यशायाह 5
पाठ
गीत की तरह शुरू होता है, मानो किसी शादी में गाया जा रहा हो: "अब मैं अपने प्रिय के लिये और उसकी दाख की बारी के विषय में गीत गाऊँगा।" एक उपजाऊ टीला, खोदी हुई मिट्टी, चुने हुए पत्थर, उत्तम जाति की दाखलता, बीच में गुम्मट, दाखरस के लिये कुण्ड। सब कुछ तैयार। और फिर एक ही वाक्य में गीत टूट जाता है: "उसमें निकम्मी दाखें ही लगीं।" गायक अचानक वादी बन जाता है और सुननेवालों से ही फैसला माँगता है, फिर बताता है कि बाड़ा उखाड़ा जाएगा, दीवार ढाई जाएगी, मेघों को बरसने से मना कर दिया जाएगा। पद 7 में परदा गिरता है: बारी इस्राएल है। इसके बाद छह "हाय" गूँजते हैं, ज़मीन हड़पनेवालों पर, सुबह से पीनेवालों पर, बुरे को भला कहनेवालों पर, घूस लेनेवालों पर। और अंत में दूर देश से एक झुण्ड सीटी की आवाज़ पर आता है, और आँख जहाँ तक देखे, "अंधकार और संकट" ही है।
मूल बात
यह अध्याय परमेश्वर के क्रोध से पहले परमेश्वर की निराशा दिखाता है, और यही इसका सबसे चुभनेवाला हिस्सा है। पद 4 का प्रश्न किसी न्यायाधीश का नहीं, एक माली का प्रश्न है जिसने अपना सब कुछ लगा दिया: "मेरी दाख की बारी के लिये और क्या करना रह गया जो मैंने उसके लिये न किया हो?" ध्यान दीजिए कि क्रम क्या है। पहले अनुग्रह, फिर अपेक्षा, फिर न्याय। परमेश्वर पहले माँगते नहीं, पहले देते हैं। इसलिए यहाँ न्याय मनमानी नहीं, बल्कि प्रेम का ही दूसरा चेहरा है; जो प्रेम कुछ अपेक्षा ही न करे वह उदासीनता है। पद 16 इस पूरे अध्याय की धुरी है: "सेनाओं का यहोवा न्याय करने के कारण महान ठहरता, और पवित्र परमेश्वर धर्मी होने के कारण पवित्र ठहरता है।" परमेश्वर की पवित्रता कोई दूर की चमक नहीं; वह इतिहास में, टूटी दीवारों और खाली घरों में दिखाई देती है। और फिर भी एक प्रश्न बिना उत्तर के रह जाता है: अच्छी मिट्टी, अच्छी लता, और फल निकम्मा। पाठ इसका कारण नहीं बताता। वह बस दिखाता है कि ऐसा हुआ, और हमें उस मौन के सामने खड़ा छोड़ देता है।
बड़ा सूत्र
यह गीत खत्म नहीं हुआ। सदियों बाद एक और गायक यरूशलेम में खड़ा होकर वही कहानी दोहराता है, बस अंत बदलकर: यीशु दाख की बारी और उसके किसानों का दृष्टान्त सुनाते हैं, जहाँ मालिक अंत में अपने पुत्र को भेजता है और वह बारी के बाहर मारा जाता है। यशायाह ने कहा था कि बाड़ा उखाड़ा जाएगा और बारी रौंदी जाएगी; गुलगुता पर वह टूटी दीवार से बाहर खड़ा हुआ प्रिय पुत्र है जो रौंदा जाता है। और वही यीशु बाद में कहते हैं कि वे स्वयं सच्ची दाखलता हैं, यानी वह लता जिससे आखिरकार असली फल निकलता है। यह कोई चालाक रूपक नहीं, यही पूरी कहानी का जोड़ है: जो फल इस्राएल न दे सका, वह परमेश्वर ने स्वयं आकर उगाया। पद 25 का वह डरावना वाक्य, "उसका हाथ अब तक बढ़ा हुआ है", क्रूस पर एक दूसरे ही अर्थ में सच होता है, बढ़ा हुआ हाथ जो मारने नहीं, थामने के लिए फैला है।
दर्पण
पद 20 सबसे नज़दीक से चुभता है, क्योंकि वहाँ पाप का नाम नहीं बदला जाता, पाप के नाम बदले जाते हैं: "जो बुरे को भला और भले को बुरा कहते।" दफ्तर की वह चुप्पी जिसे आप "समझदारी" कहते हैं। घर की वह कड़वाहट जिसे आप "साफ़ बोलना" कहते हैं। खाते की वह गड़बड़ी जिसे आप "सबका यही तरीका है" कहते हैं। और पद 8 की वह अकेली, बड़ी होती जायदाद, जहाँ आदमी घर से घर, खेत से खेत जोड़ता जाता है और अंत में "देश के बीच अकेले रह" जाता है; कितनी सफलताएँ ठीक इसी तरह खत्म होती हैं, कमरे बड़े और मेज़ खाली। पद 12 कहता है कि संगीत और दाखमधु तो था, पर "वे यहोवा के कार्य की ओर दृष्टि नहीं करते"; व्यस्तता अंधेपन का सबसे भद्र रूप है।
आज ही एक कागज़ पर एक वाक्य लिखिए: वह एक बात जिसे आपने कोई सभ्य नाम दे रखा है, और उसके आगे कोष्ठक में उसका असली नाम लिखिए। फिर वह कागज़ फाड़ने से पहले परमेश्वर के सामने ज़ोर से पढ़िए।
अंतर्पाठ
भजन 80 में इस्राएल यही चित्र लेकर रोता है: मिस्र से लाई गई एक दाखलता, जिसकी बाड़ अब तोड़ दी गई है, और भजनकार पूछता है, ऐसा क्यों हुआ। यशायाह 5 उसी प्रश्न का उत्तर है, और उत्तर कोमल नहीं: दीवार अपने आप नहीं गिरी, मालिक ने गिराई। दूसरी ओर मत्ती 21 का दृष्टान्त इसी गीत को उठाकर आगे बढ़ाता है, और वहाँ बारी दूसरों को सौंप दी जाती है, ताकि फल मिले। दोनों को साथ रखिए तो एक बात साफ़ होती है: परमेश्वर बारी को छोड़ते नहीं, बदलते हैं। नाश अंतिम शब्द नहीं है, पर वह सचमुच का नाश है; यशायाह हमें सस्ती तसल्ली नहीं देता, अध्याय अंधकार पर ही खत्म होता है।
पहले सुननेवाले
आठवीं सदी ईसा पूर्व का यहूदा समृद्ध था। व्यापार चल रहा था, मंदिर में बलिदान हो रहे थे, और ज़मीनें धीरे-धीरे कुछ ही परिवारों के हाथ में सिमट रही थीं, क्योंकि कर्ज़ में डूबा किसान अपना खेत बेचता था और फिर उसी खेत पर मज़दूर बनकर काम करता था। शायद यह गीत दाख तोड़ने के उत्सव में गाया गया, जब भीड़ प्रेमगीत की उम्मीद कर रही थी। पहले पदों पर वे मुस्कुराए होंगे। फिर पद 3 में उनसे ही फैसला माँगा गया, और वे नातान के सामने खड़े दाऊद बन गए, अपने ही मुकदमे के जज। और छह बार गूँजता "हाय" उनके कानों में गीत नहीं, अंतिम संस्कार पर होनेवाला विलाप था। दूर उत्तर में अश्शूर की सेनाएँ पहले से हिल रही थीं; पद 26 की सीटी काल्पनिक नहीं थी।
एक बारीकी
पद 7 में दो जोड़े शब्द हैं जो हिन्दी में अर्थ तो देते हैं, पर उनकी चोट छिप जाती है। इब्रानी में "धार्मिकता" (त्सदाकाह) की जगह जो निकला वह है त्सआकाह, यानी "चिल्लाहट"; दो शब्द जो सुनने में लगभग एक जैसे हैं, अर्थ में एक-दूसरे के उलट। और यह कोई भी चिल्लाहट नहीं। यही शब्द तब गूँजा था जब इस्राएल मिस्र में ईंटें बनाते हुए चिल्लाया और परमेश्वर ने सुना। अब वही आवाज़ इस्राएल की अपनी बारी से उठ रही है, कुचले हुए मज़दूर की, बिकी हुई ज़मीन की, अदालत में हारे हुए निर्दोष की। जो लोग उस चीख से छुड़ाए गए थे, वे अब उसे पैदा कर रहे हैं। परमेश्वर मीठी दाख ढूँढ़ने झुके, और उन्हें खून की गंध मिली। इसीलिए यह अध्याय ठंडा नहीं है; परमेश्वर का क्रोध उसी कान से उठता है जिसने कभी दासों की पुकार सुनी थी।
चिंतन के प्रश्न
पद 4 का प्रश्न आज मुझसे पूछा जाए, "और क्या करना रह गया जो मैंने न किया हो", तो मैं ईमानदारी से क्या उत्तर दूँगा?
मेरे जीवन में या मेरे आसपास कौन सी "चिल्लाहट" है जिसे मैंने सुनना बंद कर दिया है, क्योंकि उसे सुनना मुझे महँगा पड़ेगा?
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Isaiah 5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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यशायाह 5 का क्या अर्थ है?
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यशायाह 5 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
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Isaiah 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, तूने हमें अपने बगीचे की तरह लगाया और हमसे अच्छे फल की आशा की। हमें माफ कर कि हमारे बीच अक्सर न्याय की जगह चोट और दर्द की पुकार सुनाई देती है। हमारे दिलों को बदल दे, ताकि हमारे काम तेरी नेकी का स्वाद दें।
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