एज्रा 3
पाठ
सातवें महीने में लौटे हुए बंधुए यरूशलेम में इकट्ठे होते हैं, और सबसे पहले मन्दिर नहीं, बल्कि वेदी बनाते हैं, ताकि मूसा की व्यवस्था के अनुसार सवेरे और साँझ के होमबलि फिर चढ़ने लगें। वे झोपड़ियों का पर्व मनाते हैं, फिर लबानोन से देवदार की लकड़ी मँगवाकर दूसरे वर्ष मन्दिर की नींव डालते हैं। जब नींव पड़ती है, याजक तुरहियों और झाँझों के साथ स्तुति करते हैं, और भीड़ का जयजयकार बूढ़ों के रोने में इतना घुल जाता है कि दोनों आवाज़ें अलग पहचानी नहीं जातीं।
मर्म
तीसरे पद का एक वाक्य पूरे अध्याय का भार उठाता है: "उन्होंने वेदी को उसके स्थान पर खड़ा किया क्योंकि उन्हें उस ओर के देशों के लोगों का भय रहा।" ध्यान दें, डर ने उन्हें रोका नहीं, डर ने उन्हें वेदी तक पहुँचाया। यह बाइबल का बहुत ही वयस्क धर्मशास्त्र है। परमेश्वर ऐसे लोगों से काम नहीं लेते जिनके भीतर भय मर चुका है; वे उन लोगों से काम लेते हैं जो काँपते हाथों से पत्थर रखते हैं। और ध्यान दें कि उन्होंने क्या बनाया, मन्दिर नहीं, दीवार नहीं, वेदी। पहले बलि, फिर इमारत। पहले मेल, फिर महिमा। लौटी हुई कौम को सबसे पहले जिस चीज़ की ज़रूरत थी वह सुरक्षा नहीं थी, बल्कि परमेश्वर के सामने खड़े होने का अधिकार था, और वह अधिकार केवल बलि से आता था।
सूत्र
बँधुआई से लौटना पुनरुत्थान की छाया है, पर अधूरी छाया। वेदी फिर खड़ी है, पर बलि हर सवेरे और हर साँझ दोहरानी पड़ती है, क्योंकि कोई भी बलि अन्तिम नहीं। नींव पड़ती है, पर बूढ़े रोते हैं, क्योंकि यह भवन पहले जैसा नहीं। पुराना नियम यहाँ अपनी सीमा दिखाता है: लौटना मिला, पूर्णता नहीं। इसलिए दूसरे पद में जरुब्बाबेल का नाम बेवजह नहीं है; मत्ती की वंशावली उसी नाम को उठाकर यीशु मसीह तक ले जाती है। जो इस अधूरी नींव पर खड़ा हुआ, उसी वंश से वह आया जिसने कहा कि यह मन्दिर तोड़ो, मैं इसे तीन दिन में उठाऊँगा। वेदी की रोज़ की पुनरावृत्ति एक बार के लिए चढ़ी बलि की ओर इशारा करती रही।
दर्पण
आप भी जानते हैं कि "आस-पास के देशों के लोगों का भय" कैसा लगता है। वह दफ़्तर की उस मीटिंग में है जहाँ आपकी आस्था का ज़िक्र करना बेवकूफ़ी लगती है। वह रिश्तेदारी में है, जहाँ आपके फ़ैसले पर हँसी उड़ती है। वह आपके बच्चों के भविष्य के हिसाब में है, जो कभी पूरा नहीं बैठता। और हमारी सहज प्रतिक्रिया यही होती है कि पहले सुरक्षा बनाएँ, दीवार ऊँची करें, आमदनी पक्की करें, और परमेश्वर की उपासना को उस दिन के लिए टाल दें जब हालात सँभल जाएँगे। ये लोग उल्टा करते हैं। डर के बीच, बिना दीवार के, खुले में, वे वेदी खड़ी करते हैं।
और बारहवाँ पद उस गर्व को भी छीलता है जो हमें पता ही नहीं था कि हमारे भीतर है: बूढ़ों का रोना केवल श्रद्धा नहीं था, उसमें तुलना थी। "पहला भवन इससे बड़ा था।" कितनी बार आपकी आत्मिक उदासी असल में तुलना है, उस कलीसिया से, उस दौर से, उस पुराने उत्साह से, जब सब बड़ा लगता था?
आज यह करें: कागज़ पर वह एक डर लिखिए जो आपको इस समय सबसे ज़्यादा जकड़े हुए है, नाम लेकर, दो शब्दों में; फिर उसी कागज़ के नीचे लिखिए "वह भला है, और उसकी करुणा इस्राएल पर सदैव बनी है", और उसे ऊँची आवाज़ में एक बार पढ़िए।
प्रश्न
अगर परमेश्वर ही यह काम करा रहे थे, तो नींव पड़ने पर रोना क्यों? और क्या वह रोना गलत था? पाठ फ़ैसला नहीं सुनाता। यह सादगी से कहता है कि दोनों आवाज़ें एक साथ उठीं और अलग पहचानी न गईं। यहाँ एक कड़वी सच्चाई है जिसे हम अक्सर ढाँकना चाहते हैं: परमेश्वर की बहाली हमेशा वैसी नहीं दिखती जैसी हमने खोई थी। जो गया, वह ज्यों का त्यों नहीं लौटता। खोया हुआ स्वास्थ्य, टूटा रिश्ता, बीता समय, इनकी भरपाई में परमेश्वर कुछ नया देते हैं, और वह नया शुरू में छोटा लगता है। पाठ इस दुःख को न डाँटता है, न समझाता है। वह उसे स्तुति के साथ खड़ा रहने देता है। कभी-कभी विश्वास का मतलब यही होता है कि आप रोते हुए गाएँ।
एक बारीकी
"वे कमर बाँधकर" उठे, और उन्होंने "प्रतिदिन सवेरे और साँझ" के होमबलि चढ़ाने शुरू किए। इस "प्रतिदिन" पर रुकिए। सत्तर साल इस लय में एक भी दिन नहीं गिना गया था। अब पहला दिन आता, दूसरा, सौवाँ। इसमें कोई नाटकीयता नहीं, कोई चमत्कार नहीं; बस सुबह और शाम, वही बलि, वही धुआँ। परमेश्वर के साथ जीवन की असली इमारत ऐसे ही नीरस पत्थरों से बनती है। हम बड़े क्षणों के भरोसे जीना चाहते हैं, उस शिविर की रात, उस आँसू भरी प्रार्थना के भरोसे। पर यह अध्याय कहता है कि नींव तब पड़ी जब वेदी पर दो साल से रोज़ बलि चढ़ चुकी थी। जो प्रतिदिन होता है, वही आपको वहाँ तक ले जाता है जहाँ कुछ बड़ा संभव होता है।
पृष्ठभूमि
यह ईसा पूर्व 538 के आसपास का समय है। फारस के राजा कुस्रू की नीति बेबीलोन से उलटी थी: वह निर्वासित कौमों को अपने देवताओं की उपासना के लिए घर भेजता था, क्योंकि इससे साम्राज्य की सीमाएँ वफ़ादार रहती थीं। यानी यह लौटना राजनीति और परमेश्वर की प्रतिज्ञा, दोनों के धागों से बुना है। लौटने वाले कुछ हज़ार लोग थे, अपने खँडहर शहर में अल्पसंख्यक, चारों ओर उन बस्तियों से घिरे जिन्होंने सत्तर साल में इस ज़मीन को अपना मान लिया था। जरुब्बाबेल दाऊद के वंश का था पर राजा नहीं, केवल फारसी अधिकारी; येशुअ महायाजक का वंशज था। न तख़्त, न सेना, न दीवार। उनके पास केवल व्यवस्था की एक किताब, एक वेदी की जगह, और एक वादा था।
चिंतन
आप अपने जीवन में "पहले सुरक्षा, फिर परमेश्वर" का हिसाब कहाँ लगा रहे हैं, और उसे उलटने के लिए आज क्या करना पड़ेगा?
जिस बहाली को परमेश्वर ने आपको दिया है, उसे आप किस पुराने "पहले भवन" से तुलना कर रहे हैं, और उस तुलना ने आपसे कौन-सी कृतज्ञता छीन ली है?
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Ezra 3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
एज्रा 3 का क्या अर्थ है?
एज्रा 3 किस विषय में है?
एज्रा 3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
एज्रा 3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
एज्रा 3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Ezra 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, जब चारों ओर टूटा हुआ ही दिखता है, तब भी मुझे सबसे पहले तेरे लिए जगह बनाना सिखा। मेरे मन की वेदी फिर से खड़ी हो, भले ही दीवारें अभी अधूरी हों। जो तूने कहा है, उसी के अनुसार चलने की हिम्मत दे, डर के बीच भी तेरी उपासना करता रहूँ।
क्योंकि उन्हें उन देशों के लोगों का डर था" और फिर भी उन्होंने वेदी खड़ी की। डर मिटा नहीं, पर उपासना रुकी भी नहीं। और वह उपासना किसी एक बड़े दिन की नहीं थी, "भोर और सांझ" की थी, रोज़ दो बार। तुम भी शायद उसी हाल में हो, हालात शांत नहीं हैं, मन डरा हुआ है। वेदी पहले बनाओ। डर के बीच चढ़ाई गई भेंट परमेश्वर को सबसे प्यारी लगती है।
नींव डाली गई, और वहाँ दो आवाज़ें एक साथ उठीं। बूढ़े याजक "फूट फूटकर रोने लगे", क्योंकि उन्हें पुराना भवन याद था। जवान खुशी से जयजयकार कर रहे थे, क्योंकि उन्हें बस यही दिखा कि परमेश्वर फिर काम शुरू कर रहा है। तेरे भीतर भी शायद दोनों आवाज़ें हैं। जो खो गया उसका शोक और जो बन रहा है उसकी आशा। परमेश्वर दोनों सुनता है।
सत्तर साल की गुलामी के बाद लोग बस अपने अपने नगर में बसे ही थे, घर अधूरे, खेत बंजर। फिर भी लिखा है, "लोग यरूशलेम में एक मन होकर इकट्ठे हुए।" मंदिर की नींव भी नहीं पड़ी थी, पर वे आ गए। आज तेरे पास भी सब कुछ व्यवस्थित नहीं है। क्या तू परमेश्वर के पास आने के लिए सब ठीक होने का इंतज़ार कर रहा है?
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