बाइबल व्याख्या

एज्रा 1:2

बाइबल

पाठ

फारस का सम्राट कुस्रू, उस समय की सबसे बड़ी शक्ति का स्वामी, एक राजकीय घोषणा जारी करता है और उसमें वह अपने विजयों का श्रेय अपनी सेना या अपने देवताओं को नहीं, बल्कि इस्राएल के परमेश्वर को देता है: "स्वर्ग के परमेश्वर यहोवा ने पृथ्वी भर का राज्य मुझे दिया है।" और उसी साँस में वह आगे कहता है कि इस परमेश्वर ने उसे एक आदेश दिया है, कोई विशाल साम्राज्यिक परियोजना नहीं, बल्कि एक छोटे से उजड़े हुए नगर में एक भवन खड़ा करना: "यहूदा के यरूशलेम में मेरा एक भवन बनवा।" विश्व का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति खुद को किसी और के आदेश के नीचे रखता है, और वह आदेश एक खंडहर नगर की ओर इशारा करता है।

मर्म

यह पद्य परमेश्वर के बारे में दो बातें एक साथ कहता है, और वे दोनों ही असहज रूप से बड़ी हैं। पहली: वे "स्वर्ग के परमेश्वर" हैं, यानी किसी एक जाति के कुलदेवता नहीं, बल्कि वह जिसके हाथ में "पृथ्वी भर का राज्य" है और जो उसे जिसे चाहे सौंप देते हैं। बाबेल के विनाश ने यह शंका पैदा की थी कि यहोवा हार गए; यहाँ उत्तर आता है कि वे कभी सिंहासन से उतरे ही नहीं थे। दूसरी, और अधिक चौंकाने वाली: यह सर्वभौम परमेश्वर अपनी शक्ति का उपयोग किसी साम्राज्य को पाने के लिए नहीं, बल्कि अपने लोगों के बीच फिर से बसने के लिए करते हैं। सारी विश्व-राजनीति एक भवन की नींव पर आकर टिकती है, क्योंकि परमेश्वर का उद्देश्य शासन करना मात्र नहीं, वरन् निवास करना है।

सूत्र

भवन बनाने की यह आज्ञा अचानक नहीं आई। अदन से लेकर मरुभूमि के तम्बू तक, परमेश्वर की कहानी बार-बार एक ही दिशा में बहती है: वे अपने लोगों के बीच रहना चाहते हैं। बाबेल का निर्वासन उस कहानी का सबसे अँधेरा मोड़ था, क्योंकि वहाँ मंदिर जल चुका था और ऐसा लगा मानो परमेश्वर ने अपना पता बदल लिया हो। कुस्रू की घोषणा उस धागे को फिर से उठाती है। और यह धागा यहीं नहीं रुकता: जो मंदिर यहाँ पत्थरों से बनना शुरू होता है, वह आगे चलकर एक देह में पूरा होता है, जब यीशु अपने विषय में कहते हैं कि इस मंदिर को ढा दो और मैं तीन दिन में इसे खड़ा कर दूँगा। कुस्रू ने नींव की अनुमति दी; मसीह स्वयं वह निवास बन गए।

दर्पण

हम अपने जीवन की बड़ी ताकतों के सामने छोटे महसूस करते हैं: वह बॉस जो तबादले का फैसला करता है, वह रिपोर्ट जो डॉक्टर के हाथ में है, वह बाज़ार जो आपकी बचत घटा देता है। ये सब कुस्रू जैसे हैं, विशाल और बेपरवाह। यह पद्य उन्हें छोटा नहीं बताता, पर उनके ऊपर एक और हस्ताक्षर दिखा देता है। साथ ही यह हमारे भीतर के घमंड को भी छूता है: हम अपनी उपलब्धियों को अपनी मेहनत का फल कहते हैं, जबकि फारस का सम्राट अपने साम्राज्य के बारे में कहता है कि वह उसे दिया गया है। आज, दिन खत्म होने से पहले, कागज़ पर उन तीन चीज़ों को लिखिए जिन पर आपका सबसे अधिक अधिकार-भाव है (पद, घर, कोई रिश्ता), और हर एक के आगे लिखिए: "यह मुझे दिया गया है।" फिर उसे ज़ोर से पढ़िए।

अंतर्पाठ

यशायाह 44 और 45 में, निर्वासन से लगभग डेढ़ सौ साल पहले, परमेश्वर कुस्रू का नाम लेकर उसे अपना चरवाहा और अपना अभिषिक्त कहते हैं, और साफ कहते हैं कि वे उसे कमर कसाएँगे यद्यपि वह उन्हें नहीं जानता। एज्रा 1:2 उस भविष्यवाणी का धरातल पर उतरना है, और यह जोड़ी हमें सिखाती है कि परमेश्वर अपने उद्देश्यों के लिए उन लोगों को भी काम में लेते हैं जो उनके आराधक नहीं हैं। दूसरी ओर, यिर्मयाह का वह वचन जो पद 1 में उल्लिखित है, सत्तर वर्षों की सीमा बाँधता था: दंड असीमित नहीं था। एक ओर वचन का समय, दूसरी ओर वचन का साधन; दोनों मिलकर दिखाते हैं कि इतिहास परमेश्वर के मुँह से निकले शब्द के अधीन चलता है।

मुख्य पात्र

इस पद्य में बोलता कुस्रू है, पर कर्ता परमेश्वर हैं। कुस्रू की नीति ज्ञात है: वह जीते हुए लोगों के देवताओं और मंदिरों को बहाल करके वफादारी खरीदता था, और संभव है उसने यहोवा को उन्हीं अनेक देवताओं में से एक समझा हो। परमेश्वर इससे अपमानित नहीं होते; वे उस मिश्रित मंशा के भीतर से अपना काम निकाल लेते हैं। यही परमेश्वर का चरित्र है: वे न अपने लोगों की योग्यता पर निर्भर हैं, न अपने साधनों की शुद्धता पर। जिस जाति ने अपनी अवज्ञा से मंदिर खोया था, उसी को वे एक परदेशी सम्राट के मुँह से वापस बुलाते हैं। यह दंड के बाद की कृपा है, और कृपा की यही पहचान है कि वह उस दरवाज़े से आती है जिसकी हमने कभी कल्पना नहीं की थी।

पृष्ठभूमि

वर्ष लगभग 538 ईसा पूर्व। बाबेल गिर चुका है, फारस नई महाशक्ति है, और यहूदी समुदाय दो पीढ़ियों से विदेश में बसा हुआ है, वहाँ उनके व्यापार हैं, कब्रें हैं, आदतें हैं। यरूशलेम उनके लिए अब एक स्मृति है, एक मलबे का ढेर जहाँ लौटने का अर्थ है सब कुछ छोड़कर खंडहर में फिर से शुरू करना। राजकीय घोषणाएँ उस समय साम्राज्य भर में पढ़ी और लिखवाई जाती थीं, और उनका वज़न कानून जैसा था। इसलिए यह पद्य केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि कानूनी अनुमति है: अब लौटना राजद्रोह नहीं, राजाज्ञा का पालन है। पर अनुमति और इच्छा दो अलग चीज़ें हैं, और यही तनाव आगे के अध्यायों को चलाता है।

चिंतन

आपके जीवन का कौन सा "कुस्रू" है, कोई ऐसी शक्ति या व्यक्ति जिसके फैसले आपको बाँधते हैं, और उस पर परमेश्वर के हस्ताक्षर को पहचानना आपके लिए कठिन क्यों है?

परमेश्वर केवल शासन नहीं करना चाहते, निवास करना चाहते हैं। आपके जीवन का कौन सा हिस्सा अभी तक खंडहर पड़ा है जहाँ आपने उन्हें बसने की जगह नहीं दी?

Ezra में और गहराई से जानें

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The Message of Ezra and Haggai

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Rebuilding the temple and the people, read as one story of restoration.

Ezra and Nehemiah: An Introduction and Commentary

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Ezra 1:2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

एज्रा 1:2 का क्या अर्थ है?
फारस का सम्राट कुस्रू, उस समय की सबसे बड़ी शक्ति का स्वामी, एक राजकीय घोषणा जारी करता है और उसमें वह अपने विजयों का श्रेय अपनी सेना या अपने देवताओं को नहीं, बल्कि इस्राएल के परमेश्वर को देता है: "स्वर्ग के परमेश्वर यहोवा ने पृथ्वी भर का राज्य मुझे दिया है।" और उसी साँस में वह आगे कहता है कि इस परमेश्वर ने उसे एक आदेश दिया है, कोई विशाल साम्राज्यिक परियोजना नहीं, बल्कि एक छोटे से उजड़े हुए नगर में एक भवन खड़ा करना: "यहूदा के यरूशलेम में मेरा एक भवन बनवा।" विश्व का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति खुद को किसी और के आदेश के नीचे रखता है, और वह आदेश एक खंडहर नगर की ओर इशारा करता है।
एज्रा 1:2 किस विषय में है?
भवन बनाने की यह आज्ञा अचानक नहीं आई। अदन से लेकर मरुभूमि के तम्बू तक, परमेश्वर की कहानी बार-बार एक ही दिशा में बहती है: वे अपने लोगों के बीच रहना चाहते हैं। बाबेल का निर्वासन उस कहानी का सबसे अँधेरा मोड़ था, क्योंकि वहाँ मंदिर जल चुका था और ऐसा लगा मानो परमेश्वर ने अपना पता बदल लिया हो। कुस्रू की घोषणा उस धागे को फिर से उठाती है। और यह धागा यहीं नहीं रुकता: जो मंदिर यहाँ पत्थरों से बनना शुरू होता है, वह आगे चलकर एक देह में पूरा होता है, जब यीशु अपने विषय में कहते हैं कि इस मंदिर को ढा दो और मैं तीन दिन में इसे खड़ा कर दूँगा। कुस्रू ने नींव की अनुमति दी; मसीह स्वयं वह निवास बन गए।
एज्रा 1:2 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यशायाह 44 और 45 में, निर्वासन से लगभग डेढ़ सौ साल पहले, परमेश्वर कुस्रू का नाम लेकर उसे अपना चरवाहा और अपना अभिषिक्त कहते हैं, और साफ कहते हैं कि वे उसे कमर कसाएँगे यद्यपि वह उन्हें नहीं जानता। एज्रा 1:2 उस भविष्यवाणी का धरातल पर उतरना है, और यह जोड़ी हमें सिखाती है कि परमेश्वर अपने उद्देश्यों के लिए उन लोगों को भी काम में लेते हैं जो उनके आराधक नहीं हैं। दूसरी ओर, यिर्मयाह का वह वचन जो पद 1 में उल्लिखित है, सत्तर वर्षों की सीमा बाँधता था: दंड असीमित नहीं था। एक ओर वचन का समय, दूसरी ओर वचन का साधन; दोनों मिलकर दिखाते हैं कि इतिहास परमेश्वर के मुँह से निकले शब्द के अधीन चलता है।
एज्रा 1:2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
वर्ष लगभग 538 ईसा पूर्व। बाबेल गिर चुका है, फारस नई महाशक्ति है, और यहूदी समुदाय दो पीढ़ियों से विदेश में बसा हुआ है, वहाँ उनके व्यापार हैं, कब्रें हैं, आदतें हैं। यरूशलेम उनके लिए अब एक स्मृति है, एक मलबे का ढेर जहाँ लौटने का अर्थ है सब कुछ छोड़कर खंडहर में फिर से शुरू करना। राजकीय घोषणाएँ उस समय साम्राज्य भर में पढ़ी और लिखवाई जाती थीं, और उनका वज़न कानून जैसा था। इसलिए यह पद्य केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि कानूनी अनुमति है: अब लौटना राजद्रोह नहीं, राजाज्ञा का पालन है। पर अनुमति और इच्छा दो अलग चीज़ें हैं, और यही तनाव आगे के अध्यायों को चलाता है।
एज्रा 1:2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
परमेश्वर केवल शासन नहीं करना चाहते, निवास करना चाहते हैं। आपके जीवन का कौन सा हिस्सा अभी तक खंडहर पड़ा है जहाँ आपने उन्हें बसने की जगह नहीं दी?
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Ezra 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 10

सोने के तीस कटोरे, दूसरे दर्जे के चाँदी के चार सौ दस कटोरे, और अन्य एक हज़ार पात्र।" जो बर्तन सत्तर साल बेबीलोन के मंदिर में पड़े रहे, परमेश्वर ने उन्हें गिनकर वापस भेजा। "दूसरे दर्जे" वाले भी छूटे नहीं। तेरी ज़िंदगी का वह हिस्सा जो तुझे कम कीमती लगता है, वह भी उसकी सूची में दर्ज है। वह लौटाना जानता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 1

सत्तर साल लंबे लगते हैं। बंधुआई में जन्मे बच्चे जवान हो गए, और शायद किसी ने सोचा हो कि परमेश्वर भूल गया। पर लिखा है, "यहोवा ने फारस के राजा कुस्रू का मन उभारा।" जिस राजा ने यहोवा को जाना तक न था, उसके मन को परमेश्वर ने छू लिया। जिस बात के लिए तू थक चुका है, वह परमेश्वर की स्मृति से नहीं मिटी। उसका वचन देर से आए तो भी खाली नहीं लौटता।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 2

पिता, आप स्वर्ग के परमेश्वर हैं और पूरी धरती के राजा आपके हाथ में हैं। जब मेरे हालात मेरे बस से बाहर लगते हैं, मुझे याद दिलाइए कि आप अनजान लोगों के दिलों को भी मोड़कर अपना काम पूरा करते हैं। मुझे भी उस काम में अपना हिस्सा उठाने की तैयारी दीजिए।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 11

पिता, जो कुछ छिन गया था, आपने उसे गिनकर लौटा दिया। मेरे जीवन के टूटे और बिखरे हिस्से भी आपकी नज़र में हैं। जो सालों पहले खो गया, उसे भी आप वापस लाने में सक्षम हैं। मुझे बंधन से घर की ओर ले चलिए, और भरोसा दीजिए कि आप कुछ भी नहीं भूलते।

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