अय्यूब 42:2
पाठ
राख के ढेर पर बैठा वह आदमी, जिसके शरीर पर फोड़े हैं और जिसके मुँह से हफ्तों तक शिकायत और सवाल निकलते रहे, अब अपनी भाषा बदल देता है। तूफान में से आई परमेश्वर की लंबी पूछताछ के बाद अय्यूब कहता है: "मैं जानता हूँ कि तू सब कुछ कर सकता है, और तेरी युक्तियों में से कोई रुक नहीं सकती।" यह हार मानना नहीं, पहचान लेना है। जिस परमेश्वर के बारे में उसने इतना कुछ कहा था, उसी के सामने अब वह खड़ा है और मानता है कि उनकी सोची हुई योजना को कोई रोक नहीं सकता।
मर्म
इब्रानी शब्द यहाँ मज़िम्माह है, यानी सोच-विचार कर बनाई गई योजना, कोई आकस्मिक इच्छा नहीं। अय्यूब यह नहीं कह रहा कि परमेश्वर ताकतवर हैं इसलिए बहस बेकार है। वह कह रहा है कि परमेश्वर के पास एक इरादा है, और वह इरादा अधूरा नहीं रह सकता। यह अंतर बहुत बड़ा है। एक निरी शक्ति के सामने इंसान सिर्फ चुप होता है; एक बुद्धिमान इरादे के सामने इंसान भरोसा कर सकता है। अय्यूब को अब भी नहीं बताया गया कि उसके बच्चे क्यों मरे। उसे कुछ और मिला: वह निश्चय कि ब्रह्मांड के केंद्र में अंधी ताकत नहीं, बल्कि एक सोचने वाला मन बैठा है।
बड़ी कहानी का सूत्र
पुराने नियम में परमेश्वर की "युक्ति" बार-बार वहीं दिखती है जहाँ इंसानी योजनाएँ टूट चुकी होती हैं। यशायाह 14:27 कहता है कि सेनाओं के यहोवा ने जो ठाना है उसे कौन टाल सकता है, और यह बात तब कही गई जब साम्राज्य अपनी ताकत पर इतरा रहे थे। अय्यूब यही सच अपनी राख पर बैठकर कहता है, साम्राज्य के मंच पर नहीं। और यहीं से एक रेखा आगे जाती है: गतसमनी के बाग में एक और धर्मी जन घुटनों पर पड़ा रहा, जिसने पूछा भी और फिर पिता की इच्छा को सौंप भी दिया। अय्यूब की यह स्वीकृति उस समर्पण की आहट है, जहाँ निर्दोष दुःख और परमेश्वर का अटल उद्देश्य एक ही बिंदु पर मिलते हैं।
दर्पण
हममें से ज़्यादातर लोग परमेश्वर की सर्वशक्ति पर सैद्धांतिक रूप से विश्वास करते हैं और व्यवहार में उनकी योजना को अपनी योजना का सहायक मानते हैं। हम प्रार्थना करते हैं कि नौकरी बनी रहे, रिपोर्ट नॉर्मल आए, बेटा फिर से बात करने लगे, और भीतर ही भीतर यह मान बैठते हैं कि अगर परमेश्वर भले हैं तो उनका इरादा वही होगा जो हमारा है। अय्यूब का वाक्य इस सौदे को तोड़ देता है। उनकी युक्ति रुकती नहीं, पर वह हमेशा हमारी युक्ति के साँचे में भी नहीं ढलती। यह डरावना है और मुक्तिदायक भी, क्योंकि इसका मतलब है कि आपके बिखरे हुए हिस्से किसी के हाथ में हैं।
आज एक काम कीजिए: कागज़ पर वह एक चीज़ लिखिए जिसके बारे में आप महीनों से परमेश्वर से बहस कर रहे हैं, और उसके नीचे यह वाक्य अपनी आवाज़ में बोलकर लिखिए, "आपकी युक्ति को कोई रोक नहीं सकता।" फिर वह कागज़ अपनी बाइबल में रख दीजिए।
संदर्भ
अय्यूब की दुनिया कुलपिताओं की दुनिया है: कोई मंदिर नहीं, कोई याजक नहीं, घर का मुखिया ही बलि चढ़ाता है। धन का हिसाब भेड़-बकरियों, ऊँटों और बैलों में होता है, और इज़्ज़त का हिसाब इस बात में कि आप नगर के फाटक पर बैठते हैं या नहीं। बीमार होकर अय्यूब फाटक से निकाल दिया गया है; वह राख के ढेर पर है, जहाँ कचरा जलाया जाता था, जहाँ कुत्ते घूमते थे, जहाँ धुएँ और सड़न की गंध थी। उसकी सामाजिक मृत्यु हो चुकी है। और इसी जगह, दोस्तों के धर्मशास्त्रीय भाषणों के बाद, तूफान में से परमेश्वर की आवाज़ आती है। पहले सुनवाई, तब उत्तर।
मुख्य पात्र
ध्यान दीजिए कि अय्यूब अपने शब्द वापस नहीं लेता जहाँ उसने ईमानदारी से शिकायत की थी; परमेश्वर खुद आगे कहते हैं कि अय्यूब ने उनके विषय "ठीक बात" कही है, उसके मित्रों ने नहीं। तो यह विनम्रता चुप्पी से पैदा नहीं हुई, बहस से होकर गुज़री है। अय्यूब वह आदमी है जिसने परमेश्वर को छोड़ा नहीं, बस उन्हें पकड़े-पकड़े झगड़ता रहा। उसका भीतरी नक्शा यही बताता है: भरोसे का विपरीत संदेह नहीं, उदासीनता है। और जब परमेश्वर आते हैं तो उसकी जीभ का सुर बदलता है, उसकी ईमानदारी नहीं। यही वह इंसान है जिसे परमेश्वर "मेरा दास" कहते हैं, फोड़ों और सवालों समेत।
कठिन प्रश्न
अगर परमेश्वर की कोई युक्ति रुक नहीं सकती, तो क्या अय्यूब के बच्चों की मृत्यु भी उसी युक्ति का हिस्सा थी? पाठ यह सवाल खड़ा करता है और उसे बंद नहीं करता। अय्यूब को कभी स्वर्ग की उस बातचीत के बारे में नहीं बताया जाता जो पहले अध्याय में हुई थी; वह बिना जवाब के ही संतुष्ट होता है, जवाब पाकर नहीं। यह हमें असहज करना चाहिए। बाइबल यहाँ दुःख को सुंदर नहीं बनाती, न उसे किसी सुविधाजनक कारण में बदलती है। वह सिर्फ इतना कहती है कि अंधकार के पीछे शून्य नहीं, एक चेहरा है। बाकी रहस्य बना रहता है, और उसे रहस्य ही रहने देना ईमानदारी है।
मनन के प्रश्न
आपकी कौन-सी योजना इस समय परमेश्वर की योजना के साथ टकरा रही है, और आप उस टकराव को किन शब्दों में उनसे कह सकते हैं?
अय्यूब ने जवाब पाए बिना शांति पाई। आप किस बात का जवाब पाने तक भरोसा टालते रहे हैं?
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Job 42:2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
अय्यूब 42:2 का क्या अर्थ है?
अय्यूब 42:2 किस विषय में है?
अय्यूब 42:2 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
अय्यूब 42:2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
अय्यूब 42:2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Job 42 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
अय्यूब के किसी भी "क्यों" का जवाब परमेश्वर ने नहीं दिया। फिर भी वह कहता है, "मैंने तो जो नहीं समझता था वही कहा।" उसकी शांति उत्तर मिलने से नहीं, परमेश्वर के मिलने से आई। कभी कभी हमारा मन भी चुप तब होता है जब सब समझ आ जाए, पर असली चैन तब है जब हम कहें, मुझे समझ नहीं आता, फिर भी तू भला है।
पिता, कितनी बड़ी बात है कि जिनसे मुझे चोट पहुँची, उनके लिए भी मैं प्रार्थना कर सकता हूँ। मेरे मन की कड़वाहट को नरम कर दे, और जब कोई मेरे लिए दुआ माँगे तो मुझे भी झुकना सिखा। तेरी क्षमा हम सबको फिर से जोड़ दे।
अय्यूब ने परमेश्वर से बहस की, चिल्लाया, सवाल किए। उसके मित्रों ने शालीन धर्मशास्त्र सुनाया। फिर भी परमेश्वर कहते हैं, "तुम लोगों ने मेरे विषय में मेरे दास अय्यूब की सी सच्ची बात नहीं कही।" सोच, कहीं तुम्हारी सजी सजी बातें उस टूटी हुई ईमानदार पुकार से कमज़ोर तो नहीं, जो परमेश्वर से मुँह मोड़े बिना रोती है?
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