योएल 1
पाठ
योएल नबी के पास यहोवा का वचन आता है, और वह देश के बुज़ुर्गों और सब निवासियों को पुकारता है: कान लगाकर सुनो, क्या ऐसा कभी हुआ है? टिड्डियों के चार दलों ने खेत, दाखबारी, अंजीर, अनार, खजूर, सब चट कर लिया है; अन्न, दाखमधु और तेल खत्म हैं, इसलिए मंदिर में अन्नबलि और अर्घ भी बंद हो गए हैं। नबी किसानों, याजकों और पशुओं तक के विलाप को शब्द देता है और आदेश देता है: उपवास ठहराओ, महासभा बुलाओ, परमेश्वर की दुहाई दो, क्योंकि यहोवा का दिन निकट है।
पृष्ठभूमि
पहले उस दृश्य में खड़े होइए। यहूदा की पहाड़ियाँ, बरसात के बाद हरी। दूर आकाश में धूल जैसा बादल उठता है, और फिर आवाज़ आती है: लाखों जबड़ों की खरखराहट, ओले जैसी नहीं, बल्कि लगातार, चबाने की। घंटों में दाखलता की छाल तक उतर जाती है, "उसकी डालियाँ छिलने से सफेद हो गई हैं।" खेत में काम करनेवाला परिवार जानता है कि इसका मतलब क्या है: इस साल कुछ नहीं, अगले साल बीज भी नहीं। कोई अनाज बैंक नहीं, कोई बीमा नहीं। अनाज, दाखमधु और तेल इस समाज की तीनों मुद्राएँ थीं, भोजन, उत्सव और उपचार। चारों नाम, गाजाम, अर्बे, येलेक, हासील, बताते हैं कि आपदा एक बार नहीं, लहरों में आई, हर लहर पिछली की बची-खुची आशा को खा गई।
मर्म
योएल टिड्डियों को प्राकृतिक दुर्घटना कहकर नहीं टालता, और न ही किसी विशेष पाप की सूची गिनाता है। वह कुछ और करता है: वह इस खालीपन को परमेश्वर के सामने ले जाता है। "मेरे देश पर एक जाति ने चढ़ाई की है" में वह "मेरे" परमेश्वर के मुँह से बोलता है, यानी यह भूमि परमेश्वर की है और यह नाश उनके हाथ से गुज़रा है। यह असुविधाजनक धर्मशास्त्र है, पर इसमें एक अजीब कृपा छिपी है: जो परमेश्वर आपकी परिस्थिति के पीछे है, उसी से आप दुहाई दे सकते हैं। नबी का उत्तर व्याख्या नहीं, आराधना है, "उपवास का दिन ठहराओ, महासभा का प्रचार करो।" संकट में विश्वास का पहला काम समझाना नहीं, इकट्ठा होकर पुकारना है।
जुड़ी हुई डोर
ध्यान दीजिए कि सबसे गहरी चोट कहाँ लगती है: "यहोवा के भवन में न तो अन्नबलि और न अर्घ आता है।" पेट खाली है, पर नबी के लिए असली त्रासदी यह है कि लोगों के हाथ परमेश्वर के सामने खाली हैं। बलिदान का सिलसिला टूट गया, और उसके साथ वह रोज़ का चिह्न भी, जिससे इस्राएल जानता था कि हम परमेश्वर के साथ हैं। यहीं से एक डोर आगे बढ़ती है। मसीह में परमेश्वर ने वह बलिदान स्वयं जुटाया जो सूखे, टिड्डी या खाली भंडार पर निर्भर नहीं है। जब हमारे हाथ में चढ़ाने योग्य कुछ नहीं होता, तब भी एक बलिदान चढ़ चुका है। योएल का खाली मंदिर उस खालीपन की ओर इशारा करता है जिसे केवल परमेश्वर भर सकते हैं।
दर्पण
योएल पहले मतवालों को जगाता है, "हे मतवालों, जाग उठो, और रोओ।" यह ताना नहीं, निदान है। जब ज़मीन खिसकती है, हमारी पहली प्रवृत्ति सुन्न होना है: एक और गिलास, एक और स्क्रोल, और काम में डूब जाना। योएल कहता है, होश में आओ और रोओ। फिर वह किसानों से कहता है, "लज्जित हो", क्योंकि जिन हाथों पर उन्हें भरोसा था, वे इस बार बेकार निकले। आपकी नौकरी, आपकी बचत, आपका स्वस्थ शरीर, आपकी सुलझी हुई गृहस्थी: ये आशीषें हैं, आधार नहीं। और अंत में याजक, जिन्हें रातभर टाट में जागना है। धार्मिक अगुवा होने का अर्थ यह नहीं कि आप दुःख के ऊपर खड़े हैं, बल्कि यह कि आप लोगों के दुःख को सबसे पहले परमेश्वर के सामने ले जाते हैं।
एक बारीकी
पद 8 में एक चौंकाने वाली तस्वीर है: "जैसे युवती अपने पति के लिये कमर में टाट बाँधे हुए विलाप करती है।" यह किसी बूढ़ी विधवा का शोक नहीं। यह वह लड़की है जिसकी सगाई हो चुकी थी, जिसका पूरा भविष्य उस एक नाम से जुड़ा था, और वह नाम शादी से पहले ही मिट गया। उसके हाथ में न पति है, न बच्चे, न घर, उस समाज में न कोई सुरक्षा। योएल कहता है, देश का शोक ऐसा है: यह किसी बीते हुए अच्छे समय का मातम नहीं, बल्कि उस भविष्य का मातम है जो कभी आया ही नहीं। बीज ढेलों के नीचे झुलस गए। यही सबसे कड़वा दुःख है, वह जो होना था और नहीं हुआ।
कठिन प्रश्न
अगर परमेश्वर ने ही यह टिड्डी दल भेजा, तो पद 18 और 20 का क्या करें? "पशु कैसे कराहते हैं?", "वन-पशु भी तेरे लिये हाँफते हैं।" गाय-बैलों ने कोई मूर्ति नहीं पूजी, हिरनों ने कोई अन्याय नहीं किया। मनुष्य के पाप की सज़ा में सृष्टि क्यों तड़पती है? योएल इसे नहीं सुलझाता, वह इसे ज़ोर से कहता है। और यही ईमानदारी बाइबल की खासियत है: वह इस अन्याय को छिपाती नहीं। जो हम देख सकते हैं वह इतना है कि मनुष्य और मिट्टी एक ही जीवन में बंधे हैं, इसलिए हमारा टूटना उनका भी टूटना है। इसका उत्तर व्याख्या नहीं, वही दुहाई है, "हे यहोवा, मैं तेरी दुहाई देता हूँ।" जब जानवर हाँफते हैं और हमारे पास शब्द नहीं होते, तब भी यह पुकार बची रहती है।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन सी चीज़ है जिसे आप "आशीष" कहते हैं, पर सच में उस पर अपना आधार टिका बैठे हैं, और जिसके छिन जाने से आप बिखर जाएँगे?
योएल संकट में अकेले प्रार्थना करने को नहीं, महासभा बुलाने को कहता है। आपके दुःख में कौन शामिल है, और आप किसके दुःख में शामिल होने से बचते रहे हैं?
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Joel 1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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योएल 1 का क्या अर्थ है?
योएल 1 किस विषय में है?
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योएल 1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
योएल 1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Joel 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
खेत उजड़ गया, भूमि विलाप करती है; क्योंकि अन्न नाश हो गया, नया दाखमधु सूख गया, तेल भी जाता रहा।" ध्यान दो, ये तीनों वही चीज़ें थीं जो मन्दिर में चढ़ाई जाती थीं। टिड्डियों ने सिर्फ़ रोटी नहीं छीनी, उपासना का हाथ भी खाली कर दिया। कभी कभी खालीपन ही परमेश्वर की पुकार होती है। तुम्हारे जीवन का सूखा तुम्हें किस ओर मोड़ रहा है?
टिड्डियों ने खेत उजाड़ दिए, और योएल का पहला आदेश खेत बचाना नहीं था। वह कहता है, "उपवास का दिन ठहराओ, महासभा का प्रचार करो।" और बुलावा सिर्फ याजकों को नहीं, "देश के सब रहनेवालों को" है। दुख हमें अकेला कर देता है, हम अपने कमरे में बंद होकर रोते हैं। पर परमेश्वर कहता है, साथ आओ, मिलकर दुहाई दो। तेरा टूटा हुआ मन किसके साथ बाँटा गया है?
बीज ढेलों के नीचे झुलस गए, भण्डार सूने पड़े हैं; खत्ते गिर पड़े हैं, क्योंकि अनाज सूख गया।" सबसे पहले जो मरा, वह किसी को दिखा भी नहीं। मिट्टी के नीचे, चुपचाप। नुकसान अक्सर ऐसे ही शुरू होता है, खाली भण्डार से नहीं, बल्कि उस उम्मीद से जो भीतर ही सूख गई। योएल इसी सूखी जगह पर परमेश्वर को पुकारने बुलाता है। तेरे भीतर कौन सा बीज चुपचाप झुलस रहा है?
पिता, धन्यवाद कि आपने पहले ही चेतावनी दे दी, "यहोवा का दिन निकट है।" आपने हमें अंधकार में नहीं छोड़ा, बल्कि लौट आने का समय दिया। धन्यवाद कि आप सर्वशक्तिमान हैं, और जो आपकी शरण में आते हैं, उन्हें उस दिन भी थामे रखते हैं।
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