बाइबल व्याख्या

निर्गमन 20

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

सीनै पर्वत धुएँ में लिपटा है, नरसिंगे की आवाज़ गूँज रही है, और उसी गरज के बीच परमेश्वर स्वयं बोलते हैं। वे पहले अपना परिचय देते हैं, "मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूँ, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात् मिस्र देश से निकाल लाया है," और उसके बाद दस वचन देते हैं: केवल उन्हीं की उपासना, कोई मूर्ति नहीं, नाम का आदर, विश्रामदिन, माता-पिता का सम्मान, और फिर पड़ोसी के जीवन, विवाह, संपत्ति, प्रतिष्ठा और यहाँ तक कि मन के लालच तक की सीमाएँ। लोग काँपकर दूर खड़े हो जाते हैं और मूसा से बिनती करते हैं कि परमेश्वर सीधे उनसे बात न करें, और मूसा अकेला उस "घोर अंधकार" के भीतर चला जाता है जहाँ परमेश्वर हैं। अंत में एक मिट्टी की वेदी का निर्देश आता है, बिना तराशे पत्थरों की, जहाँ बलि चढ़ेगी और परमेश्वर आकर आशीष देंगे।

मर्म

ध्यान दीजिए कि आज्ञाएँ कहाँ से शुरू होती हैं: आदेश से नहीं, उद्धार से। पहला वाक्य नियम नहीं, गवाही है। जिन्होंने ये वचन सुने, वे पहले ही छुड़ाए जा चुके थे; लाल समुद्र पार हो चुका था। इसलिए व्यवस्था कोई सीढ़ी नहीं जिस पर चढ़कर कोई परमेश्वर के परिवार में प्रवेश करे, बल्कि उस घर का रहन-सहन है जिसमें अनुग्रह पहले ही ला चुका है। यह अंतर छोटा नहीं। जहाँ आप इसे उलट देते हैं, वहाँ धर्म एक बोझ बन जाता है और परमेश्वर एक निरीक्षक। यहाँ परमेश्वर पहले मुक्तिदाता हैं, फिर व्यवस्थादाता। और आज्ञाओं की दिशा भी बताती है कि वे कौन हैं: वे केवल हाथों को नहीं, हृदय को छूते हैं, क्योंकि अंतिम आज्ञा लालच की है, जिसे कोई अदालत नाप नहीं सकती। परमेश्वर बाहरी अनुशासन नहीं, भीतर से बदला हुआ मनुष्य चाहते हैं, और यही वह चाह है जो पूरे बाइबल की कहानी को आगे खींचती है।

सूत्र

लोगों की प्रतिक्रिया ही सबसे बड़ा संकेत है: "तू ही हम से बातें कर, तब तो हम सुन सकेंगे; परन्तु परमेश्वर हम से बातें न करे, ऐसा न हो कि हम मर जाएँ।" पवित्रता के इतने पास आना मनुष्य के लिए असहनीय है, इसलिए एक बिचवई चाहिए, और मूसा अकेला "घोर अंधकार" में भीतर जाता है। यहीं से वह रेखा खिंचती है जो यीशु मसीह तक जाती है: एक मध्यस्थ जो परमेश्वर की ओर से हमारे बीच आया, न कि केवल हमारी ओर से ऊपर गया। और अध्याय का अंत संयोग नहीं है। दस आज्ञाओं के तुरंत बाद वेदी आती है, बलि आती है, और वचन आता है, "जहाँ-जहाँ मैं अपने नाम का स्मरण कराऊँ वहाँ-वहाँ मैं आकर तुम्हें आशीष दूँगा।" व्यवस्था के बाद उपासना का स्थान, माँग के बाद प्रायश्चित्त। मसीह में यह क्रम पूरा होता है: वे स्वयं वेदी हैं, बलि हैं, और वह नाम हैं जहाँ परमेश्वर आकर आशीष देते हैं।

दर्पण

आख़िरी आज्ञा सबसे असुविधाजनक है, क्योंकि उसमें कोई गवाह नहीं होता। "तू किसी के घर का लालच न करना" उस पल को पकड़ती है जब आप सहकर्मी की पदोन्नति की ख़बर पर मुस्कराते हैं और भीतर कुछ खट्टा हो जाता है; जब फ़ोन पर किसी की नई रसोई की तस्वीर देखकर अपना घर अचानक छोटा लगने लगता है; जब किसी और के विवाह की सहजता देखकर अपने विवाह की थकान चुभने लगती है। कोई अदालत इसे दर्ज नहीं करती, पर परमेश्वर के सामने यह पहले ही खुला है। साथ ही विश्रामदिन की आज्ञा आपके कैलेंडर पर हाथ रखती है: क्या आपका आराम केवल इसलिए रुका है क्योंकि आप मानते हैं कि सब कुछ आप पर टिका है? आज यह कीजिए: एक काग़ज़ पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिसकी किसी चीज़ से आप भीतर ही भीतर जलते हैं, और ज़ोर से उस व्यक्ति की उस चीज़ के लिए परमेश्वर को धन्यवाद दीजिए।

अंतर्पाठ

पहाड़ी उपदेश में यीशु मसीह इन्हीं आज्ञाओं को भीतर तक खींच ले जाते हैं: हत्या को क्रोध तक, व्यभिचार को दृष्टि तक। वे व्यवस्था को नरम नहीं करते, कठोर करते हैं, और साथ ही कहते हैं कि वे उसे पूरा करने आए हैं। यह सीनै का विरोध नहीं, उसका तर्कसंगत अंत है, क्योंकि लालच की आज्ञा पहले ही हृदय पर हाथ रख चुकी थी। दूसरी ओर इब्रानियों की पत्री बारहवें अध्याय में उसी दृश्य को उठाती है, धुआँ, अंधकार, नरसिंगा, काँपते लोग, और कहती है कि विश्वासी अब उस पर्वत के पास नहीं, बल्कि सिय्योन के पास, नई वाचा के मध्यस्थ के पास आए हैं। वही परमेश्वर, वही पवित्रता, पर अब दूर खड़े रहने की जगह पास आने का निमंत्रण। दूरी नहीं मिटी; उसे मसीह ने भर दिया।

विवरण

एक छोटा-सा वाक्य आसानी से छूट जाता है: "तराशे हुए पत्थरों से न बनाना; क्योंकि जहाँ तुम ने उस पर अपना हथियार लगाया वहाँ तू उसे अशुद्ध कर देगा।" सोचिए, औज़ार से पत्थर सुंदर ही होगा, फिर अशुद्ध क्यों? क्योंकि उसी औज़ार से मूर्ति भी "खोदकर" बनाई जाती है। जहाँ मनुष्य का कौशल उपासना के केंद्र में आता है, वहाँ उपासना धीरे-धीरे आत्म-प्रदर्शन बन जाती है, और परमेश्वर की जगह हमारी कारीगरी खड़ी हो जाती है। मिट्टी की वेदी, बिना गढ़े पत्थर, बिना सीढ़ी के: सब कुछ इस ओर इशारा करता है कि मिलन का स्थान मनुष्य की उपलब्धि पर नहीं टिकता। क्रूस भी सुंदर नहीं था। वहाँ भी कुछ भी हमारा जोड़ा हुआ नहीं है।

प्रश्न

"जो मुझसे बैर रखते हैं, उनके बेटों, पोतों, और परपोतों को भी पितरों का दण्ड दिया करता हूँ।" यह वाक्य चुभता है, और उसे चिकना करना बेईमानी होगी। बाइबल स्वयं बाद में कहती है कि हर कोई अपने पाप के लिए मरेगा, फिर भी यहाँ यह अस्वीकार नहीं होता कि पाप पीढ़ियों में उतरता है; कोई भी परिवार जानता है कि एक पिता की कड़वाहट तीन पीढ़ियों तक टेढ़ी छाया डालती है। परमेश्वर इसे नज़रअंदाज़ नहीं करते, वे इसे नाम देते हैं। और साथ ही असंतुलन देखिए: चार पीढ़ियों के विरुद्ध "हजारों" पर करुणा। दण्ड की गिनती छोटी है, करुणा की गिनती अनगिनत। यह पूरी व्याख्या नहीं देता, रहस्य बना रहता है; पर मसीह में हम देखते हैं कि यह श्रृंखला कहाँ टूटती है, क्योंकि एक निर्दोष ने वह दण्ड अपने ऊपर लिया जो उनका नहीं था।

चिंतन

आपके जीवन में व्यवस्था किस रूप में जीती है: उस घर के नियम के रूप में जिसमें अनुग्रह आपको ला चुका है, या उस सीढ़ी के रूप में जिस पर आप अब भी चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं?

वेदी पर आप कौन-सा "तराशा हुआ पत्थर" रखना चाहते हैं, यानी अपनी कौन-सी उपलब्धि, जिसे परमेश्वर नहीं माँगते?

Exodus में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Exodus

Alec Motyer

Traces how God rescues a people for himself, from slavery to Sinai.

Exodus For You

Tim Chester

An accessible chapter by chapter guide that keeps pointing to Jesus.

Exodus: An Introduction and Commentary

R. Alan Cole

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Exodus

Peter Enns

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

Exodus: Saved for God's Glory

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Exodus 20 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

निर्गमन 20 का क्या अर्थ है?
सीनै पर्वत धुएँ में लिपटा है, नरसिंगे की आवाज़ गूँज रही है, और उसी गरज के बीच परमेश्वर स्वयं बोलते हैं। वे पहले अपना परिचय देते हैं, "मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूँ, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात् मिस्र देश से निकाल लाया है," और उसके बाद दस वचन देते हैं: केवल उन्हीं की उपासना, कोई मूर्ति नहीं, नाम का आदर, विश्रामदिन, माता-पिता का सम्मान, और फिर पड़ोसी के जीवन, विवाह, संपत्ति, प्रतिष्ठा और यहाँ तक कि मन के लालच तक की सीमाएँ। लोग काँपकर दूर खड़े हो जाते हैं और मूसा से बिनती करते हैं कि परमेश्वर सीधे उनसे बात न करें, और मूसा अकेला उस "घोर अंधकार" के भीतर चला जाता है जहाँ परमेश्वर हैं। अंत में एक मिट्टी की वेदी का निर्देश आता है, बिना तराशे पत्थरों की, जहाँ बलि चढ़ेगी और परमेश्वर आकर आशीष देंगे।
निर्गमन 20 किस विषय में है?
लोगों की प्रतिक्रिया ही सबसे बड़ा संकेत है: "तू ही हम से बातें कर, तब तो हम सुन सकेंगे; परन्तु परमेश्वर हम से बातें न करे, ऐसा न हो कि हम मर जाएँ।" पवित्रता के इतने पास आना मनुष्य के लिए असहनीय है, इसलिए एक बिचवई चाहिए, और मूसा अकेला "घोर अंधकार" में भीतर जाता है। यहीं से वह रेखा खिंचती है जो यीशु मसीह तक जाती है: एक मध्यस्थ जो परमेश्वर की ओर से हमारे बीच आया, न कि केवल हमारी ओर से ऊपर गया। और अध्याय का अंत संयोग नहीं है। दस आज्ञाओं के तुरंत बाद वेदी आती है, बलि आती है, और वचन आता है, "जहाँ-जहाँ मैं अपने नाम का स्मरण कराऊँ वहाँ-वहाँ मैं आकर तुम्हें आशीष दूँगा।" व्यवस्था के बाद उपासना का स्थान, माँग के बाद प्रायश्चित्त। मसीह में यह क्रम पूरा होता है: वे स्वयं वेदी हैं, बलि हैं, और वह नाम हैं जहाँ परमेश्वर आकर आशीष देते हैं।
निर्गमन 20 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पहाड़ी उपदेश में यीशु मसीह इन्हीं आज्ञाओं को भीतर तक खींच ले जाते हैं: हत्या को क्रोध तक, व्यभिचार को दृष्टि तक। वे व्यवस्था को नरम नहीं करते, कठोर करते हैं, और साथ ही कहते हैं कि वे उसे पूरा करने आए हैं। यह सीनै का विरोध नहीं, उसका तर्कसंगत अंत है, क्योंकि लालच की आज्ञा पहले ही हृदय पर हाथ रख चुकी थी। दूसरी ओर इब्रानियों की पत्री बारहवें अध्याय में उसी दृश्य को उठाती है, धुआँ, अंधकार, नरसिंगा, काँपते लोग, और कहती है कि विश्वासी अब उस पर्वत के पास नहीं, बल्कि सिय्योन के पास, नई वाचा के मध्यस्थ के पास आए हैं। वही परमेश्वर, वही पवित्रता, पर अब दूर खड़े रहने की जगह पास आने का निमंत्रण। दूरी नहीं मिटी; उसे मसीह ने भर दिया।
निर्गमन 20 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
"जो मुझसे बैर रखते हैं, उनके बेटों, पोतों, और परपोतों को भी पितरों का दण्ड दिया करता हूँ।" यह वाक्य चुभता है, और उसे चिकना करना बेईमानी होगी। बाइबल स्वयं बाद में कहती है कि हर कोई अपने पाप के लिए मरेगा, फिर भी यहाँ यह अस्वीकार नहीं होता कि पाप पीढ़ियों में उतरता है; कोई भी परिवार जानता है कि एक पिता की कड़वाहट तीन पीढ़ियों तक टेढ़ी छाया डालती है। परमेश्वर इसे नज़रअंदाज़ नहीं करते, वे इसे नाम देते हैं। और साथ ही असंतुलन देखिए: चार पीढ़ियों के विरुद्ध "हजारों" पर करुणा। दण्ड की गिनती छोटी है, करुणा की गिनती अनगिनत। यह पूरी व्याख्या नहीं देता, रहस्य बना रहता है; पर मसीह में हम देखते हैं कि यह श्रृंखला कहाँ टूटती है, क्योंकि एक निर्दोष ने वह दण्ड अपने ऊपर लिया जो उनका नहीं था।
निर्गमन 20 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
वेदी पर आप कौन-सा "तराशा हुआ पत्थर" रखना चाहते हैं, यानी अपनी कौन-सी उपलब्धि, जिसे परमेश्वर नहीं माँगते?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Exodus 20 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

दस आज्ञाओं में यही अकेली है जिसे कोई अदालत पकड़ नहीं सकती। चोरी दिखती है, झूठी गवाही सुनाई देती है, पर लालच? वह सिर्फ़ तेरे और परमेश्वर के बीच की बात है। और देख, "अपने पड़ोसी का" कितनी बार दोहराया गया है। असली दुख यह नहीं कि तेरे पास कम है, दुख यह है कि तेरी आँख बाड़ के उस पार टिकी रहती है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 16

तू किसी के विरुद्ध झूठी साक्षी न देना।" यह आज्ञा अदालत की भाषा में दी गई थी, जहाँ एक झूठे शब्द से किसी का जीवन छिन सकता था। आज वह अदालत तुम्हारे फोन में बैठी है। बिना पूरी बात जाने जो संदेश तुमने आगे भेजा, जो अधूरा सच तुमने कहा, उससे किसी का नाम मरा। सोचो, कल किसके बारे में तुम चुप रह सकते थे?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

छ: दिन तो तू परिश्रम करके अपना सब काम-काज करना।" ध्यान दे, आज्ञा केवल विश्राम की नहीं, परिश्रम की भी है। परमेश्वर तेरे सोमवार को भी उतनी ही गंभीरता से देखता है जितना सब्त को। और "सब काम-काज" कहकर वह तुझसे कहता है, अपना काम पूरा कर, ताकि सातवें दिन तू उसे मन में ढोता न फिरे। थका नहीं, हल्का होकर उसके सामने आ।

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