यशायाह 61
पाठ
एक व्यक्ति खड़ा होकर कहता है कि प्रभु का आत्मा उस पर है और यहोवा ने उसे अभिषिक्त किया है, ताकि वह टूटे हुए मन वालों को शान्ति दे, बन्दियों को स्वतंत्रता की और कैदियों को छुटकारे की घोषणा करे, और यहोवा के प्रसन्न रहने के वर्ष के साथ-साथ परमेश्वर के पलटा लेने के दिन का भी प्रचार करे। विलाप करने वालों के सिर की राख हटाकर सुन्दर पगड़ी बाँधी जाएगी, उदासी की जगह यश का ओढ़ना मिलेगा, और वे "धार्मिकता के बांज वृक्ष" कहलाएँगे। फिर ये ही लोग पीढ़ियों से उजड़े खण्डहरों को दोबारा बसाएँगे, याजक कहलाएँगे, अनादर के बदले दूना भाग पाएँगे, और अन्त में अध्याय एक गीत में बदल जाता है: उद्धार के वस्त्र, धार्मिकता की चद्दर, और एक धरती जो अपनी उपज की तरह परमेश्वर की धार्मिकता उगाती है।
मर्म
यहाँ परमेश्वर का चरित्र दो वाक्यों में खुलकर सामने आता है: "मैं यहोवा न्याय से प्रीति रखता हूँ, मैं अन्याय और डकैती से घृणा करता हूँ।" यह केवल भावना नहीं, यह कार्यक्रम है। अभिषिक्त जन की सेवा इसी स्वभाव से निकलती है, इसलिए सुसमाचार यहाँ कोई अन्दरूनी, निजी सान्त्वना नहीं है; वह जेल के दरवाज़े, कर्ज़ की बही और उजड़े मुहल्लों तक पहुँचता है। ध्यान दीजिए कि उद्धार पाए हुए लोग अन्त में उपभोक्ता नहीं रहते, वे बसाने वाले बन जाते हैं और "याजक" कहलाते हैं, यानी वे दूसरों और परमेश्वर के बीच खड़े होते हैं। कृपा मुफ़्त है, पर निष्क्रिय नहीं; वह राख हटाकर सिर उठाती है और फिर उन हाथों को काम सौंप देती है। और यह सब "यहोवा के लगाए हुए" होने से होता है, अपनी मेहनत से नहीं।
सूत्र
नासरत की सभा में यीशु ने यही पन्ना खोला और पढ़ा, पर उन्होंने बीच वाक्य में पुस्तक बन्द कर दी। "यहोवा के प्रसन्न रहने के वर्ष" तक पढ़कर वे रुक गए; "पलटा लेने के दिन" को उन्होंने उस दिन नहीं पढ़ा। यह लापरवाही नहीं थी, यह समय की घोषणा थी: कृपा का वर्ष अभी खुला है, हिसाब का दिन अभी बाकी है। इसका मतलब यह नहीं कि न्याय रद्द हो गया, बल्कि यह कि परमेश्वर ने उसे टाल रखा है ताकि अधिक लोग भीतर आ सकें। और जो अभिषेक यशायाह के इस अनाम सेवक पर था, वह मसीह में अपनी पूर्णता पाकर फिर उनके लोगों पर उतर आता है। पिन्तेकुस्त के बाद यह वचन किसी एक व्यक्ति का परिचय-पत्र नहीं, कलीसिया का कार्य-विवरण बन जाता है।
दर्पण
ध्यान दीजिए कि परमेश्वर जिस चीज़ से घृणा करते हैं उसका नाम "डकैती" है, और डकैती हमेशा नकाब पहनकर नहीं आती। वह उस ठेके में बैठी हो सकती है जिसमें आपने मज़दूर की दिहाड़ी दबा ली, उस चुप्पी में जिससे आपने दफ़्तर में किसी और का श्रेय अपने नाम होने दिया, उस किराएदार के साथ जिसका जमा पैसा आपने लौटाने में देर की। यह अध्याय हमें यह भी पूछने पर मजबूर करता है कि हमारे आसपास राख में कौन बैठा है, और क्या हमने उसे पगड़ी बाँधने के बजाय दूर से सहानुभूति भेजकर अपना फ़र्ज़ पूरा मान लिया। कृपा हमें बसाने वाला बनाती है, दर्शक नहीं। आज ही एक ऐसे व्यक्ति को, जो शोक या शर्म में डूबा है, संदेश भेजिए और उसमें साफ़ शब्दों में एक बात लिखिए जो उसके बारे में आदरणीय है। दया नहीं, यश।
अन्तर्पाठ
"यहोवा के प्रसन्न रहने का वर्ष" हवा में नहीं कहा गया; लैव्यव्यवस्था 25 में जुबली का वर्ष कर्ज़ माफ़ करता था, बिके हुए खेत लौटाता था, दास को घर भेजता था। यशायाह उस कानूनी प्रावधान को उठाकर उसे परमेश्वर के अन्तिम काम का नाम बना देता है, और इससे पता चलता है कि उद्धार की भाषा मूलतः आर्थिक और सामाजिक भी है, केवल आन्तरिक नहीं। दूसरी ओर, "तुम यहोवा के याजक कहलाओगे" को पतरस अपनी पहली पत्री में सीधे कलीसिया पर लागू करता है। यानी वह पद, जो इस्राएल में कुछ ही घरानों का था, अब हर विश्वासी का बुलावा है: आपके पड़ोसी के लिए आप ही सबसे नज़दीकी याजक हैं।
प्रश्न
फिर वह "पलटा लेने का दिन" क्यों? सान्त्वना के बीचोंबीच बदला रखना हमें असहज करता है, और करना भी चाहिए। पर सोचिए कि यह वचन किनसे कहा गया: उन लोगों से जिनके नगर पीढ़ियों से खण्डहर पड़े थे, जिनका अनादर किसी ने कराया था। यदि परमेश्वर उन अपराधियों के बारे में कुछ न करें, तो उनकी "शान्ति" झूठी होगी। न्याय से प्रीति और अन्याय से घृणा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं; जो प्रेम अन्याय पर नाराज़ नहीं होता वह प्रेम नहीं, उदासीनता है। यह उत्तर असहजता को पूरी तरह नहीं मिटाता, और शायद मिटाना भी नहीं चाहिए। हमें बदला सौंपा नहीं गया है, केवल कृपा के वर्ष का प्रचार सौंपा गया है। वह दिन परमेश्वर के हाथ में है, और वहीं सुरक्षित है।
बारीकी
"धार्मिकता के बांज वृक्ष" पर ज़रा ठहरिए। बांज फ़सल नहीं है; वह एक मौसम में नहीं उगता। उसे दशकों लगते हैं, और उसकी जड़ें उतनी ही गहरी जाती हैं जितनी शाखाएँ फैलती हैं। जो लोग अभी-अभी राख में बैठे थे, उन्हें परमेश्वर काई नहीं, बांज कहते हैं: धीमे, टिकाऊ, और इतने ठोस कि उनकी छाया में दूसरे बैठ सकें। साथ ही वे "यहोवा के लगाए हुए" हैं, यानी उनका बीज उन्होंने स्वयं नहीं बोया। यह दोनों बातें एक साथ सच हैं, और यही इस अध्याय की नैतिकता की जड़ है: आपका टिकाऊपन आपका श्रेय नहीं, पर आपकी छाया आपकी ज़िम्मेदारी है।
चिंतन
आपकी कमाई या सुविधा का कौन सा हिस्सा किसी और के नुकसान पर टिका है, और आप इस सप्ताह उसकी कितनी जाँच करने को तैयार हैं?
यदि आप "यहोवा के लगाए हुए" बांज हैं, तो इस समय आपकी छाया में कौन बैठ रहा है, और कौन बैठ सकता था पर नहीं बैठ रहा?
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