इब्रानियों 6:18
पाठ
इब्रानियों 6:18 एक लम्बे वाक्य का अन्तिम मोड़ है। परमेश्वर ने अब्राहम से प्रतिज्ञा की, और फिर उसी प्रतिज्ञा पर अपनी ही शपथ खाई, क्योंकि उनसे बड़ा कोई था ही नहीं जिसकी शपथ वे खाते। इस तरह दो चीज़ें सामने आ खड़ी होती हैं, प्रतिज्ञा और शपथ, "दो बे-बदल बातें", जिनमें "परमेश्वर का झूठा ठहरना अनहोना है"। और इसका मक़सद कोई तार्किक प्रमाण देना नहीं, बल्कि डरे हुए लोगों को थामना है, "हमारा दृढ़ता से ढाढ़स बन्ध जाए"। लेखक इन लोगों का वर्णन एक चलती हुई तस्वीर से करता है, वे बैठे नहीं हैं, वे "शरण लेने को दौड़े हैं", उस आशा की ओर जो उनके सामने रखी हुई है।
मूल बात
यहाँ परमेश्वर के चरित्र और वाचा का पूरा भार एक ही वाक्य में सिमट आता है। शपथ परमेश्वर को अधिक सच्चा नहीं बनाती; परमेश्वर पहले से ही सच हैं। शपथ हमारी कमज़ोरी के कारण दी गई है, ठीक वैसे ही जैसे वाचा में परमेश्वर स्वयं को मनुष्य की भाषा और रीति में बाँध लेते हैं, ताकि हम समझ सकें। यही अनुग्रह का असली आकार है: वे न केवल वादा करते हैं, वे अपने वादे को हमारे संदेह के स्तर तक झुककर पक्का करते हैं। ध्यान दीजिए कि यह सुरक्षा हमारे विश्वास की मात्रा पर नहीं, परमेश्वर के मनसा के अपरिवर्तनीय होने पर टिकी है। इसीलिए "शरण" शब्द इतना सटीक है। शरण वह जगह नहीं जिसे हम बनाते हैं, वह वह जगह है जिसमें हम गिरते हैं। और वहाँ जो हमें थामता है, वह हमारी पकड़ नहीं, उनकी शपथ है।
सूत्र
अब्राहम की प्रतिज्ञा से शुरू हुई रेखा यहाँ टूटती नहीं, आगे बढ़ती है। परमेश्वर ने मोरिय्याह पर्वत पर, जब इसहाक बचाया गया, शपथ खाई थी: "मैं सचमुच तुझे बहुत आशीष दूँगा, और तेरी सन्तान को बढ़ाता जाऊँगा।" वह शपथ एक ऐसे भविष्य की ओर इशारा करती थी जिसे अब्राहम ने पूरा नहीं देखा। इब्रानियों का लेखक कहता है कि उस शपथ के असली वारिस हम हैं, "प्रतिज्ञा के वारिस"। और इस पूरे तर्क का अन्त पद 20 में यीशु पर होता है, जो "सदाकाल का महायाजक" बनकर परदे के भीतर गए। यानी परमेश्वर की अपरिवर्तनीय मनसा किसी अमूर्त सिद्धान्त में नहीं, एक व्यक्ति में जाकर ठहरती है। वाचा का पूरा भार मसीह के शरीर पर टिकता है। शपथ शब्दों में दी गई, पर पूरी लहू में हुई।
दर्पण
आप जानते हैं कि परमेश्वर विश्वासयोग्य हैं। फिर भी जब नौकरी की चिट्ठी आती है, जब डॉक्टर की रिपोर्ट देर से मिलती है, जब बच्चा घर छोड़कर चला जाता है, तब वह जानना कहीं गहरे खिसक जाता है और एक पतली आवाज़ पूछती है, क्या पता वे सचमुच रहेंगे? यह पद उस आवाज़ को मूर्ख नहीं कहता। वह उसे गम्भीरता से लेता है, इतनी कि परमेश्वर स्वयं शपथ लेने पर उतर आते हैं। ध्यान दीजिए, ढाढ़स "दृढ़ता से" बँधता है, हिलते हुए नहीं। पर यह भी देखिए कि वह ढाढ़स दौड़नेवालों को मिलता है, उन्हें नहीं जो दूर खड़े होकर विषय पर विचार कर रहे हैं। शरण में ढाढ़स है, बहस में नहीं। कहाँ आप अभी सुरक्षित दूरी से परमेश्वर की सच्चाई नाप रहे हैं, भागकर उसमें गिरने के बजाय?
अन्तर्पाठ
"शरण लेने को दौड़े हैं" कोई सामान्य मुहावरा नहीं। इस्राएल में शरण नगर थे, जहाँ वह व्यक्ति भागता था जिसके हाथों अनजाने में किसी की जान गई हो, और खून का बदला लेनेवाला उसके पीछे था। वह दौड़ता था, रुकता नहीं था, और फाटक के भीतर पहुँचते ही वह जीवित था। लेखक यही तस्वीर उठाकर हमारे ऊपर रख देता है। हम सज्जन खोजी नहीं, हम भागे हुए लोग हैं। और शरण का फाटक हमारी योग्यता से नहीं, नगर की व्यवस्था से खुला रहता था, ठीक वैसे जैसे यहाँ हमें परमेश्वर की शपथ थामती है। इसी से पद 19 का लंगर समझ में आता है: दौड़ता हुआ आदमी और स्थिर लंगर, दोनों एक ही सत्य के दो चित्र हैं।
पहला पाठक
ये लोग थके हुए थे। पद 12 का "आलसी" शब्द केवल सुस्ती नहीं, वह मन का सुन्न पड़ जाना है जो लम्बे दबाव से आता है। उन्होंने पवित्र लोगों की सेवा की थी, नुक़सान झेला था, और अब सवाल उठ रहा था कि इतना सब सहकर मिला क्या। कुछ शायद पुरानी परिचित उपासना की ओर लौटने की सोच रहे थे, जहाँ मन्दिर था, दिखता हुआ याजक था, ठोस बलिदान था। उनके कानों में "दो बे-बदल बातें" कोई धर्मशास्त्रीय बारीकी नहीं थी। यह अदालत की भाषा थी: विवाद शपथ से पक्का होता है। लेखक कह रहा है कि तुम्हारा मुक़दमा पहले ही सबसे ऊँची अदालत में निपट चुका है, और गवाह स्वयं परमेश्वर हैं।
कठिन सवाल
अगर परमेश्वर की शपथ इतनी पक्की है, तो पद 4 से 8 की वह डरावनी चेतावनी क्यों, जिसमें भटकनेवालों के लिए लौटना "अनहोना" कहा गया है? एक ही अध्याय में दो "अनहोना": परमेश्वर का झूठा ठहरना, और भटके हुए का फिर नया बनाया जाना। लेखक इन्हें आपस में सुलझाता नहीं, वह दोनों को साथ खड़ा रहने देता है। शायद इसलिए कि सुरक्षा का उपयोग कभी लापरवाही के लिए न हो जाए। शपथ उन्हें दी गई है जो दौड़ रहे हैं, आराम कुर्सी पर बैठे हुए बीमा दावेदारों को नहीं। मैं इस तनाव को हल करने का दिखावा नहीं करूँगा। इतना कहूँगा: चेतावनी हमें दौड़ाती है, और शपथ हमें बताती है कि दौड़ के अन्त में कौन खड़ा है।
चिंतन
आपके जीवन में इस समय कौन सी परिस्थिति है जिसमें आप परमेश्वर की सच्चाई मानते तो हैं, पर उस पर टिके नहीं हैं?
"दौड़कर शरण लेना" आपके लिए इस सप्ताह ठोस रूप में कैसा दिखेगा, केवल भावना में नहीं बल्कि किसी निर्णय, बातचीत या प्रार्थना में?
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Hebrews 6:18 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
इब्रानियों 6:18 का क्या अर्थ है?
इब्रानियों 6:18 किस विषय में है?
इब्रानियों 6:18 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इब्रानियों 6:18 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इब्रानियों 6:18 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Hebrews 6 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मुझे बीच रास्ते में थक जाने से बचा। जो आशा तूने मेरे दिल में रखी है, वह आखिर तक जलती रहे। जब उत्साह ठंडा पड़ने लगे, तब तू खुद मुझे सँभाल और हर दिन वफादारी से चलने की ताकत दे।
एक ही बारिश दोनों खेतों पर पड़ती है। फर्क बारिश में नहीं, उपज में है। "पर यदि वह झाड़ और ऊँटकटारे उगाती है, तो निकम्मी और श्राप के निकट है।" सोच, कितने उपदेश, कितनी प्रार्थनाएँ, कितनी कृपा तुझ पर बरसी है। वह सब भीतर जाकर क्या बन रहा है? कांटे अपने आप उग आते हैं, फल के लिए मन को सौंपना पड़ता है।
पिता, तेरी कृपा मुझ पर बारिश की तरह बार बार बरसती रही है। मुझे ऐसी मिट्टी बना जो उसे सोख ले और कुछ अच्छा उगाए, जो दूसरों के काम आए। मेरा जीवन सूखा और बंजर न रह जाए, बल्कि तेरे हाथों में फल लाए।
बपतिस्मों और हाथ रखने, और मरे हुओं के जी उठने, और अनन्त न्याय" की शिक्षा, ये नींव है। नींव जरूरी है, पर सोचो: कोई बार बार नींव ही डालता रहे और दीवार कभी न उठे, तो घर कहाँ बना? कहीं तुम्हारा विश्वास भी वहीं न रुका हो जहाँ शुरू हुआ था। परमेश्वर तुम्हें उस पर कुछ बनाने को बुला रहा है।
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