बाइबल व्याख्या

गलातियों 3

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

पौलुस बात की शुरुआत तारीफ से नहीं, झिड़की से करता है: "हे निर्बुद्धि गलातियों, किसने तुम्हें मोह लिया?" फिर वह एक ही सवाल को घुमा-फिराकर पूछता है, कि पवित्र आत्मा तुम्हें व्यवस्था के कामों से मिला या विश्वास के समाचार से? इसके बाद वह अब्राहम तक पीछे जाता है, दिखाता है कि प्रतिज्ञा व्यवस्था से चार सौ तीस वर्ष पहले की है, कि मसीह हमारे लिये श्रापित बनकर हमें व्यवस्था के श्राप से मोल लेकर छुड़ाया, और अंत में उस कमरे की दीवारें गिरा देता है जिसमें यहूदी और यूनानी, दास और स्वतंत्र, नर और नारी अलग-अलग बैठते थे।

मूल बात

यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि परमेश्वर हमसे कुछ चाहते हैं या नहीं; प्रश्न यह है कि रिश्ते की बुनियाद क्या है। पौलुस दो ढाँचों की तुलना करता है: वाचा जो प्रतिज्ञा पर टिकी है, और सौदा जो प्रदर्शन पर। प्रतिज्ञा में देनेवाला अपनी विश्वसनीयता दाँव पर लगाता है; सौदे में मैं अपनी। "यदि विरासत व्यवस्था से मिली है, तो फिर प्रतिज्ञा से नहीं।" दोनों साथ नहीं चल सकते, क्योंकि जिस क्षण मैं अपने कामों को आधार बनाता हूँ, उसी क्षण परमेश्वर की उदारता मेरे लिये वेतन बन जाती है। और वेतन पर जीनेवाला आदमी कभी सुरक्षित नहीं होता; वह हर महीने फिर से हिसाब देता है।

जुड़ी हुई कड़ी

पौलुस अब्राहम को इसलिये नहीं उठाता कि वह एक पुराना उदाहरण है, बल्कि इसलिये कि परमेश्वर ने उससे जो कहा था, "तुझ में सब जातियाँ आशीष पाएँगी," वह अभी पूरा हो रहा था, गलातिया के अन्यजाति विश्वासियों में। कहानी का धागा सीधा है: प्रतिज्ञा, फिर व्यवस्था जो "अपराधों के कारण बाद में दी गई," फिर वह एक वंश जिसमें प्रतिज्ञा उतरती है, और अंत में आत्मा का दान। मसीह इस धागे का बीचोंबीच है, इस तरह कि जो श्राप व्यवस्था ने उजागर किया था, वह उसने काठ पर अपने ऊपर ले लिया। कहानी सजा से आशीष की ओर नहीं चली; वह सजा के भीतर से गुज़रकर आशीष तक पहुँची।

दर्पण

पूछिए अपने आप से: पिछली बार आपने परमेश्वर के सामने अपने आप को स्वीकार्य किस आधार पर महसूस किया? किसी अच्छे सप्ताह के बाद, या किसी चूक के बाद? हम में से बहुत लोग आत्मा से आरम्भ करके शरीर की रीति पर अंत करते हैं, बस हमारा शरीर खतना नहीं, बल्कि हमारा अनुशासन है, हमारी सेवा की सूची, हमारा दान, हमारी नियमितता। इसका असली सबूत हमारी प्रार्थना में नहीं, हमारे फैसलों में दिखता है: किसे हम अपने घर के खाने की मेज़ पर बुलाते हैं और किसे नहीं। जिस भाई का जीवन अस्तव्यस्त है, उससे हम मिलते हैं मगर मेल नहीं रखते। जिस बच्चे के नंबर कम आए, उसे हम प्यार तो करते हैं मगर गर्व नहीं। यही व्यवस्था की रीति है, बपतिस्मा के नाम पर पहनी हुई।

पृष्ठभूमि

गलातिया रोमी साम्राज्य का एक प्रांत था, जहाँ पौलुस की सेवकाई से अन्यजातियों की कलीसियाएँ खड़ी हुई थीं। उसके जाने के बाद कुछ शिक्षक आए जिनका तर्क धार्मिक रूप से बहुत ठोस लगता था: अब्राहम की सन्तान बनना है तो उसका चिह्न भी लो, खतना कराओ, व्यवस्था के नियम मानो। इसमें सामाजिक दबाव भी था। उस दुनिया में इज़्ज़त इस बात से तय होती थी कि आप किस समूह के भीतर गिने जाते हैं। खतनारहित अन्यजाति विश्वासी न मंदिर की दुनिया में थे, न यहूदी समाज में, न मूर्तिपूजक त्योहारों में। वे बीच में लटके हुए लोग थे, और लटके रहने से बुरा कुछ नहीं लगता। पौलुस उनसे कहता है: तुम्हारी पहचान का काग़ज़ पहले ही लिखा जा चुका है।

कठिन प्रश्न

अगर व्यवस्था जीवन नहीं दे सकती, तो परमेश्वर ने उसे दिया ही क्यों? पौलुस इसका जवाब देता है, पर पूरा नहीं: वह "अपराधों के कारण बाद में दी गई," और वह "मसीह तक पहुँचाने के लिए हमारी शिक्षक हुई है।" यूनानी में यह शब्द पैदागोगोस है, वह दास जो बच्चे को स्कूल तक ले जाता था और रास्ते में सख्ती करता था, जिसे बच्चा प्यार नहीं करता था। यानी व्यवस्था एक बीच का इंतज़ाम थी। मगर यह सवाल फिर बचा रहता है कि परमेश्वर ने सदियों तक अपने लोगों को ऐसा रास्ता क्यों दिया जो अपने आप में जीवन न दे सके। पौलुस इसे रहस्य में छोड़ देता है, बस एक सीमा खींचकर: "क्या व्यवस्था परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के विरोध में है? कदापि नहीं!" जवाब कम है, भरोसा ज़्यादा।

पहले सुननेवाले

कल्पना कीजिए वह कमरा जिसमें यह चिट्ठी ऊँची आवाज़ में पढ़ी जा रही है। उसमें एक दास खड़ा है जिसके पास बैठने का हक़ नहीं; एक स्त्री है जो पूजा में गिनी नहीं जाती; एक यूनानी है जिसे बताया गया कि वह दूसरे दर्जे का विश्वासी है। और वे सुनते हैं: "अब न कोई यहूदी रहा और न यूनानी; न कोई दास, न स्वतंत्र; न कोई नर, न नारी।" हमारे कानों में यह नारे जैसा लगता है; उनके कानों में यह बैठने की जगह थी, रोटी में हिस्सा, नाम से पुकारा जाना। पौलुस कहता है कि उन्होंने "मसीह को पहन लिया" है, जैसे कपड़ा, और उस कपड़े के नीचे किसी की सामाजिक पोशाक नहीं दिखती। यही इस अध्याय की सबसे तीखी नैतिक माँग है: जिसे परमेश्वर ने वारिस कहा, उसे मैं किस अधिकार से कम आँकूँ?

चिंतन

आपके जीवन में वह कौन सी एक चीज़ है जिसके सहारे आप चुपचाप अपने आप को परमेश्वर के सामने स्वीकार्य ठहराते हैं, और अगर वह छिन जाए तो क्या बचेगा?

अगले सप्ताह आपकी मेज़, आपका समय और आपका पैसा किन लोगों तक पहुँचेगा, और क्या उस सूची में वही लोग हैं जिन्हें आपकी दुनिया "कम" गिनती है?

Galatians में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Galatians For You

Timothy Keller

The freedom of the gospel, verse by verse, in Keller's clearest voice.

The Message of Galatians

John Stott

Stott's punchy classic on grace alone against every rival gospel.

Galatians: An Introduction and Commentary

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Galatians 3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

गलातियों 3 का क्या अर्थ है?
पौलुस बात की शुरुआत तारीफ से नहीं, झिड़की से करता है: "हे निर्बुद्धि गलातियों, किसने तुम्हें मोह लिया?" फिर वह एक ही सवाल को घुमा-फिराकर पूछता है, कि पवित्र आत्मा तुम्हें व्यवस्था के कामों से मिला या विश्वास के समाचार से? इसके बाद वह अब्राहम तक पीछे जाता है, दिखाता है कि प्रतिज्ञा व्यवस्था से चार सौ तीस वर्ष पहले की है, कि मसीह हमारे लिये श्रापित बनकर हमें व्यवस्था के श्राप से मोल लेकर छुड़ाया, और अंत में उस कमरे की दीवारें गिरा देता है जिसमें यहूदी और यूनानी, दास और स्वतंत्र, नर और नारी अलग-अलग बैठते थे।
गलातियों 3 किस विषय में है?
पौलुस अब्राहम को इसलिये नहीं उठाता कि वह एक पुराना उदाहरण है, बल्कि इसलिये कि परमेश्वर ने उससे जो कहा था, "तुझ में सब जातियाँ आशीष पाएँगी," वह अभी पूरा हो रहा था, गलातिया के अन्यजाति विश्वासियों में। कहानी का धागा सीधा है: प्रतिज्ञा, फिर व्यवस्था जो "अपराधों के कारण बाद में दी गई," फिर वह एक वंश जिसमें प्रतिज्ञा उतरती है, और अंत में आत्मा का दान। मसीह इस धागे का बीचोंबीच है, इस तरह कि जो श्राप व्यवस्था ने उजागर किया था, वह उसने काठ पर अपने ऊपर ले लिया। कहानी सजा से आशीष की ओर नहीं चली; वह सजा के भीतर से गुज़रकर आशीष तक पहुँची।
गलातियों 3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
गलातिया रोमी साम्राज्य का एक प्रांत था, जहाँ पौलुस की सेवकाई से अन्यजातियों की कलीसियाएँ खड़ी हुई थीं। उसके जाने के बाद कुछ शिक्षक आए जिनका तर्क धार्मिक रूप से बहुत ठोस लगता था: अब्राहम की सन्तान बनना है तो उसका चिह्न भी लो, खतना कराओ, व्यवस्था के नियम मानो। इसमें सामाजिक दबाव भी था। उस दुनिया में इज़्ज़त इस बात से तय होती थी कि आप किस समूह के भीतर गिने जाते हैं। खतनारहित अन्यजाति विश्वासी न मंदिर की दुनिया में थे, न यहूदी समाज में, न मूर्तिपूजक त्योहारों में। वे बीच में लटके हुए लोग थे, और लटके रहने से बुरा कुछ नहीं लगता। पौलुस उनसे कहता है: तुम्हारी पहचान का काग़ज़ पहले ही लिखा जा चुका है।
गलातियों 3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
कल्पना कीजिए वह कमरा जिसमें यह चिट्ठी ऊँची आवाज़ में पढ़ी जा रही है। उसमें एक दास खड़ा है जिसके पास बैठने का हक़ नहीं; एक स्त्री है जो पूजा में गिनी नहीं जाती; एक यूनानी है जिसे बताया गया कि वह दूसरे दर्जे का विश्वासी है। और वे सुनते हैं: "अब न कोई यहूदी रहा और न यूनानी; न कोई दास, न स्वतंत्र; न कोई नर, न नारी।" हमारे कानों में यह नारे जैसा लगता है; उनके कानों में यह बैठने की जगह थी, रोटी में हिस्सा, नाम से
गलातियों 3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
अगले सप्ताह आपकी मेज़, आपका समय और आपका पैसा किन लोगों तक पहुँचेगा, और क्या उस सूची में वही लोग हैं जिन्हें आपकी दुनिया "कम" गिनती है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Galatians 3 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 24

व्यवस्था मंज़िल नहीं थी, वह रास्ता दिखाने वाली थी। "अतः व्यवस्था मसीह तक पहुँचाने के लिए हमारी शिक्षक हुई, कि हम विश्वास से धर्मी ठहरें।" जो नियम तुम्हें तुम्हारी कमज़ोरी दिखाता है, वह तुम्हें शर्मिंदा करने नहीं, मसीह के दरवाज़े तक छोड़ने आया है। सवाल यह है: तुम दरवाज़े पर खड़े रह गए, या भीतर गए?

प्रार्थना संपादकीय पर पद 13

पिता, आपने मुझे उस बोझ से छुड़ाया जो मैं खुद कभी नहीं उठा सकता था। मसीह ने मेरी जगह वह सब सह लिया, और अब मेरे ऊपर कोई दोष नहीं रह गया। जब मन फिर से खुद को दोषी ठहराने लगे, तो मुझे याद दिलाइए कि कीमत चुकाई जा चुकी है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 10

जो कोई व्यवस्था की पुस्तक में लिखी हुई सब बातों के करने में स्थिर नहीं रहता, वह श्रापित है।" ध्यान दे, शर्त "सब बातों" है, कुछ बातें नहीं। अपनी कोशिशों के भरोसे जीना ऐसा है जैसे टूटी डोर से लटकना। एक भी गाँठ खुली, तो सब खत्म। तू आज किस चीज़ पर टिका है, अपने अच्छे कामों की गिनती पर, या मसीह पर?

धन्यवाद संपादकीय पर पद 17

पिता, धन्यवाद कि जो वाचा आपने पक्की की, उसे चार सौ तीस वर्ष भी मिटा न सके और न व्यवस्था उसे रद्द कर सकी। धन्यवाद कि आपकी प्रतिज्ञा कभी व्यर्थ नहीं ठहरती। मेरे जीवन की देरी और मेरी कमज़ोरियाँ भी आपके वचन को नहीं तोड़ सकतीं। इसी भरोसे में मैं आज विश्राम पाता हूँ।

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