एज्रा 7
मूल पाठ
पहले महीने के पहले दिन एक कारवाँ बाबेल से निकलता है और चार महीने बाद, पाँचवें महीने के पहले दिन, यरूशलेम के फाटकों पर पहुँचता है। उसकी अगुवाई एज्रा कर रहा है, हारून के वंश का याजक और मूसा की व्यवस्था का "निपुण शास्त्री"। उसके हाथ में फारस के सम्राट अर्तक्षत्र का एक असाधारण पत्र है: खजाना, बर्तन, कर से छूट, और न्यायियों को नियुक्त करने का अधिकार। अध्याय एज्रा की स्तुति पर समाप्त होता है, कि जिसने राजा के मन में यह इच्छा डाली, वही धन्य है।
केंद्रीय बात
ध्यान दीजिए कि यह अध्याय किस चीज़ को नहीं गिनता। यह दीवारों की ऊँचाई नहीं गिनता, न सैनिकों की संख्या। यह एक आदमी के भीतर की तैयारी गिनता है: एज्रा ने व्यवस्था का "अर्थ जान लेने, और उसके अनुसार चलने, और इस्राएल में विधि और नियम सिखाने के लिये अपना मन लगाया था।" तीन क्रियाएँ, इसी क्रम में। पहले समझना, फिर जीना, फिर सिखाना। जो इस क्रम को उलट देता है, वह शिक्षक नहीं, वक्ता बन जाता है। और परमेश्वर के बारे में यह अध्याय क्या कहता है? कि उनका काम अब मन्दिर बनाने से आगे बढ़कर लोगों को गढ़ने का है। निर्वासन ने सिखाया था कि पत्थर बिना दिल के गिर जाते हैं। इसलिए इस बार परमेश्वर पहले एक पुस्तक और एक पढ़नेवाला भेजते हैं।
जुड़ा हुआ सूत्र
वंशावली को जल्दी में मत पढ़िए। एज्रा हारून तक पीछे जाता है, पर सूची में सोलह नाम हैं जहाँ इतिहास में कहीं ज़्यादा होने चाहिए। यह वंशावली सिद्ध करने के लिए नहीं, दावा करने के लिए है: निर्वासन ने वह धागा नहीं तोड़ा जो परमेश्वर ने पकड़ा हुआ था। जो याजकपन जलकर राख हो गया लगता था, वह बाबेल की गलियों से चलता हुआ लौट रहा है। और यहाँ एक छाया दिखती है। एज्रा याजक भी है और व्यवस्था का शास्त्री भी, वह वेदी पर बलि चढ़ाता है और साथ ही वचन सिखाता है। वही दो हाथ बाद में एक व्यक्ति में पूरी तरह मिलते हैं, जो स्वयं याजक भी हैं और वचन भी, जो पहाड़ पर बैठकर सिखाते हैं और फिर स्वयं को चढ़ा देते हैं।
दर्पण
एज्रा के पास सम्राट का पत्र था और फिर भी अंतिम वाक्य कहता है, "मैंने हियाव बाँधा।" यानी कागज़ पर सब कुछ ठीक था और भीतर से फिर भी हिम्मत जुटानी पड़ी। आप यह जानते हैं। आपके पास नौकरी में अधिकार है, घर में जिम्मेदारी है, समूह में लोग आपकी सुनते हैं, और फिर भी उस बातचीत से पहले हाथ ठंडे हो जाते हैं। एज्रा हमें यह नहीं सिखाता कि डर मिट जाएगा। वह सिखाता है कि हिम्मत कहाँ से खींची जाती है: राजा की मुहर से नहीं, बल्कि इस पहचान से कि "मेरे परमेश्वर यहोवा की कृपादृष्टि जो मुझ पर हुई।" और सवाल यह भी है कि आपने किस चीज़ पर "अपना मन लगाया" है। मन अपने आप नहीं लगता; वह लगाया जाता है, सुबह-सुबह, बार-बार।
कठिन प्रश्न
पद 26 पर पहुँचकर बहुत से पाठक ठिठक जाते हैं। जो परमेश्वर की व्यवस्था न माने, उसे दंड मिले, "चाहे प्राणदण्ड, चाहे देश निकाला, चाहे माल जप्त किया जाना, चाहे कैद करना।" एक मूर्तिपूजक सम्राट परमेश्वर की व्यवस्था के लिए मृत्युदंड का प्रावधान कर रहा है, और एज्रा इस पर परमेश्वर को धन्यवाद देता है। इसे नरम करना बेईमानी होगी। यह एक साम्राज्य की भाषा है, जहाँ धर्म राज्य का उपकरण था और अर्तक्षत्र को चिंता थी कि कहीं परमेश्वर का "क्रोध" उसके राज्य पर न भड़के। बाइबल यहाँ इस व्यवस्था की सिफारिश नहीं करती, वह इसे दर्ज करती है। और हमें ईमानदारी से मानना होगा: परमेश्वर अपनी योजना ऐसे साधनों से आगे बढ़ाते हैं जिन्हें हम स्वयं नहीं चुनते। यह असहज है, और असहज ही रहना चाहिए।
शास्त्र-संगति
इस अध्याय का असली फल नहेमायाह 8 में पकता है, जहाँ वही एज्रा लकड़ी के मंच पर खड़ा होकर सुबह से दोपहर तक व्यवस्था पढ़ता है और लोग रोने लगते हैं। अध्याय 7 उस दृश्य की तैयारी है: पहले भीतर की पढ़ाई, फिर सार्वजनिक पढ़ाई। दूसरी गूँज यीशु के उन शब्दों में है जहाँ वे कहते हैं कि जो आज्ञाओं को मानेगा और सिखाएगा, वही स्वर्ग के राज्य में बड़ा कहलाएगा। मानना पहले, सिखाना बाद में। एज्रा उस वाक्य का पुराने नियम वाला चित्र है, और साथ ही एक चेतावनी उन सबके लिए जो पढ़ाना तो चाहते हैं पर पालन करने की धीमी, उबाऊ मेहनत से बचना चाहते हैं।
एक बारीकी
पद 9 में एक छोटा-सा शब्द बार-बार लौटता है: "कृपादृष्टि"। इब्रानी में यहाँ जो मुहावरा है वह शब्दशः है "उसके परमेश्वर का भला हाथ उस पर था"। हाथ। वही अंग जो पकड़ता है, थामता है, ढालता है। एज्रा तीन बार इसका इस्तेमाल करता है, और हर बार तब जब कुछ ऐसा हुआ है जिसका श्रेय आसानी से उसे मिल सकता था: राजा ने उसका "मुँह माँगा वर" दिया, यात्रा सुरक्षित पूरी हुई, हाकिम दयालु हुए। एज्रा हर बार श्रेय दूसरी ओर मोड़ देता है। पद 27 में वह इसे और स्पष्ट कर देता है: परमेश्वर ने "ऐसी मनसा राजा के मन में उत्पन्न की है।" यानी वह पत्र वास्तव में अर्तक्षत्र के दरबार में नहीं, कहीं और लिखा गया था।
चिंतन
आपने पिछले साल अपना मन किस चीज़ को समझने, जीने और सिखाने पर लगाया, और क्या वह क्रम आपके जीवन में सही दिशा में चल रहा है?
कहाँ आप किसी अनुकूल परिस्थिति का श्रेय चुपचाप अपनी योग्यता को दे रहे हैं, जहाँ एज्रा "परमेश्वर का भला हाथ" कहता?
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Ezra 7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
एज्रा 7 का क्या अर्थ है?
एज्रा 7 किस विषय में है?
एज्रा 7 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
एज्रा 7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
एज्रा 7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Ezra 7 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
गवैये, द्वारपाल, मन्दिर के सेवक। ये नाम याजकों के साथ ही गिने गए, "राजा अर्तक्षत्र के सातवें वर्ष में... यरूशलेम को गए।" जो दरवाज़े पर खड़ा रहता था, उसका सफ़र भी उतना ही दर्ज हुआ जितना अगुवे का। तू सोचता है तेरी सेवा छोटी है, किसी को दिखती नहीं। परमेश्वर की सूची में वह छूटी नहीं।
अर्तक्षत्र कोई भक्त नहीं था, फिर भी उसने लिखवाया: "जो-जो आज्ञा स्वर्ग के परमेश्वर की ओर से मिले, वह स्वर्ग के परमेश्वर के भवन के लिये ठीक-ठीक पूरी की जाए।" एक परदेशी राजा परमेश्वर के काम में लापरवाही सहन नहीं करता था। और तू? जो तेरे हाथ में परमेश्वर का काम है, उसे तू आधा-अधूरा छोड़ देता है या ठीक-ठीक पूरा करता है?
एक अन्यजाति राजा एज्रा के हाथ में बची हुई चाँदी सोना सौंपकर कहता है, "जो कुछ तुझको... उचित जान पड़े, वही अपने परमेश्वर की इच्छा के अनुसार करना।" कितना बड़ा भरोसा! पर यह भरोसा अचानक नहीं आया। एज्रा ने पहले अपना मन व्यवस्था खोजने में लगाया था, इसलिए उसकी पसंद परमेश्वर की इच्छा से टकराती नहीं थी। तुझे भी कभी आदेश नहीं, बस आज़ादी मिलती है। उस घड़ी तेरा मन किसकी इच्छा चुनता है?
एक विदेशी राजा का फरमान, और उसमें नाम लिखे हैं याजकों के, लेवियों के, गवैयों के, द्वारपालों के, नतीनों के: "इनमें से किसी पर कर, चुंगी, अथवा राहदारी लगाना उचित नहीं।" ध्यान दो, गवैये और द्वारपाल भी छूट गए। परमेश्वर की गिनती में छोटा सेवक भी छूटता नहीं। तू सोचता है तेरा काम किसी को दिखता नहीं? जिसने अर्तक्षत्र का मन फेरा, वह तेरा नाम भी जानता है।
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