उत्पत्ति 29:20
पाठ
याकूब ने राहेल को पाने के लिए लाबान के यहाँ सात वर्ष तक मेहनत की। और वे सात साल, जो किसी भी मज़दूर के लिए एक लंबा, थकाऊ अनुबंध होते, उसे "थोड़े ही दिनों के बराबर" लगे। कारण पाठ स्वयं बताता है: "राहेल की प्रीति के कारण।" यह वाक्य किसी रोमांटिक कहानी का सजावटी वाक्य नहीं है, यह एक हिसाब है। सात साल की बिना मज़दूरी की सेवा, धूप में भेड़-बकरियों के पीछे, एक चालाक ससुर के अधीन, एक परदेसी के रूप में; और यह सब तराज़ू के एक पलड़े पर रखकर दूसरे पलड़े पर सिर्फ़ एक स्त्री। तराज़ू फिर भी प्रेम की ओर झुक जाता है। मूसा यहाँ हमें याकूब की भावना का नहीं, बल्कि उसके मूल्यांकन का ब्यौरा दे रहे हैं।
केंद्रीय बात
यह पद हमें सिखाता है कि प्रेम समय को नापने का तरीक़ा बदल देता है। जो सेवा मजबूरी में की जाए वह गिनी जाती है; जो प्रेम में की जाए वह भूल जाती है कि उसने कितना दिया। और ठीक यही परमेश्वर के अपने व्यवहार का ढाँचा है। बाइबल का परमेश्वर अपने लोगों को सस्ते में नहीं पाता; वे मोल चुकाते हैं, प्रतीक्षा करते हैं, सदियों तक एक वाचा को थामे रहते हैं। इब्राहीम से लेकर क्रूस तक का लंबा इंतज़ार परमेश्वर की सुस्ती नहीं, उनकी लगन है। याकूब यहाँ अनजाने में एक छाया बन जाता है: वह दूल्हा जो दुल्हन को कमाता है, जो अपनी क़ीमत पर उसे अपना बनाता है। पर याकूब को धोखा मिलेगा, और मसीह को क्रूस; और दोनों में से केवल एक ने घाटा जानते हुए भी क़ीमत चुकाई।
मुख्य सूत्र
बाइबल की कहानी बार-बार एक कुएँ पर, एक दुल्हन पर और एक क़ीमत पर लौटती है। इब्राहीम अपने दास को भेजता है ताकि इसहाक के लिए दुल्हन लाई जाए; यहाँ याकूब स्वयं कुएँ पर पहुँचता है और भारी पत्थर अकेले लुढ़का देता है। ये दृश्य संयोग नहीं हैं, ये परमेश्वर की कहानी के दोहराए जाते सुर हैं, क्योंकि पूरे शास्त्र में परमेश्वर स्वयं को एक दूल्हे के रूप में प्रकट करते हैं जो अपनी प्रजा को अपने लिए मोल लेते हैं। याकूब सात वर्ष देता है और उन्हें थोड़ा समझता है। मसीह अपना लहू देते हैं और उसे भी उस आनन्द के आगे सहनीय समझते हैं जो उनके सामने रखा था। छाया और वास्तविकता में अन्तर यही है: याकूब ने एक सुन्दर स्त्री के लिए मेहनत की, मसीह ने एक कुरूप, विद्रोही दुल्हन के लिए। प्रेम ने वहाँ भी समय को छोटा कर दिया, पर वहाँ प्रेम पहले से मौजूद योग्यता पर नहीं टिका था।
दर्पण
आप जानते हैं कि आप किस चीज़ से प्रेम करते हैं, इससे नहीं कि आप क्या कहते हैं, बल्कि इससे कि किस काम में आपका समय छोटा लगता है। जिस परियोजना के लिए आप देर रात तक जागते हैं और घड़ी नहीं देखते, वही आपका राहेल है। और उलटा भी सच है: जिस काम में हर मिनट भारी लगता है, वहाँ प्रेम सूख चुका है, चाहे कर्तव्य ज़िंदा हो। बच्चों की देखभाल, माता-पिता की बीमारी, मंडली की सेवा, विवाह के वे साल जो बस "निभाए" जा रहे हैं; इन सबमें सवाल यह नहीं कि आप कितना करते हैं, बल्कि यह कि आप गिन रहे हैं या नहीं। जहाँ हिसाब शुरू होता है, वहाँ प्रेम पहले ही ठंडा पड़ चुका होता है। आज एक काम कीजिए: उस एक ज़िम्मेदारी का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसे आप इन दिनों गिन-गिनकर निभा रहे हैं, और उसके नीचे लिखिए कि मसीह ने आपके लिए क्या गिनना छोड़ दिया।
संदर्भ
याकूब हारान में एक भगोड़ा है। वह अपने भाई एसाव के क्रोध से भागा है, पिता को छला है, और उसके पास न दहेज है न सम्पत्ति। मध्य पूर्व की उस दुनिया में विवाह के लिए वर के परिवार को कन्या के पिता को "मोहर" देनी पड़ती थी, अक्सर मोटी रक़म। याकूब के पास देने को कुछ नहीं, केवल अपना शरीर और अपने वर्ष। इसलिए वह अपनी देह को ही मुद्रा बना देता है: सात वर्ष की सेवा। लाबान इस स्थिति को तुरंत भाँप लेता है; पद पन्द्रह में उसका मीठा वाक्य, "भाई-बन्धु होने के कारण तुझ से मुफ्त सेवा कराना मेरे लिए उचित नहीं है," दरअसल सौदेबाज़ी की शुरुआत है। ठग अब ठगे जाने की जगह पर खड़ा है, और उसे पता नहीं।
एक बारीकी
ध्यान दीजिए कि पाठ नहीं कहता कि वे सात वर्ष याकूब को छोटे लगे, बल्कि "थोड़े ही दिनों के बराबर" लगे। इब्रानी में यह शब्द दिनों की गिनती का है, वही शब्द जो अध्याय की शुरुआत में समय के बीतने के लिए इस्तेमाल होता है। यानी लेखक हमें एक तुलना दे रहा है: सात वर्ष बनाम कुछ दिन। यह अतिशयोक्ति नहीं, याकूब का अपना आंतरिक हिसाब है, और उसमें एक कड़वी विडंबना छिपी है। वह अपने पिता इसहाक के पास कुछ ही दिनों के लिए छिपने भेजा गया था; उसकी माता रिबका ने यही सोचा था। वे "थोड़े दिन" बीस साल में बदल जाएँगे। प्रेम समय को छोटा कर देता है, पर धोखा उसे लंबा खींच देता है, और याकूब दोनों का स्वाद चखेगा।
मुख्य पात्र
याकूब इस पद में पहली बार सचमुच उदार दिखता है। अब तक उसकी कहानी हथियाने की कहानी थी: एड़ी पकड़ना, दाल के बदले पहलौठे का अधिकार, बकरी की खाल पहनकर आशीष चुराना। यहाँ वह पहली बार देता है, और खुले हाथ देता है। कुएँ का भारी पत्थर वह अकेले लुढ़काता है, राहेल को देखकर ऊँचे स्वर से रोता है, और सात वर्ष बिना मोल-भाव के प्रस्तुत कर देता है। यह वही आदमी है जो कभी अपने भूखे भाई से सौदा करता था। प्रेम ने उसके भीतर कुछ खोल दिया है। पर सावधान रहिए: यह अभी पवित्रता नहीं, यह जुनून है। वही जुनून आगे उसके घर में पक्षपात, ईर्ष्या और लिआ के आँसू पैदा करेगा। परमेश्वर इस टेढ़े आदमी को छोड़ते नहीं, पर सुधारते ज़रूर हैं।
अन्य शास्त्रवचन
इस अध्याय का अंत सबसे बड़ी विडंबना है। जिस स्त्री के लिए याकूब ने चौदह वर्ष दिए, उससे मसीह की वंशावली नहीं चलती। वह अनचाही लिआ से चलती है, जिसके चौथे पुत्र के बारे में लिखा है: "अब की बार तो मैं यहोवा का धन्यवाद करूँगी। इसलिए उसने उसका नाम यहूदा रखा," और उसी नाम पर मत्ती की वंशावली खुलती है। परमेश्वर की चुनाव-नीति मनुष्य की पसंद के उलट चलती है; वे "धुन्धली आँखें" वाली को चुनते हैं। दूसरी ओर, नया नियम पौलुस के द्वारा मसीह को उस दूल्हे के रूप में दिखाता है जिसने कलीसिया के लिए स्वयं को दे दिया; याकूब की सात-वर्षीय सेवा उस समर्पण की धुँधली, अधूरी झलक है, जिसमें दूल्हा दुल्हन को कमाता है, न कि दुल्हन दूल्हे को।
श्रोताओं का चेहरा
पहले सुनने वाले वे इस्राएली थे जो मिस्र की ग़ुलामी से निकले थे या उसकी यादों में पले थे। उनके कानों में "सेवा" शब्द निर्दोष नहीं था; वही मूल शब्द उनकी ग़ुलामी के लिए भी इस्तेमाल होता है। वे जानते थे कि किसी और के लिए साल गिनना क्या होता है। और फिर उन्हें बताया जाता है कि उनके पूर्वज ने चौदह वर्ष सेवा की, स्वेच्छा से, प्रेम के कारण, और उसमें से बारह गोत्र जन्मे। यानी उनका पूरा राष्ट्र एक ऐसे आदमी के परिश्रम और एक ऐसे परमेश्वर के धीरज से निकला जिसने छल-कपट के बीच भी वाचा नहीं छोड़ी। यह सुनकर वे राहत की साँस ले सकते थे: हमारी शुरुआत आदर्श नहीं थी, फिर भी परमेश्वर ने हाथ नहीं खींचा।
कठिन प्रश्न
यदि याकूब का प्रेम इतना सच्चा था, तो परमेश्वर ने उसे धोखा क्यों खाने दिया? सात वर्ष की ईमानदार मेहनत का प्रतिफल एक अंधेरे तंबू में की गई ठगी क्यों बनी? पाठ कोई सफ़ाई नहीं देता। वह न कहता है कि यह याकूब के अपने छल का दंड था, न यह कि परमेश्वर ने इसे रोकने की कोशिश की। हमें अपने आप जोड़ना पड़ता है कि जिस आदमी ने बड़े भाई का हक़ छीना था, उसे अब बड़ी बेटी के हक़ के नाम पर ठगा गया। यह न्याय जैसा दिखता है, पर परमेश्वर इसे कहीं घोषित नहीं करते। शायद इसीलिए कि जीवन में सुधार अक्सर व्याख्या के बिना आता है। हमें केवल यह दिखता है कि परमेश्वर टूटे-फूटे लोगों के बीच से भी अपनी वाचा को आगे बढ़ाते हैं, और यह राहत भी है और चुनौती भी।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन में इस समय कौन सा काम है जिसे करते हुए आप घड़ी नहीं देखते, और वह आपके सच्चे प्रेम के बारे में क्या बताता है?
लिआ को "अप्रिय" कहा गया, फिर भी मसीह की वंशावली उसी से चली। जिन लोगों को आप या आपकी मंडली अनदेखा करती है, उनमें परमेश्वर क्या कर रहे हो सकते हैं?
मसीह ने आपके लिए जो क़ीमत चुकाई, वह उन्हें भारी लगी या हल्की, और यह जानना आपकी आज की आज्ञाकारिता को कैसे बदलता है?
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