बाइबल व्याख्या

1 तीमुथियुस 6:11

बाइबल

पाठ

पौलुस की कलम अचानक मुड़ती है। पैसे के लोभ, फंदों और "विनाश के समुद्र" की बात करते-करते वह सीधे एक व्यक्ति की ओर घूमकर कहता है: "पर हे परमेश्वर के जन, तू इन बातों से भाग; और धार्मिकता, भक्ति, विश्वास, प्रेम, धीरज, और नम्रता का पीछा कर।" एक ही वाक्य में दो विपरीत दौड़ें रखी गई हैं: किसी चीज़ से भागना और किसी चीज़ के पीछे भागना। बीच में कोई तीसरा विकल्प नहीं दिया गया, न रुककर सोचने की जगह, न तटस्थ खड़े रहने की। और जिसे यह कहा जा रहा है, उसे पहले नाम दिया जाता है: परमेश्वर का जन। पहचान पहले, आज्ञा बाद में।

मूल मर्म

यहाँ जो शब्द "पीछा कर" के लिए है, वह यूनानी में दियोको है, वही शब्द जो सताने के लिए भी काम आता है, जैसे शिकारी अपने शिकार का पीछा करता है। यानी धार्मिकता, भक्ति, विश्वास, प्रेम, धीरज और नम्रता ऐसी चीज़ें नहीं हैं जो हमारे पास पहले से हों और जिन्हें हम सजाकर रखें; वे आगे-आगे चलती हैं और हम हाँफते हुए उनके पीछे। यह बात असहज करती है। हम चाहते हैं कि आत्मिक जीवन एक स्थिति हो, प्राप्ति हो, कोई मंज़िल जहाँ पहुँचकर बैठ जाएँ। पौलुस उसे एक अधूरी दौड़ बताता है। फिर भी दौड़ने वाला पहले से "परमेश्वर का जन" है। वह इस नाम को कमाने नहीं दौड़ रहा; वह इस नाम के कारण दौड़ रहा है। अनुग्रह पहले, प्रयास उसके पीछे, कभी उलटा नहीं।

जोड़ने वाला सूत्र

"परमेश्वर का जन" पुराने नियम की गूँज है। मूसा, शमूएल, एलिय्याह, इन्हें इसी नाम से पुकारा जाता था: वे लोग जो सत्ता और धन के बीच खड़े होकर परमेश्वर की बात बोलते थे और इसीलिए अक्सर अकेले पड़ जाते थे। तीमुथियुस को इस कतार में रखा जा रहा है। और कुछ ही वाक्य बाद पौलुस उस एक व्यक्ति की ओर इशारा करता है जिसने "पुन्तियुस पिलातुस के सामने अच्छा अंगीकार किया" (पद 13)। यही छह गुण मसीह के जीवन का नक्शा हैं: धार्मिकता जो झुकी नहीं, नम्रता जो पिलातुस के सामने चुप रही, धीरज जो क्रूस तक चला। तो यह सूची नैतिक आदर्शों का गुलदस्ता नहीं; यह किसी के चेहरे का वर्णन है। हम उन गुणों के पीछे नहीं, उनके पीछे दौड़ते हैं जिनमें वे देह बने।

आईना

यह पद हमारी उस चालाकी को पकड़ता है जिससे हम भागना और पीछा करना, दोनों टाल देते हैं। हम पैसे के लोभ को छोड़ते नहीं, उसे "ज़िम्मेदारी" कहकर संभाल लेते हैं; और भक्ति को खोजते नहीं, उसे रविवार में जमा कर देते हैं। पौलुस भागने को कहता है, बहस करने को नहीं, समझौता करने को नहीं। सोचिए: पिछले महीने आपका मन किस हिसाब में सबसे ज़्यादा उलझा रहा, वेतन में, किसी की तरक्की में, बचत के आँकड़े में? और उन छह शब्दों में से कौन सा आपके जीवन से सबसे दूर खड़ा है, धीरज या नम्रता? यहाँ जल्दी उत्तर देने की ज़रूरत नहीं है; पहले प्रश्न को अपने भीतर ठहरने दें।

आज एक कागज़ पर वे छह शब्द लिखिए, उस एक पर घेरा लगाइए जिससे आप सबसे दूर हैं, और उसे ज़ोर से परमेश्वर के सामने बोलकर कहिए: इसी का पीछा करना मुझे सिखाइए।

मुख्य पात्र

तीमुथियुस इस पत्री में कोई नायक नहीं लगता। वह जवान है, कमज़ोर पेट वाला, शायद डरपोक, और उसे ऐसे लोगों के सामने खड़ा किया गया है जिन्हें "विवाद और शब्दों पर तर्क करने का रोग" है। ऐसे माहौल में सबसे स्वाभाविक बात होती है या तो चुप हो जाना, या उन्हीं की भाषा में लड़ने लगना। पौलुस तीसरा रास्ता देता है: भाग और पीछा कर। यह कायरता नहीं, दिशा है। और ध्यान दीजिए कि तीमुथियुस को पहले उसकी कमज़ोरी नहीं, उसकी पहचान बताई जाती है। परमेश्वर अपने लोगों को उनके प्रदर्शन से नहीं, अपने नाम से पुकारते हैं। जो इस पुकार को सुन लेता है, वही दौड़ने लायक बनता है।

संदर्भ

पत्री का पृष्ठभूमि इफिसुस है, एक समृद्ध बंदरगाह शहर, जहाँ मंडली घरों में इकट्ठी होती थी और उन घरों के मालिक धनी संरक्षक होते थे। रोमी समाज में शिक्षा देना कमाई का ज़रिया था; घूमते-फिरते उपदेशक श्रोताओं से शुल्क और सम्मान बटोरते थे। इसीलिए पौलुस उन लोगों की बात करता है "जो समझते हैं कि भक्ति लाभ का द्वार है" (पद 5)। यह कोई काल्पनिक खतरा नहीं था, यह कारोबार था। तीमुथियुस की स्थिति नाज़ुक थी: उम्र में छोटा, सामाजिक रूप से उन संरक्षकों से नीचे, और फिर भी उन्हें सुधारने के लिए भेजा गया। पद 11 का "पर" इसी तनाव के बीच गिरता है, जैसे शोर के बीच कोई धीमी, दृढ़ आवाज़।

पहली सुननेवाली मंडली

यह पत्री ऊँची आवाज़ में पढ़ी जाती थी, पूरी मंडली के सामने। यानी वे दास भी सुन रहे थे जिनका ज़िक्र पहले पदों में है, और वे धनवान भी जिन्हें पद 17 में चेतावनी मिलती है। जब उन्होंने "हे परमेश्वर के जन" सुना, तो उन्होंने केवल तीमुथियुस के लिए एक उपाधि नहीं सुनी; उन्होंने सुना कि मंडली का अधिकार पैसे से नहीं, बुलाहट से आता है। जिस कमरे में धन ही प्रतिष्ठा तय करता था, वहाँ यह वाक्य चुपचाप सारी कुर्सियाँ बदल देता है। धनी आदमी को कहा जा रहा है: तेरी संपत्ति तुझे आगे नहीं रखती। दास को कहा जा रहा है: तू भी इसी दौड़ में है। क्या हम आज भी यह सुनने को तैयार हैं?

चिंतन

आपके जीवन में कौन सी बात है जिससे परमेश्वर आपको "भागने" को कह रहे हैं, और आप उससे बातचीत करते रहना क्यों पसंद करते हैं?

अगर पहचान ("परमेश्वर का जन") प्रयास से पहले आती है, तो इससे आपकी आत्मिक असफलताओं को देखने का तरीका कैसे बदलेगा?

1 Timothy में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of 1 Timothy and Titus

John Stott

Healthy leaders, healthy churches: Paul's pastoral playbook.

Paul For Everyone: The Pastoral Letters

N.T. Wright

Timothy and Titus in Wright's accessible daily format.

The Pastoral Epistles: An Introduction and Commentary

Donald Guthrie

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

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1 Timothy 6:11 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

1 तीमुथियुस 6:11 का क्या अर्थ है?
पौलुस की कलम अचानक मुड़ती है। पैसे के लोभ, फंदों और "विनाश के समुद्र" की बात करते-करते वह सीधे एक व्यक्ति की ओर घूमकर कहता है: "पर हे परमेश्वर के जन, तू इन बातों से भाग; और धार्मिकता, भक्ति, विश्वास, प्रेम, धीरज, और नम्रता का पीछा कर।" एक ही वाक्य में दो विपरीत दौड़ें रखी गई हैं: किसी चीज़ से भागना और किसी चीज़ के पीछे भागना। बीच में कोई तीसरा विकल्प नहीं दिया गया, न रुककर सोचने की जगह, न तटस्थ खड़े रहने की। और जिसे यह कहा जा रहा है, उसे पहले नाम दिया जाता है: परमेश्वर का जन। पहचान पहले, आज्ञा बाद में।
1 तीमुथियुस 6:11 किस विषय में है?
"परमेश्वर का जन" पुराने नियम की गूँज है। मूसा, शमूएल, एलिय्याह, इन्हें इसी नाम से पुकारा जाता था: वे लोग जो सत्ता और धन के बीच खड़े होकर परमेश्वर की बात बोलते थे और इसीलिए अक्सर अकेले पड़ जाते थे। तीमुथियुस को इस कतार में रखा जा रहा है। और कुछ ही वाक्य बाद पौलुस उस एक व्यक्ति की ओर इशारा करता है जिसने "पुन्तियुस पिलातुस के सामने अच्छा अंगीकार किया" (पद 13)। यही छह गुण मसीह के जीवन का नक्शा हैं: धार्मिकता जो झुकी नहीं, नम्रता जो पिलातुस के सामने चुप रही, धीरज जो क्रूस तक चला। तो यह सूची नैतिक आदर्शों का गुलदस्ता नहीं; यह किसी के चेहरे का वर्णन है। हम उन गुणों के पीछे नहीं, उनके पीछे दौड़ते हैं जिनमें वे देह बने।
1 तीमुथियुस 6:11 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज एक कागज़ पर वे छह शब्द लिखिए, उस एक पर घेरा लगाइए जिससे आप सबसे दूर हैं, और उसे ज़ोर से परमेश्वर के सामने बोलकर कहिए: इसी का पीछा करना मुझे सिखाइए।
1 तीमुथियुस 6:11 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पत्री का पृष्ठभूमि इफिसुस है, एक समृद्ध बंदरगाह शहर, जहाँ मंडली घरों में इकट्ठी होती थी और उन घरों के मालिक धनी संरक्षक होते थे। रोमी समाज में शिक्षा देना कमाई का ज़रिया था; घूमते-फिरते उपदेशक श्रोताओं से शुल्क और सम्मान बटोरते थे। इसीलिए पौलुस उन लोगों की बात करता है "जो समझते हैं कि भक्ति लाभ का द्वार है" (पद 5)। यह कोई काल्पनिक खतरा नहीं था, यह कारोबार था। तीमुथियुस की स्थिति नाज़ुक थी: उम्र में छोटा, सामाजिक रूप से उन संरक्षकों से नीचे, और फिर भी उन्हें सुधारने के लिए भेजा गया। पद 11 का "पर" इसी तनाव के बीच गिरता है, जैसे शोर के बीच कोई धीमी, दृढ़ आवाज़।
1 तीमुथियुस 6:11 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके जीवन में कौन सी बात है जिससे परमेश्वर आपको "भागने" को कह रहे हैं, और आप उससे बातचीत करते रहना क्यों पसंद करते हैं?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

1 Timothy 6 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 4

पिता, धन्यवाद कि आपने हमें शब्दों पर बहस करने के उस रोग से सचेत किया, जिससे डाह, झगड़े और बुरे संदेह पैदा होते हैं। धन्यवाद कि आपके मसीह के खरे वचन हमें घमंड से बचाकर नम्रता और शांति में थामे रखते हैं।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 1

धन्यवाद, प्रभु, कि मेरी मेहनत की सबसे छोटी जगह भी तेरे नाम की गवाही बन सकती है। जिनके अधीन मुझे काम करना है, उन्हें आदर देने की शक्ति तू देता है, ताकि तेरे नाम और उपदेश की निन्दा न हो। मेरा हर दिन तेरी नज़र में कीमती है।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 5

पिता, धन्यवाद कि आपने हमें सत्य से विहीन नहीं छोड़ा, बल्कि अपने वचन में स्थिर रखा है। धन्यवाद कि भक्ति हमारे लिए कमाई का द्वार नहीं, बल्कि आपके साथ जीने का आनंद है। व्यर्थ के रगड़े झगड़ों से हमारा मन बचाइए और शुद्ध बुद्धि दीजिए।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 18

पिता, मेरे हाथ जो थामे बैठे हैं उसे खोलना सिखा। मुझे पैसों में नहीं, भलाई में अमीर बना दे। जब किसी की ज़रूरत मेरे सामने आए, तो मैं हिसाब लगाने की जगह बाँटने को तैयार रहूँ। तेरी उदारता ही मेरा नाप बने।

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