बाइबल व्याख्या

उत्पत्ति 37

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

सत्रह साल का एक लड़का, पिता का दुलारा, रंग-बिरंगा अंगरखा पहने, अपने भाइयों की शिकायतें पिता तक पहुँचाता है और अपने सपने उन्हें सुनाता है जिनमें वे सब उसके आगे झुकते हैं। भाइयों की नफ़रत पकती है, और दोतान के मैदान में वह पक कर फूट पड़ती है: गड्ढा, चाँदी के बीस टुकड़े, मिस्र की ओर जाता एक ऊँटों का दल। घर पर लौटता है सिर्फ़ खून में डुबोया हुआ अंगरखा, और एक बूढ़ा पिता जो टाट लपेटकर विलाप करता है और जिसे "शान्ति न मिली"।

मर्म

इस पूरे अध्याय में परमेश्वर एक बार भी नहीं बोलते। न कोई दर्शन, न कोई वाचा, न कोई हस्तक्षेप। यह चुप्पी संयोग नहीं है, यह बाइबल का सबसे ईमानदार धर्मशास्त्रीय बयान है: परमेश्वर तब भी काम कर रहे होते हैं जब कहानी में उनका नाम भी नहीं आता। यूसुफ के सपने परमेश्वर से आए थे, यह हम बाद में जानते हैं; लेकिन गड्ढे के तल पर वे सपने मज़ाक लगते हैं। भाइयों का ताना, "फिर हम देखेंगे कि उसके स्वप्नों का क्या फल होगा", असल में इस अध्याय का सबसे विडंबनापूर्ण वाक्य है। मनुष्य की ईर्ष्या, पिता का पक्षपात, और व्यापारियों का लालच, ये तीनों मिलकर परमेश्वर की योजना को रोकते नहीं, उसे ढोकर मिस्र तक ले जाते हैं। यह सस्ता आशावाद नहीं है। यह वादा है कि बुराई अंतिम शब्द नहीं बोलती।

बड़ी कहानी का सूत्र

एक प्रिय पुत्र, जिसे पिता भेजता है, जिसे अपने ही भाई पहचानने से इनकार करते हैं, जिसका वस्त्र उतारा जाता है, जिसे चाँदी के टुकड़ों में बेचा जाता है, जो मृत माना जाता है और जो जीवित निकलकर उन्हीं भाइयों का उद्धारक बनता है। इस साँचे को अनदेखा करना कठिन है। स्तिफनुस ने अपने भाषण में इसी घटना से शुरुआत की थी (प्रेरि. 7:9), क्योंकि इस्राएल की कहानी में एक पैटर्न है: ठुकराया गया भाई ही बचानेवाला बनता है। यह ज़ोर-ज़बरदस्ती वाली रूपक-बाज़ी नहीं है; यह वही तरीका है जिससे परमेश्वर काम करते आए हैं। यूसुफ मसीह नहीं है, लेकिन यूसुफ की कहानी हमारी आँखों को उस आकार के लिए तैयार करती है जिसे हम बाद में क्रूस पर पहचानेंगे।

आईना

पद 4 का आधा वाक्य आपको रोक लेगा: "उसके साथ ठीक से बात भी नहीं करते थे।" हत्या से पहले चुप्पी आती है। पहले हम किसी को ठंडे शब्दों में समेट देते हैं, फिर छोटे जवाब देते हैं, फिर उसे बातचीत से बाहर कर देते हैं, और एक दिन हमें हैरानी होती है कि दिल में इतनी कड़वाहट कहाँ से आई। शायद वह भाई हो जिससे बँटवारे के बाद संबंध ठंडा पड़ा। शायद वह सहकर्मी जिसकी तरक्की चुभती है। शायद वह रिश्तेदार जिसका नाम आते ही आपके चेहरे का भाव बदल जाता है, और आप इसे "बस दूरी" कहकर टाल देते हैं।

और याकूब का आईना भी छोड़िए मत। उसने प्रेम किया, पर असमान रूप से, और उस अंगरखे को सिलवाकर उसने अपने घर में विभाजन पहन दिया। माता-पिता, चाचा-मामा, शिक्षक: हम अपने पसंदीदा को इनाम देते हैं और सोचते हैं बाक़ी को पता नहीं चलेगा। उन्हें हर बार पता चलता है।

आज, दस मिनट में: उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिससे आप महीनों से "ठीक से बात" नहीं कर रहे, और उसे एक सादा वाक्य भेज दीजिए, कोई सफ़ाई नहीं, कोई शिकायत नहीं, बस यह पूछते हुए कि वह कैसा है।

एक बारीकी

पद 25: "तब वे रोटी खाने को बैठ गए।" भाई अपने सगे भाई को सूखे गड्ढे में डालकर, उसकी आवाज़ सुनते हुए, खाना खोलकर बैठ जाते हैं। बाइबल इस पर कोई टिप्पणी नहीं करती, और यही उसकी सबसे तीखी टिप्पणी है। क्रूरता आम तौर पर चीख़ती नहीं, वह भूख लगने पर खाना खा लेती है। इसी भोजन के दौरान उन्हें ऊँटों का दल दिखता है और यहूदा को एक "व्यावहारिक" विचार आता है: मारने से "क्या लाभ होगा", बेचने से पैसा मिलेगा। ध्यान दीजिए कि यह वाक्य समझौते जैसा लगता है, दयालु भी लगता है, पर यह हत्या को मुनाफ़े में बदल देता है। हमारे सबसे बड़े पाप अक्सर तर्कसंगत, सुविधाजनक और भूख के बीच लिए गए फ़ैसले होते हैं।

पृष्ठभूमि

याकूब कनान में परदेशी की तरह बसा है, हेब्रोन की तराई में, और भेड़-बकरियाँ चराने के लिए बेटों को उत्तर की ओर शेकेम तक भेजता है, लगभग अस्सी किलोमीटर दूर। शेकेम वही जगह है जहाँ इस परिवार ने कुछ समय पहले खून-ख़राबा किया था, इसलिए वहाँ अकेले घूमता एक लड़का जोखिम में है। घर की राजनीति सीधी है: चार माताएँ, बारह बेटे, और एक पिता जिसने अपनी प्रिय पत्नी के पुत्र को खुलेआम चुन लिया है। यूसुफ बड़े भाइयों के बीच पर्यवेक्षक की भूमिका में है और उनकी रिपोर्ट पिता तक पहुँचाता है, यानी वह उनकी नज़र में मुख़बिर है। चाँदी के बीस टुकड़े उस युग में एक किशोर दास की सामान्य कीमत थी। गिलाद से मिस्र जाने वाला यह सुगंध-द्रव्यों का कारवाँ रोज़ का व्यापार था; इस व्यापार के लिए एक और लड़का बस माल था।

मुख्य पात्र

यूसुफ को आदर्श बनाकर पढ़ना इस अध्याय के साथ बेईमानी है। वह चुगलख़ोर है, वह विशेष अंगरखा पहनकर घूमता है, और वह अपने सपने ऐसे लोगों को सुनाता है जिनके पास सुनने की कोई वजह नहीं। दूसरा सपना सुनाने की ज़रूरत तो बिल्कुल नहीं थी; पिता तक उसे डाँटना पड़ा। और फिर भी परमेश्वर इस अपरिपक्व, कुछ घमंडी लड़के को सपने देते हैं और उसे नहीं छोड़ते। यही अनुग्रह की असली परख है: परमेश्वर तैयार लोगों को नहीं चुनते, वे चुनकर तैयार करते हैं। मैदान में भटकते हुए यूसुफ से एक अजनबी पूछता है, "तू क्या ढूँढ़ता है?" वह अपने भाइयों को ढूँढ़ रहा है और उन्हीं के हाथों बिकेगा। जो लड़का गड्ढे में उतरता है और जो व्यक्ति बाद में मिस्र में उभरता है, उनके बीच का फ़र्क़ बीस साल के दुख का काम है।

मनन के प्रश्न

किस व्यक्ति से आप "ठीक से बात" नहीं करते, और आप इस चुप्पी को अपने मन में कौन-सा उचित नाम देते हैं?

परमेश्वर इस अध्याय में एक बार भी नहीं बोलते। आपके जीवन के किस हिस्से में यह चुप्पी अभी चल रही है, और आप उसे कैसे पढ़ रहे हैं?

Genesis में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Genesis

Derek Kidner

A beloved compact classic that opens up Genesis with warmth and precision.

The Message of Genesis 1-11

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The Message of Genesis 12-50

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Abraham to Joseph: the promises of God traced through one family.

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Genesis 37 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

उत्पत्ति 37 का क्या अर्थ है?
सत्रह साल का एक लड़का, पिता का दुलारा, रंग-बिरंगा अंगरखा पहने, अपने भाइयों की शिकायतें पिता तक पहुँचाता है और अपने सपने उन्हें सुनाता है जिनमें वे सब उसके आगे झुकते हैं। भाइयों की नफ़रत पकती है, और दोतान के मैदान में वह पक कर फूट पड़ती है: गड्ढा, चाँदी के बीस टुकड़े, मिस्र की ओर जाता एक ऊँटों का दल। घर पर लौटता है सिर्फ़ खून में डुबोया हुआ अंगरखा, और एक बूढ़ा पिता जो टाट लपेटकर विलाप करता है और जिसे "शान्ति न मिली"।
उत्पत्ति 37 किस विषय में है?
एक प्रिय पुत्र, जिसे पिता भेजता है, जिसे अपने ही भाई पहचानने से इनकार करते हैं, जिसका वस्त्र उतारा जाता है, जिसे चाँदी के टुकड़ों में बेचा जाता है, जो मृत माना जाता है और जो जीवित निकलकर उन्हीं भाइयों का उद्धारक बनता है। इस साँचे को अनदेखा करना कठिन है। स्तिफनुस ने अपने भाषण में इसी घटना से शुरुआत की थी (प्रेरि.
उत्पत्ति 37 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
और याकूब का आईना भी छोड़िए मत। उसने प्रेम किया, पर असमान रूप से, और उस अंगरखे को सिलवाकर उसने अपने घर में विभाजन पहन दिया। माता-पिता, चाचा-मामा, शिक्षक: हम अपने पसंदीदा को इनाम देते हैं और सोचते हैं बाक़ी को पता नहीं चलेगा। उन्हें हर बार पता चलता है।
उत्पत्ति 37 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पद 25: "तब वे रोटी खाने को बैठ गए।" भाई अपने सगे भाई को सूखे गड्ढे में डालकर, उसकी आवाज़ सुनते हुए, खाना खोलकर बैठ जाते हैं। बाइबल इस पर कोई टिप्पणी नहीं करती, और यही उसकी सबसे तीखी टिप्पणी है। क्रूरता आम तौर पर चीख़ती नहीं, वह भूख लगने पर खाना खा लेती है। इसी भोजन के दौरान उन्हें ऊँटों का दल दिखता है और यहूदा को एक "व्यावहारिक" विचार आता है: मारने से "क्या लाभ होगा", बेचने से पैसा मिलेगा। ध्यान दीजिए कि यह वाक्य समझौते जैसा लगता है, दयालु भी लगता है, पर यह हत्या को मुनाफ़े में बदल देता है। हमारे सबसे बड़े पाप अक्सर तर्कसंगत, सुविधाजनक और भूख के बीच लिए गए फ़ैसले होते हैं।
उत्पत्ति 37 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यूसुफ को आदर्श बनाकर पढ़ना इस अध्याय के साथ बेईमानी है। वह चुगलख़ोर है, वह विशेष अंगरखा पहनकर घूमता है, और वह अपने सपने ऐसे लोगों को सुनाता है जिनके पास सुनने की कोई वजह नहीं। दूसरा सपना सुनाने की ज़रूरत तो बिल्कुल नहीं थी; पिता तक उसे डाँटना पड़ा। और फिर भी परमेश्वर इस अपरिपक्व, कुछ घमंडी लड़के को सपने देते हैं और उसे नहीं छोड़ते। यही अनुग्रह की असली परख है: परमेश्वर तैयार लोगों को नहीं चुनते, वे चुनकर तैयार करते है
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Genesis 37 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

उसके भाई अपने पिता की भेड़-बकरियाँ चराने के लिये शेकेम को गए।" शेकेम वही जगह थी जहाँ उनके हाथ खून से रंगे थे। फिर भी वे लौट गए, मानो कुछ हुआ ही न हो। और उसी जगह याकूब ने अपने प्यारे बेटे को भेज दिया। कभी सोचा है, जिस पाप को आपने दबा दिया, वह किस जगह आपका इंतज़ार कर रहा है?

प्रार्थना संपादकीय पर पद 21

पिता, जब किसी के साथ अन्याय होने लगे और सब चुप रह जाएँ, मुझे वह आवाज़ बनने का साहस दे जो कहे, नहीं, ऐसा मत करो। मेरे मन से डर हटा, ताकि मैं किसी की जान, किसी का सम्मान बचाने के लिए खड़ा हो सकूँ। मुझे ऐसा दिल दे जो दूसरों की पीड़ा महसूस करे।

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