यशायाह 23
पाठ
सोर के बारे में यह भारी वचन एक बन्दरगाह के उजड़ जाने की खबर है। तर्शीश से लौटते जहाजों को साइप्रस (कित्तीम) में यह समाचार मिलता है कि जिस नगर में वे माल उतारते थे, वहाँ "न तो कोई घर और न कोई शरण का स्थान है।" सीदोन लज्जित है, मिस्र संकट में है, और पूरा भूमध्यसागरीय व्यापार-तन्त्र हिल जाता है। सत्तर वर्ष सोर भुला दी जाएगी, फिर उठेगी, फिर वही पुराना धन्धा करेगी, परन्तु अन्त में उसकी कमाई "यहोवा के लिये पवित्र की जाएगी।"
मूल बात
सोर कोई सैनिक साम्राज्य नहीं था। उसके पास अश्शूर जैसी रथ-सेना नहीं थी; उसके पास बन्दरगाह, जहाज और अनुबन्ध थे। वह "राजाओं को गद्दी पर बैठाती थी, जिसके व्यापारी हाकिम थे।" यही इस अध्याय का धार्मिक केन्द्र है: परमेश्वर केवल तलवार के घमण्ड का न्याय नहीं करते, वे पूँजी के घमण्ड का भी न्याय करते हैं। पद 8 पूछता है, "उसके विरुद्ध किसने ऐसी युक्ति की है?" और पद 9 उत्तर देता है: "सेनाओं के यहोवा ही ने।" मुद्रा-बाजार में भी एक सिंहासन है, और वह सोर में नहीं है। जो व्यवस्था स्वयं को अनिवार्य समझती है, उसके विषय में परमेश्वर कहते हैं कि वे "समस्त गौरव के घमण्ड को तुच्छ" कर देंगे।
सूत्र
ध्यान दें कि अध्याय न्याय पर समाप्त नहीं होता। सोर की कमाई नष्ट नहीं की जाती, वह पवित्र की जाती है, और उन लोगों के काम आती है "जो यहोवा के सामने रहा करेंगे।" यह बाइबल की एक गहरी रेखा है: परमेश्वर संसार की सम्पत्ति को कूड़े में नहीं फेंकते, वे उसे शुद्ध करके अपनी आराधना में खींच लेते हैं। प्रकाशितवाक्य 17 इसी भाषा में बड़े बाबेल को "वेश्या" कहता है, क्योंकि यूहन्ना यशायाह के इसी चित्र से उधार लेता है; परन्तु प्रकाशितवाक्य के अन्त में जातियों का वैभव नये यरूशलेम में लाया जाता है। मसीह का क्रूस ठीक यही करता है: वह लालच की व्यवस्था को तोड़ता है और लूटे हुए धन को दान में बदल देता है।
दर्पण
हम भी ऐसे ही बन्दरगाह-नगरों में जीते हैं। आपकी नौकरी की सुरक्षा, आपकी बचत, आपके बच्चों का भविष्य, सब किसी न किसी "दृढ़ स्थान" पर टिका है जिसे आपने अपने हाथों से बनाया नहीं, बस भरोसा कर लिया है। सोर के व्यापारी भी यही सोचते थे। और जब वह ढहता है, छँटनी, बीमारी, बाजार का गिरना, तब हमारा विलाप ठीक पद 1 जैसा होता है: हाय, हाय, कोई शरण का स्थान नहीं। यशायाह निर्दयी नहीं है, वह ईमानदार है। वह पूछता है: तुम्हारी प्रसन्नता किस पर टिकी थी?
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प्रश्न
पद 17 खटकता है। सत्तर वर्ष बाद परमेश्वर सोर की "सुधि लेगा", और परिणाम क्या? वह फिर वही छिनाला करेगी, सब राज्यों के साथ। परमेश्वर किसी नगर को पुनर्स्थापित करते हैं, यह जानते हुए कि वह अपने पुराने पाप में लौट जाएगी? यह हमारी साफ-सुथरी योजनाओं में फिट नहीं होता। यशायाह यह नहीं समझाता। वह केवल दिखाता है कि अनुग्रह और न्याय एक ही इतिहास में बुने हुए हैं, और परमेश्वर की धीरज हमारे सुधार-कार्यक्रम से लम्बी है। सम्भवतः यही पाठ है: परमेश्वर उस संसार के साथ काम करते हैं जो वास्तव में है, न कि उस संसार के साथ जो हमें उपदेश में सुविधाजनक लगता। और अन्त में, पद 18 में, वे उसकी कमाई को भी जीत लेते हैं।
मुख्य पात्र
इस अध्याय में सोर बोलती नहीं; बोलते हैं "सेनाओं के यहोवा।" उनका चित्र आश्चर्यजनक है: "उसने अपना हाथ समुद्र पर बढ़ाकर राज्यों को हिला दिया है।" समुद्र वही क्षेत्र था जिस पर सोर का एकाधिकार था, उसके देवता, उसके मार्ग, उसकी कमाई। परमेश्वर ठीक उसी पर हाथ बढ़ाते हैं, जैसे मूसा के समय लाल सागर पर। और उनका उद्देश्य विनाश का आनन्द नहीं, बल्कि "पृथ्वी के प्रतिष्ठितों का अपमान।" यह निर्दयी लगता है, परन्तु यह चिकित्सकीय है: घमण्ड ही वह झूठ है जो मनुष्य को परमेश्वर के बिना जीने योग्य महसूस कराता है। जो परमेश्वर प्रतिष्ठा को गिराते हैं, वही अन्त में भूखों को "भरपूर भोजन और चमकीला वस्त्र" देते हैं।
विवरण
पद 4 में समुद्र बोलता है, और उसकी बात रोंगटे खड़े कर देती है: "मैंने न तो कभी प्रसव की पीड़ा जानी और न बालक को जन्म दिया।" सीदोन की माता, वह "समुद्र का दृढ़ स्थान" जिसे इब्रानी में माओज़ कहा गया है, अर्थात् गढ़ या सहारा, अब स्वयं को निःसन्तान घोषित करती है। कल्पना करें: फिनीशिया का तट, जहाँ हर परिवार का बेटा जहाज पर जाता था, जहाँ बन्दरगाह की भीड़ ही जीवन का सबूत थी। अब वह गोदी खाली है, और समुद्र कहता है कि उसने कभी किसी को जन्म ही नहीं दिया। जहाँ धन सन्तान बन जाता है, वहाँ उसका ढहना बाँझपन जैसा लगता है। यशायाह ने शोक का इससे गहरा शब्द नहीं खोजा।
चिंतन
आपका "दृढ़ स्थान" क्या है, वह चीज़ जिसके ढहने की कल्पना करते ही आपके भीतर पद 1 का विलाप उठता है?
यदि परमेश्वर आपकी कमाई को "पवित्र" करना चाहें, तो इस महीने उसमें व्यावहारिक रूप से क्या बदलेगा?
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तर्शीश को पार हो जाओ; हे समुद्र तट के रहनेवालो, हाय, हाय करो!" सूर के जहाज़ कभी दुनिया भर में धन ढोते थे, पर उस दिन वही जहाज़ भागने का रास्ता बन गए। जिस चीज़ पर तू अपनी सुरक्षा टिकाता है, वह शायद तुझे बचाए नहीं, बस कहीं दूर ले जाए। आज ठहरकर पूछ: मेरा लंगर सचमुच कहाँ डला है?
पिता, जो शहर मुकुट पहने खड़े थे, उनकी शान भी तेरे हाथ में है। मेरा नाम, मेरा काम, मेरी कमाई, सब कुछ कितना छोटा है तेरे सामने। मुझे बचा ले उस घमंड से जो सोचता है कि सब मैंने बनाया। सिखा कि असली ऊँचाई तेरे पास टिके रहने में है।
पिता, समय और राष्ट्र आपके हाथ में हैं, आप ही ठहराते हैं कि कब क्या होगा। मुझे बस यह डर है कि दया पाने के बाद भी मैं पुरानी आदतों की ओर लौट जाऊँ। मेरे मन को थामे रखिए, ताकि आपकी करुणा मुझे बदल दे, केवल राहत देकर न छोड़ दे।
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