भजन संहिता 103:1
पाठ
कवि किसी सभा को संबोधित नहीं करता, किसी शत्रु को नहीं, परमेश्वर को भी सीधे नहीं। वह अपने ही भीतर मुड़कर अपने मन से बात करता है और उसे आज्ञा देता है: "हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह।" फिर वह और आगे बढ़ता है, मानो मन अकेला काफी न हो: "और जो कुछ मुझ में है, वह उसके पवित्र नाम को धन्य कहे!" यानी हड्डियाँ, साँस, स्मृति, वे कोने भी जो थके हुए हैं या शर्मिंदा। एक आदमी अपने पूरे भीतरी संसार को इकट्ठा करके उसे परमेश्वर के नाम की ओर मोड़ रहा है, जैसे कोई बिखरे हुए घर को एक ही दिशा में सजा रहा हो।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि यहाँ स्तुति अपने आप नहीं फूट पड़ती; उसे बुलाना पड़ता है। यह आयत मान लेती है कि मनुष्य अपने भीतर बँटा हुआ है, कि मन कहीं और भटक सकता है जबकि होंठ भजन गा रहे हों। इसलिए भक्ति यहाँ भावना नहीं, एक निर्णय है, लगभग एक आदेश जो कोई अपने आप को देता है। और दूसरी बात, जो और भी अजीब है: एक मिट्टी का प्राणी परमेश्वर को "धन्य" कहता है। आशीष तो ऊपर से नीचे आती है, फिर नीचे से ऊपर क्या जा सकता है? शायद यही, कि हम उन्हें वही लौटाते हैं जो उन्होंने दिया, नाम को पहचानकर, उसे पवित्र मानकर। स्तुति परमेश्वर को बड़ा नहीं बनाती; वह हमें उनके सामने सही आकार में खड़ा कर देती है।
सूत्र
पूरे भजन में यह पहली आयत एक द्वार की तरह है, और द्वार के पार जो दिखता है वह क्षमा है: "वही तो तेरे सब अधर्म को क्षमा करता।" यानी आत्मा को स्तुति के लिए जगाने का कारण कोई सामान्य अच्छाई नहीं, बल्कि यह कि परमेश्वर ने "हमारे पापों के अनुसार हम से व्यवहार नहीं किया।" यहीं से एक रेखा सीधे मसीह तक जाती है। क्योंकि भजनकार यह तो जानता है कि पाप दूर किए जाते हैं, पर यह नहीं बताता कि वे कहाँ जाते हैं। नया नियम उसी खुले प्रश्न पर उत्तर रखता है: क्रूस पर। और तब "हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह" केवल एक इस्राएली की आत्म-प्रेरणा नहीं रह जाती, वह हर उस व्यक्ति की भाषा बन जाती है जिसने जाना है कि उसका कर्ज़ किसी और ने चुकाया।
दर्पण
आपका मन शायद इस समय बहुत सी चीज़ों को धन्य कह रहा है, केवल परमेश्वर को नहीं। सुबह उठते ही जो पहली चीज़ आपके भीतर बोलती है, वह अक्सर चिंता होती है: दफ़्तर का वह ईमेल, बेटे के नंबर, महीने का अंत, शरीर में वह दर्द जिसकी जाँच आपने टाल रखी है। ये आवाज़ें बिना बुलाए आती हैं। स्तुति नहीं आती; उसे बुलाना पड़ता है, और यही इस आयत की चुभन है। भजनकार अपने आप से ऐसे बात करता है जैसे कोई थके हुए बच्चे को कंधे पर हाथ रखकर उठाता है। वह अपनी भावनाओं का इंतज़ार नहीं करता। और "जो कुछ मुझ में है" का अर्थ है कि शर्मिंदा हिस्सा भी बाहर नहीं छोड़ा जाता।
आज, अकेले में, ऊँची आवाज़ में अपने आप को संबोधित करके कहिए: "हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह," और उसके तुरंत बाद एक ही वाक्य में वह बात बोलिए जिसे आपने आज तक परमेश्वर के सामने स्वीकार नहीं किया था कि वह उनकी दया थी।
संदर्भ
यह भजन दाऊद के नाम से जुड़ा है, पर इसकी भाषा और इसका मिज़ाज उस समुदाय का है जो बहुत कुछ खो चुका था और फिर भी जीवित था। यहाँ कोई शत्रु नहीं, कोई शिकायत नहीं, कोई मन्नत नहीं। यह किसी बड़े संकट के बाद की शांति है, जब आदमी बच निकला है और अब बैठकर गिनती करता है। इस्राएल में स्तुति सामूहिक काम थी, मंदिर में, गायकों के साथ, त्योहारों पर। पर यह आयत एकांत की है। एक आदमी अपने ही भीतर मंदिर बना रहा है। और ध्यान दीजिए कि यही भजन अंत तक जाकर स्वर्गदूतों, सेनाओं और "यहोवा की सारी सृष्टि" को बुला लेता है। एकांत की फुसफुसाहट से शुरू होकर ब्रह्मांड तक फैलने वाला एक स्वर।
एक बारीकी
"हे मेरे मन" में जो इब्रानी शब्द है, नेफ़ेश, उसका अर्थ केवल मन या भावना नहीं। मूल रूप से वह गला है, साँस लेने की जगह, और वहीं से उसका अर्थ बनता है: जीता-जागता पूरा व्यक्ति, भूख, प्यास, इच्छा, जीवन-शक्ति। भजनकार अपने किसी आध्यात्मिक हिस्से को नहीं जगा रहा; वह अपनी भूख को जगा रहा है। और फिर वह इसे दोहराता है, "जो कुछ मुझ में है," जिसका इब्रानी शब्द भीतरी अंगों की ओर इशारा करता है, आँतों की, पेट की, यानी वह गहराई जहाँ डर और प्रेम शरीर में महसूस होते हैं। यह आयत आत्मा और शरीर को अलग नहीं करती। जो कुछ आपके भीतर धड़कता है, काँपता है, तरसता है, वह सब बुलाया जा रहा है। कुछ भी बाहर नहीं।
मुख्य पात्र
यहाँ जो बोल रहा है वह एक बँटा हुआ आदमी है जो अपने बँटेपन को जानता है। यही उसकी सबसे बड़ी ईमानदारी है। वह यह दिखावा नहीं करता कि उसका पूरा अस्तित्व स्वाभाविक रूप से परमेश्वर की ओर झुका हुआ है; अगर ऐसा होता तो आदेश की ज़रूरत ही न पड़ती। वह अपने भीतर के उस हिस्से से बात करता है जो सुस्त है, जो शायद अभी-अभी बीमारी या अपराधबोध से उठा है, जो भूलने में माहिर है, इसलिए अगली ही आयत में वह कहता है, "उसके किसी उपकार को न भूलना।" यह आदमी अपने आप का चरवाहा बन रहा है। और उसके पीछे, बिना नाम लिए, परमेश्वर खड़े हैं जिनका "पवित्र नाम" ही इस पूरी हलचल का केंद्र है, वे जो जानते हैं "कि मनुष्य मिट्टी ही है।"
अंतर्पाठ
इसी भजन की सत्रहवीं आयत के साथ लूका का सुसमाचार जुड़ा है, जहाँ मरियम अपने गीत में परमेश्वर की उस करुणा की बात करती है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन पर बनी रहती है जो उनसे डरते हैं। मरियम भी अपने प्राण से शुरू करती है, अपने भीतर से, और वहीं से पूरे इतिहास तक पहुँचती है। यह संयोग नहीं। दूसरा गूँज इसी भजन के अंत में है: "हे यहोवा की सारी सृष्टि, उसके राज्य के सब स्थानों में उसको धन्य कहो। हे मेरे मन, तू यहोवा को धन्य कह!" भजन वहीं लौट आता है जहाँ से चला था। सृष्टि की पूरी परिक्रमा के बाद भी सबसे ज़रूरी काम बाकी रहता है: अपना मन। ब्रह्मांड गा सकता है और आप फिर भी चुप रह सकते हैं।
श्रोता
पहले सुननेवालों के कानों में "धन्य कहना" शब्द के साथ घुटने टेकने की तस्वीर आती थी; इब्रानी क्रिया का रिश्ता झुकने से है। यानी यह आयत केवल शब्द नहीं माँगती, शरीर की मुद्रा माँगती है। और "पवित्र नाम" उनके लिए हल्का वाक्यांश नहीं था। नाम वह था जो परमेश्वर ने स्वयं मूसा को प्रकट किया, और इस भजन की सातवीं आयत उसी की याद दिलाती है: "उसने मूसा को अपनी गति… प्रगट किए।" वे लोग जानते थे कि यह नाम बिना कारण मुँह में लेना खतरनाक है। इसलिए उनके लिए यह आयत एक साहसिक कदम थी: एक साधारण आदमी, मिट्टी का बना, उस नाम को अपने भीतर से पुकारने की हिम्मत कर रहा है, और वह भी घुटने टेककर, अधिकार से नहीं, कृतज्ञता से।
प्रश्न
पर क्या सचमुच आप अपने मन को आज्ञा दे सकते हैं? आयत यह मान लेती है कि हाँ, और अनुभव अक्सर कहता है नहीं। शोक में डूबा हुआ आदमी अपने आप से कहता है "धन्य कह," और भीतर से कोई उत्तर नहीं आता। तब क्या? गौर कीजिए कि भजन यह नहीं बताता कि मन ने आज्ञा मानी या नहीं। वह केवल आदेश दोहराता है, शुरू में और अंत में। शायद यही एकमात्र ईमानदार बात है जो कही जा सकती है: कि स्तुति कभी-कभी अभ्यास होती है, अनुभूति नहीं, और कि वह आदेश खुद एक प्रकार की प्रार्थना है। जो आदमी अपने चुप मन से बार-बार कहता है "यहोवा को धन्य कह," वह पहले से ही परमेश्वर की ओर मुड़ चुका है, भले ही उसे यह महसूस न हो।
चिंतन
आपके भीतर कौन सा हिस्सा है जिसे आपने अब तक स्तुति से बाहर रखा है, और क्यों?
अगर स्तुति आदेश है, भावना नहीं, तो आपकी दिनचर्या में वह आदेश कब और कहाँ दिया जाएगा?
आप परमेश्वर को "धन्य" कहने से क्या समझते हैं, जब देने को आपके पास कुछ भी अपना नहीं?
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