बाइबल व्याख्या

अय्यूब 15

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

राख के ढेर पर बैठे अय्यूब के शब्द अभी हवा में तैर ही रहे हैं कि एलीपज फिर बोल उठता है, और इस बार उसकी आवाज़ में पहले की वह नरमी नहीं है। वह अय्यूब पर आरोप लगाता है कि उसकी बातें "पूर्वी पवन" की तरह खोखली हैं, कि वह स्वयं परमेश्वर का भय छोड़ बैठा है, और कि उसका अपना मुँह ही उसके विरुद्ध गवाही दे रहा है। फिर वह पुरखों की बुद्धि का हवाला देकर एक लंबा, चित्रमय वर्णन खींचता है: दुष्ट मनुष्य का जीवन कैसे भीतर से डर से खोखला होता है, उसकी समृद्धि कैसे समय से पहले झड़ जाती है, और उसका तम्बू कैसे आग में जल जाता है।

हृदय

एलीपज की दूसरी बहस में एक सच्चाई है जिसे हम आसानी से नकार नहीं सकते: "मनुष्य है क्या कि वह निष्कलंक हो? और जो स्त्री से उत्पन्न हुआ वह है क्या कि निर्दोष हो सके?" यह वाक्य धर्मशास्त्रीय रूप से खरा है। परमेश्वर के सामने कोई भी अपनी शुद्धता का दावा नहीं कर सकता; "स्वर्ग भी उसकी दृष्टि में निर्मल नहीं है।" समस्या सत्य में नहीं, सत्य के इस्तेमाल में है। एलीपज सही सिद्धांत को एक टूटे हुए आदमी के सिर पर पत्थर की तरह गिराता है। यहीं यह अध्याय हमें सिखाता है कि धर्मशास्त्र हथियार भी बन सकता है। परमेश्वर के बारे में सही बोलना और परमेश्वर के लिए सही बोलना दो अलग बातें हैं, और अय्यूब की पुस्तक अंत में ठीक इसी अंतर पर एलीपज को दोषी ठहराती है।

सूत्र

एलीपज का तर्क एक बंद व्यवस्था है: दुष्ट भुगतता है, इसलिए जो भुगत रहा है वह दुष्ट है। इस व्यवस्था में निर्दोष पीड़ा के लिए कोई जगह नहीं। और ठीक यही वह जगह है जहाँ पूरे पवित्रशास्त्र की कहानी दरार डालती है। गतसमनी से गुलगुता तक एक ऐसा व्यक्ति चलता है जिस पर "डरावना शब्द" गूँजता है, जिसे "अंधकार का दिन" घेर लेता है, और जिसके ऊपर खड़े लोग एलीपज की ही भाषा बोलते हैं: यदि परमेश्वर का प्रिय है तो बचा क्यों नहीं लिया जाता। मसीह का क्रूस एलीपज के समीकरण को तोड़ देता है। वहाँ सबसे निर्दोष सबसे अधिक पीड़ित है। और अय्यूब की वह चीख, जिसे उसके मित्र "व्यर्थ बातें" कहते हैं, क्रूस पर उठी "मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया" की पूर्वछाया बन जाती है।

दर्पण

हम में से अधिकांश एलीपज बनना नहीं चाहते, पर बन जाते हैं। जब दफ़्तर का कोई सहकर्मी नौकरी खो देता है, तो भीतर कहीं यह राहत उठती है कि शायद उसने कुछ गलत किया होगा, और हम सुरक्षित हैं। जब किसी रिश्तेदार का विवाह टूटता है, तो हम कारण ढूँढ़ते हैं, क्योंकि कारण मिल जाए तो अपने घर की दीवारें मज़बूत लगने लगती हैं। एलीपज डरा हुआ आदमी है जो दूसरे के दुख को समझाकर अपने डर को शांत कर रहा है। उसके वाक्य, "हम लोगों में तो पक्के बाल वाले और अति पुरनिये मनुष्य हैं," अनुभव की नहीं, असुरक्षा की आवाज़ हैं। आज ही किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके दुख की आपने कभी मन में व्याख्या की थी, एक संदेश भेजिए जिसमें कोई सलाह न हो, केवल यह कि आप उसे याद कर रहे हैं।

संदर्भ

दृश्य वही है जो दूसरे अध्याय से चला आ रहा है: शहर के बाहर राख का ढेर, एक समय का सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति फोड़ों से भरा बैठा है, और तीन मित्र जो सात दिन चुप रहने के बाद अब चुप नहीं रह पा रहे। यह प्राचीन पूर्व की वाद-विवाद परंपरा है, जहाँ बुद्धि उम्र और पुरखों की परंपरा से तौली जाती थी। इसलिए एलीपज अपने तर्क को वंश-परंपरा से जोड़ता है: "वे ही बातें जो बुद्धिमानों ने अपने पुरखाओं से सुनकर बिना छिपाए बताया है।" यह कोई निजी राय नहीं, यह सामूहिक अधिकार है। और उस संस्कृति में सामूहिक अधिकार के विरुद्ध खड़ा अकेला आदमी स्वतः संदिग्ध था। अय्यूब न केवल अपने दुख से, बल्कि अपने समाज की पूरी ज्ञान-परंपरा से अकेले लड़ रहा है।

पहचान

पहले पाठक वे इस्राएली थे जो स्वयं व्यवस्था के इस सरल गणित में पले थे: आज्ञा मानो तो आशीष, तोड़ो तो शाप। एलीपज के शब्द उनके कानों में अजनबी नहीं, जाने-पहचाने लगते थे; बहुत कुछ ऐसा जो वे स्वयं सभा में सुनते आए थे। यही इस अध्याय की धार है। वे अपनी ही धर्मपरंपरा को एक निर्दोष आदमी के विरुद्ध हथियार बनते देख रहे हैं, और उन्हें असहज होना पड़ रहा है। जब एलीपज कहता है, "केवल उन्हीं को देश दिया गया था," तो वह चुने जाने के उसी गर्व को छूता है जो निर्वासन के बाद इस्राएल की सबसे बड़ी परीक्षा थी। पाठक को तय करना है: क्या वह अय्यूब के साथ खड़ा होगा, या उस भीड़ के साथ जिसके पास सब उत्तर हैं?

प्रश्न

फिर सवाल बचता है: एलीपज की बातें गलत कहाँ हैं? उसका हर वाक्य बाइबल के किसी न किसी पन्ने से मेल खाता है। मनुष्य अशुद्ध है, यह सच है। दुष्टता अंततः नष्ट होती है, यह भी सच है। तो क्या सत्य, गलत समय पर बोला जाए, तो झूठ बन जाता है? पुस्तक का अंत इसका सीधा उत्तर नहीं देता; वह केवल कहती है कि एलीपज ने परमेश्वर के विषय में ठीक बात नहीं कही। शायद यही मानना पड़ेगा कि परमेश्वर की सच्चाई कोई सूत्र नहीं जिसे किसी भी घाव पर चिपका दिया जाए, बल्कि एक जीवित वास्तविकता जिसे पीड़ित के पास बैठकर, धीमी आवाज़ में, और कभी-कभी बिल्कुल चुपचाप कहना होता है।

चिंतन

किसके दुख को मैंने मन ही मन समझा लिया है, ताकि मुझे उसके पास बैठना न पड़े?

मेरे पास जो सही धर्मशास्त्रीय उत्तर हैं, क्या वे मुझे लोगों के करीब ले जाते हैं या उनसे दूर?

Job में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Job: The Wisdom of the Cross

Christopher Ash

The most pastoral full length walk through suffering and the God who answers.

The Message of Job

David Atkinson

A compact companion for the hardest questions Job raises.

Job: An Introduction and Commentary

Francis Andersen

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Job

John Walton

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Job 15 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

अय्यूब 15 का क्या अर्थ है?
राख के ढेर पर बैठे अय्यूब के शब्द अभी हवा में तैर ही रहे हैं कि एलीपज फिर बोल उठता है, और इस बार उसकी आवाज़ में पहले की वह नरमी नहीं है। वह अय्यूब पर आरोप लगाता है कि उसकी बातें "पूर्वी पवन" की तरह खोखली हैं, कि वह स्वयं परमेश्वर का भय छोड़ बैठा है, और कि उसका अपना मुँह ही उसके विरुद्ध गवाही दे रहा है। फिर वह पुरखों की बुद्धि का हवाला देकर एक लंबा, चित्रमय वर्णन खींचता है: दुष्ट मनुष्य का जीवन कैसे भीतर से डर से खोखला होता है, उसकी समृद्धि कैसे समय से पहले झड़ जाती है, और उसका तम्बू कैसे आग में जल जाता है।
अय्यूब 15 किस विषय में है?
एलीपज का तर्क एक बंद व्यवस्था है: दुष्ट भुगतता है, इसलिए जो भुगत रहा है वह दुष्ट है। इस व्यवस्था में निर्दोष पीड़ा के लिए कोई जगह नहीं। और ठीक यही वह जगह है जहाँ पूरे पवित्रशास्त्र की कहानी दरार डालती है। गतसमनी से गुलगुता तक एक ऐसा व्यक्ति चलता है जिस पर "डरावना शब्द" गूँजता है, जिसे "अंधकार का दिन" घेर लेता है, और जिसके ऊपर खड़े लोग एलीपज की ही भाषा बोलते हैं: यदि परमेश्वर का प्रिय है तो बचा क्यों नहीं लिया जाता। मसीह का क्रूस एलीपज के समीकरण को तोड़ देता है। वहाँ सबसे निर्दोष सबसे अधिक पीड़ित है। और अय्यूब की वह चीख, जिसे उसके मित्र "व्यर्थ बातें" कहते हैं, क्रूस पर उठी "मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया" की पूर्वछाया बन जाती है।
अय्यूब 15 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
दृश्य वही है जो दूसरे अध्याय से चला आ रहा है: शहर के बाहर राख का ढेर, एक समय का सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति फोड़ों से भरा बैठा है, और तीन मित्र जो सात दिन चुप रहने के बाद अब चुप नहीं रह पा रहे। यह प्राचीन पूर्व की वाद-विवाद परंपरा है, जहाँ बुद्धि उम्र और पुरखों की परंपरा से तौली जाती थी। इसलिए एलीपज अपने तर्क को वंश-परंपरा से जोड़ता है: "वे ही बातें जो बुद्धिमानों ने अपने पुरखाओं से सुनकर बिना छिपाए बताया है।" यह कोई निजी राय नहीं, यह सामूहिक अधिकार है। और उस संस्कृति में सामूहिक अधिकार के विरुद्ध खड़ा अकेला आदमी स्वतः संदिग्ध था। अय्यूब न केवल अपने दुख से, बल्कि अपने समाज की पूरी ज्ञान-परंपरा से अकेले लड़ रहा है।
अय्यूब 15 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
फिर सवाल बचता है: एलीपज की बातें गलत कहाँ हैं? उसका हर वाक्य बाइबल के किसी न किसी पन्ने से मेल खाता है। मनुष्य अशुद्ध है, यह सच है। दुष्टता अंततः नष्ट होती है, यह भी सच है। तो क्या सत्य, गलत समय पर बोला जाए, तो झूठ बन जाता है? पुस्तक का अंत इसका सीधा उत्तर नहीं देता; वह केवल कहती है कि एलीपज ने परमेश्वर के विषय में ठीक बात नहीं कही। शायद यही मानना पड़ेगा कि परमेश्वर की सच्चाई कोई सूत्र नहीं जिसे किसी भी घाव पर चिपका दिया जाए, बल्कि एक जीवित वास्तविकता जिसे पीड़ित के पास बैठकर, धीमी आवाज़ में, और कभी-कभी बिल्कुल चुपचाप कहना होता है।
अय्यूब 15 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
मेरे पास जो सही धर्मशास्त्रीय उत्तर हैं, क्या वे मुझे लोगों के करीब ले जाते हैं या उनसे दूर?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Job 15 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

एलीपज पूछता है, "तेरा मन तुझे क्यों खींच ले जाता है? और तू आँखें क्यों मटकाता है?" पर यह सवाल नहीं, आरोप है। वह उत्तर सुनने के लिए नहीं रुकता। अय्यूब का मन सचमुच खिंच रहा था, दर्द से, राख पर बैठे एक पिता के टूटे दिल से। किसी दुखी व्यक्ति से "तू ऐसा क्यों कर रहा है" पूछने से पहले सोच, क्या तू सचमुच उसका उत्तर सुनना चाहता है?

धन्यवाद संपादकीय पर पद 22

पिता, एलीपज कहता है कि दुष्ट को "अन्धियारे से फिर निकलने की कुछ आशा नहीं होती," पर आपने मुझे उस अंधकार में नहीं छोड़ा। आपने मुझे अपनी ज्योति में बुला लिया, और अब भय की तलवार नहीं, आपकी छाया मेरे साथ चलती है। इस जीवित आशा के लिए धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 1

पिता, धन्यवाद कि जब तेमानी एलीपज ने उत्तर देकर कहा, तब भी आपने अय्यूब को अकेला नहीं छोड़ा। धन्यवाद कि लोगों के कठोर शब्द आपका अंतिम फैसला नहीं हैं। आप हमारी बात पूरी सुनते हैं, हमारा मन पढ़ते हैं, और सही समय पर स्वयं उत्तर देते हैं।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 15

एलीपज कहता है, "देख, वह अपने पवित्र लोगों पर भी विश्वास नहीं करता, और स्वर्ग भी उसकी दृष्टि में निर्मल नहीं।" बात सच है, पर कही गलत समय पर, एक टूटे हुए आदमी को और नीचे गिराने के लिए। सच्चाई जब प्रेम के बिना बोली जाए तो वह पत्थर बन जाती है। आज किसी दुखी व्यक्ति से बात करते समय पूछ ले: मैं सही साबित होना चाहता हूँ, या उसे थामना चाहता हूँ?

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