बल माना जाता था। इसीलिए आयत 20 में वह ताना लिखा है, "ये यहोवा की प्रजा हैं, परन्तु उसके देश से निकाले गए हैं।" निर्वासित लोग दोहरे बोझ के नीचे जी रहे थे, अपने पाप की शर्म और अपने परमेश्वर के अपमान की। उन्हें लौटने की कोई राजनीतिक संभावना नहीं दिखती थी। साम्राज्य लोगों को इसीलिए उखाड़कर बसाता था कि वे कभी लौट न सकें। इसी असंभवता के बीच यह वचन गिरता है।

एक बारीकी

"इकट्ठा करूँगा" शब्द पर ठहरिए। इब्रानी में यह क़ाबाट्स है, वही क्रिया जो चरवाहे के भेड़ बटोरने और किसान के अनाज समेटने दोनों के लिए चलती है। इसमें एक धीमापन है जो "ले लूँगा" में नहीं। उठाना एक झटके का काम है; बटोरना झुकने का काम है, एक-एक करके, जहाँ कुछ भी छूट न जाए। परमेश्वर यह नहीं कहते कि वे एक बड़े समूह को लौटा देंगे। वे कहते हैं कि वे देशों में से, बहुवचन में, बिखरे हुओं को समेटेंगे। इसका अर्थ है कि वे जानते हैं कौन कहाँ गिरा है। निर्वासन में सबसे बड़ा डर गुमनामी थी, भीड़ में खो जाना। यह एक क्रिया कहती है: कोई दाना अनजाना नहीं है।

पहले सुननेवाले

उन्होंने इसे कैसे सुना होगा? मुझे लगता है, पहले अविश्वास के साथ। जो लोग दो पीढ़ियों से विदेश में खेत जोत रहे थे, उनके लिए "निज देश" शब्द केवल बुज़ुर्गों की कहानी था। फिर शायद राहत के साथ, और उसके तुरंत बाद चुभन के साथ, क्योंकि आयत 32 उन्हें लज्जित होने को कहती है। उद्धार और शर्म यहाँ एक ही साँस में आते हैं। हम इस जोड़ को अजीब पाते हैं, पर उनके लिए यही प्रमाण था कि यह वचन सच्चा है: कोई झूठा भविष्यद्वक्ता ऐसा सुख नहीं बेचता जिसमें आईना भी शामिल हो। उन्होंने यह भी सुना होगा कि परमेश्वर ने उन्हें छोड़ा नहीं, केवल दूर रखा था, और अब स्वयं लेने आ रहे हैं।

चिंतन

जिस बात के लिए मैं अब भी सोचता हूँ कि पहले मुझे सुधरना होगा, तब परमेश्वर पास आएँगे, वह क्या है, और इस आयत का क्रम उसके बारे में क्या कहता है?

यदि मेरा उद्धार मेरे निमित्त नहीं बल्कि परमेश्वर के नाम के निमित्त है, तो क्या यह मुझे छोटा करता है या सुरक्षित, और मेरा यह उत्तर मेरे बारे में क्या बताता है?

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The Message of Ezekiel

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Ezekiel 36:24 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यहेजकेल 36:24 का क्या अर्थ है?
एक ही वाक्य में तीन क्रियाएँ, और तीनों का कर्ता परमेश्वर स्वयं हैं: "मैं तुम को जातियों में से ले लूँगा, और देशों में से इकट्ठा करूँगा; और तुम को तुम्हारे निज देश में पहुँचा दूँगा।" यह आयत बिखरे हुए लोगों से कहती है कि उन्हें वहाँ से उठाया जाएगा जहाँ वे फेंक दिए गए थे, बटोरा जाएगा जैसे कोई गिरे हुए दानों को बटोरता है, और उस भूमि पर रखा जाएगा जो उनकी अपनी है। इस्राएल यहाँ कुछ नहीं करता, न लौटने का निर्णय लेता, न पश्चाताप की शर्त पूरी करता। वह केवल वह है जिसे ले जाया जाता है। और ध्यान दीजिए कि यह वचन उस परिच्छेद के ठीक बीच में खड़ा है जहाँ अभी-अभी परमेश्वर ने कहा था, "मैं इसको तुम्हारे निमित्त नहीं करता।"
यहेजकेल 36:24 किस विषय में है?
बटोरना परमेश्वर का पुराना काम है। जो बिखरा है उसे इकट्ठा करना उनकी पहचान है, जैसे चरवाहा जो भेड़ों को गिनता है, और यहेजकेल इस अध्याय के अंत में ठीक यही चित्र उठाते हैं: उजड़े नगर "अनगिनत मनुष्यों के झुण्डों से भर जाएँगे।" जब यीशु मसीह अपने आप को अच्छा चरवाहा कहते हैं और कहते हैं कि उनकी और भी भेड़ें हैं जिन्हें वे लाएँगे, तो वे इसी वचन के भीतर से बोल रहे हैं। परन्तु सूत्र केवल चित्र का नहीं है। यहाँ जो तीन क्रियाएँ हैं, ले लेना, इकट्ठा करना, पहुँचा देना, वही क्रूस पर पूरी होती हैं: वहाँ परमेश्वर अपने नाम की पवित्रता और बिखरे हुओं की वापसी को एक साथ जोड़ देते हैं। और फिर भी हम अभी भी बिखरे हुए हैं, अभी भी लौटाए जाने की प्रतीक्षा में। वादा पूरा हुआ है और अब भी पूरा हो रहा है।
यहेजकेल 36:24 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यहेजकेल बाबेल में बोल रहे हैं, कबार नदी के किनारे बसी निर्वासितों की बस्ती में। यरूशलेम गिर चुका है, मंदिर जल चुका है, राजा अंधा करके ले जाया जा चुका है। उस संसार में हार केवल सैनिक नहीं, धार्मिक घटना थी: जिस जाति का देश छिन जाए, उसके देवता को दुर्बल माना जाता था। इसीलिए आयत 20 में वह ताना लिखा है, "ये यहोवा की प्रजा हैं, परन्तु उसके देश से निकाले गए हैं।" निर्वासित लोग दोहरे बोझ के नीचे जी रहे थे, अपने पाप की शर्म और अपने परमेश्वर के अपमान की। उन्हें लौटने की कोई राजनीतिक संभावना नहीं दिखती थी। साम्राज्य लोगों को इसीलिए उखाड़कर बसाता था कि वे कभी लौट न सकें। इसी असंभवता के बीच यह वचन गिरता है।
यहेजकेल 36:24 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
उन्होंने इसे कैसे सुना होगा? मुझे लगता है, पहले अविश्वास के साथ। जो लोग दो पीढ़ियों से विदेश में खेत जोत रहे थे, उनके लिए "निज देश" शब्द केवल बुज़ुर्गों की कहानी था। फिर शायद राहत के साथ, और उसके तुरंत बाद चुभन के साथ, क्योंकि आयत 32 उन्हें लज्जित होने को कहती है। उद्धार और शर्म यहाँ एक ही साँस में आते हैं। हम इस जोड़ को अजीब पाते हैं, पर उनके लिए यही प्रमाण था कि यह वचन सच्चा है: कोई झूठा भविष्यद्वक्ता ऐसा सुख नहीं बेचता जिसमें आईना भी शामिल हो। उन्होंने यह भी सुना होगा कि परमेश्वर ने उन्हें छोड़ा नहीं, केवल दूर रखा था, और अब स्वयं लेने आ रहे हैं।
यहेजकेल 36:24 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि मेरा उद्धार मेरे निमित्त नहीं बल्कि परमेश्वर के नाम के निमित्त है, तो क्या यह मुझे छोटा करता है या सुरक्षित, और मेरा यह उत्तर मेरे बारे में क्या बताता है?
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Ezekiel 36 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 14

धन्यवाद, प्रभु, कि आपने ठान लिया है कि जो भूमि निगलती और उजाड़ती रही, वह फिर मनुष्यों को न खाएगी और अपने लोगों को निर्वंश न करेगी। जहाँ हमारे जीवन में बार बार नुकसान का चक्र चलता रहा, वहाँ आपका वचन उसे तोड़ता है। आपने हमें उजड़ने के लिए नहीं, बसने के लिए बुलाया है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 36

मुझ यहोवा ही ने इस उजड़े हुए स्थान को बनाया और उसमें पौधे लगाए हैं।" ध्यान दे, परमेश्वर उजड़े हुए को छोड़कर कहीं नया बाग़ नहीं लगाता। वह उसी खंडहर पर काम शुरू करता है जिसे तू छिपाना चाहता है। और वह वादा जोड़ता है, "मैं ऐसा ही करूँगा।" तेरे जीवन का वह सूना कोना उसके हाथ के लिए बहुत ज़्यादा नहीं है।

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