यूहन्ना 10:10
पाठ
यीशु दो आगमनों को आमने-सामने रखते हैं। एक ओर चोर, जिसका आना ही तीन कामों के लिए है: "चोरी करने और हत्या करने और नष्ट करने को।" दूसरी ओर वे स्वयं: "मैं इसलिए आया कि वे जीवन पाएँ, और बहुतायत से पाएँ।" यह वाक्य भेड़शाला के उस लम्बे दृष्टान्त के बीचोंबीच खड़ा है जहाँ यीशु पहले अपने आपको द्वार कहते हैं और तुरन्त बाद अच्छा चरवाहा, जो भेड़ों के लिये अपना प्राण देता है। यानी यह कोई अलग-थलग सुनहरा वचन नहीं है, बल्कि एक तुलना का निष्कर्ष है: भेड़ों के पास आने वाला हर व्यक्ति उन्हें कुछ देने नहीं, बहुतों बार उनसे कुछ लेने आता है। और झुंड को यह पहचानना सीखना है कि कौन क्या लेकर आया है।
मर्म
ध्यान दीजिए, यीशु यहाँ जीवन की परिभाषा नहीं देते, वे जीवन का स्रोत बताते हैं। "बहुतायत" शब्द के पीछे जो यूनानी शब्द है, पेरिस्सोन, उसका अर्थ है "जरूरत से अधिक, छलकता हुआ"। यह मात्रा की नहीं, उदारता की भाषा है। परमेश्वर अपने लोगों को केवल जीवित रखने के लिए नहीं आए, जैसे कोई मालिक मवेशी को बस चलता-फिरता रखे; वे उन्हें भरपूरी देने आए। और इसका उल्टा पक्ष उतना ही तीखा है: जो कुछ भी आपके जीवन को घटाता है, आपके भीतर से कुछ चुराता है, आपको धीरे-धीरे मार डालता है, वह मसीह की ओर से नहीं आया, चाहे वह कितनी ही धार्मिक भाषा बोलता हो। यही इस वचन की नैतिक धार है। जीवन की कसौटी यह नहीं कि क्या अनुमति है, बल्कि यह कि क्या जीवन देता है और क्या चुपचाप लूटता है।
सूत्र
यह तुलना यीशु ने खाली मैदान में नहीं गढ़ी। यहेजकेल 34 में परमेश्वर इस्राएल के चरवाहों पर फूट पड़ते हैं: वे भेड़ों का दूध पीते हैं, ऊन पहनते हैं, मोटी भेड़ें खाते हैं, पर झुंड को चराते नहीं। और उसी अध्याय में परमेश्वर कहते हैं कि अब वे स्वयं आकर चराएँगे। यूहन्ना 10 उसी वादे का पूरा होना है, और इसीलिए अगला ही वाक्य कहता है, "अच्छा चरवाहा भेड़ों के लिये अपना प्राण देता है।" पूरे बाइबल के इतिहास में एक ही रेखा दौड़ती है: नेतृत्व करने वाले प्रायः लेते रहे, और परमेश्वर देने आए। मसीह उस रेखा का अन्तिम बिन्दु हैं, वह चरवाहा जिसकी उदारता उसकी अपनी जान तक जाती है। बहुतायत सस्ती नहीं है; उसकी कीमत क्रूस पर चुकाई गई।
दर्पण
अब इसे रोज़मर्रा में उतारिए, क्योंकि यहीं यह वचन काटता है। वह नौकरी जो आपको पैसा देती है और आपके बच्चों के साथ बैठने का हर शाम का समय ले लेती है: वह क्या दे रही है और क्या चुरा रही है? वह कर्ज़ जिसे आपने "थोड़े समय के लिए" लिया था और जो अब आपके हर निर्णय पर बैठा है? वह रिश्ता जिसमें आप लगातार छोटे होते जा रहे हैं, और आप इसे विनम्रता कहकर बहलाते हैं? वह स्क्रीन जो रात के ग्यारह बजे से डेढ़ बजे तक आपसे कुछ माँगे बिना लेती रहती है, और सुबह आप खाली उठते हैं? चोर सेंध नहीं लगाता, वह दरवाज़े से भीतर आता है और आपकी सहमति से आपकी थाली में से खाता है। यीशु का मानदंड सरल और निर्मम है: क्या इससे मेरे भीतर जीवन बढ़ता है, या घटता है?
आज दिन ढलने से पहले दस मिनट निकालिए, एक कागज़ पर उस एक चीज़ का नाम लिखिए जो पिछले हफ़्ते आपसे जीवन चुराती रही, और उसके नीचे इस हफ़्ते के लिए एक ठोस सीमा लिखकर किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति को वह वाक्य भेज दीजिए।
मुख्य पात्र
इस वचन में यीशु स्वयं बोल रहे हैं, और उनकी आवाज़ में एक चीज़ साफ़ सुनाई देती है: गुस्सा। पिछले अध्याय में जिस जन्मान्ध व्यक्ति की आँखें उन्होंने खोलीं, उसे अगुवों ने आराधनालय से बाहर निकाल दिया था। वह पृष्ठभूमि है। यीशु उन पर भड़के हुए हैं जो झुंड के रखवाले कहलाते हैं और झुंड को नोचते हैं। पर उनका क्रोध उन्हें कठोर नहीं बनाता; अगले ही साँस में वे कहते हैं कि वे अपनी भेड़ों को नाम ले लेकर बुलाते हैं। यह वह परमेश्वर है जो झुंड को गिनता नहीं, पहचानता है। और वे किराए के मजदूर नहीं हैं जो भेड़िए को देखकर भाग जाए; वे ठहर जाते हैं, क्योंकि भेड़ें उनकी अपनी हैं।
कठिन प्रश्न
तो फिर विश्वासियों का जीवन इतना पतला क्यों दिखता है? कैंसर, बेरोज़गारी, टूटी शादी, बच्चा जो लौटता नहीं। "बहुतायत" शब्द को समृद्धि का वादा बना देना आसान है, और उतना ही झूठा। पर उसे "बस भीतरी शान्ति" कहकर हल्का कर देना भी बेईमानी है। यीशु ने यह वाक्य उन लोगों से कहा जो कुछ ही हफ़्तों में उन पर पत्थर उठाने वाले थे, और वे स्वयं इस बहुतायत के रास्ते में मारे गए। इसका मतलब यह है कि भरपूरी दुःख के आर-पार जाती है, उसके इर्द-गिर्द नहीं। इसका उत्तर तर्क में नहीं, चरवाहे की उपस्थिति में मिलता है। जो आपके साथ अँधेरे में चलता है, वही आपकी भरपूरी है, और यह उत्तर कभी-कभी बहुत छोटा लगता है।
एक बारीकी
वाक्य के दो हिस्सों में कर्ता बदल जाता है, और यही सब कुछ खोल देता है। चोर आता है ताकि वह पाए: चोरी, हत्या, नाश, तीनों उसके लाभ के क्रियाकलाप हैं। यीशु कहते हैं, "मैं इसलिए आया कि वे जीवन पाएँ।" वे नहीं कहते कि मैं आया ताकि मुझे कुछ मिले। पाने वाला "वे" है, भेड़ें, आप। और चोर की तीन क्रियाओं में एक चढ़ाव है: चोरी में कुछ लौटाया जा सकता है, हत्या में नहीं, और नाश के बाद तो लौटाने को कुछ बचता ही नहीं। जो चीज़ें हमें खाती हैं, वे ठीक इसी क्रम में चलती हैं, धीरे-धीरे। इसलिए पहचान का सवाल यही है: यह मुझसे कुछ चाहता है, या मेरे लिए कुछ चाहता है?
चिंतन
आपके जीवन की कौन-सी एक आदत या प्रतिबद्धता आपसे लगातार लेती है और आप उसे अब तक ज़िम्मेदारी कहकर बचाते आए हैं?
आप जिनके ऊपर किसी रूप में अधिकार रखते हैं (बच्चे, कर्मचारी, छात्र, समूह के सदस्य), वे आपके पास से क्या लेकर लौटते हैं: जीवन, या थकान?
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John 10:10 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यूहन्ना 10:10 का क्या अर्थ है?
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John 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
मेरा पिता, जिसने उन्हें मुझे दिया है, सबसे बड़ा है, और कोई उन्हें पिता के हाथ से छीन नहीं सकता।" ध्यान दे, यीशु यह नहीं कहते कि भेड़ें मजबूत हैं। वे कमजोर हैं, भटकने वाली हैं। सुरक्षा उनकी पकड़ में नहीं, पिता की पकड़ में है। तेरा डर शायद यही है कि तू खुद को थामे नहीं रख पाएगा। सच है। पर तुझे थामने वाला हाथ सबसे बड़ा है।
यीशु उसी जगह लौट आए जहाँ यूहन्ना पहले बपतिस्मा देता था। यूहन्ना अब जीवित नहीं था, उसने कोई चमत्कार भी नहीं किया था, फिर भी लोगों ने कहा कि उसने इस मनुष्य के विषय में जो कुछ कहा वह सब सच था। और "वहाँ बहुतों ने उस पर विश्वास किया।" तुम्हारी सादी, सच्ची गवाही तुम्हारे जाने के बाद भी किसी को मसीह तक पहुँचा सकती है।
इन बातों के कारण यहूदियों में फिर फूट पड़ी।" यीशु ने अभी अपने प्राण देने की बात कही थी, सबसे कोमल शब्द, और उन्हीं शब्दों पर लोग बँट गए। सच्चाई हमेशा सबको जोड़ती नहीं, वह पहले अलग करती है। जब मसीह की बात आपके अपने घर या मंडली में मतभेद ले आए, तो घबराइए मत। पूछिए बस इतना, कि मैं किस ओर खड़ा हूँ।
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