यूहन्ना 17:20
पाठ
गतसमनी की ओर जाने से ठीक पहले, प्रार्थना के बीचों-बीच, यीशु अचानक उस कमरे की दीवारों के पार देखते हैं। अब तक वे उन ग्यारह के लिये माँग रहे थे जो उनके सामने बैठे थे: उनकी रक्षा हो, वे एक हों, सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएँ। और फिर यह वाक्य: "मैं केवल इन्हीं के लिये विनती नहीं करता, परन्तु उनके लिये भी जो इनके वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे।" प्रार्थना का दायरा अचानक फैल जाता है, वर्तमान से भविष्य तक, उस मेज़ से लेकर हर उस व्यक्ति तक जो किसी और के कहे हुए शब्द सुनकर विश्वास करेगा। यानी आप तक।
मर्म
ध्यान दीजिए कि यीशु क्रिया किस काल में रखते हैं: "विश्वास करेंगे", भविष्य। वे उन लोगों के लिये प्रार्थना कर रहे हैं जो अभी पैदा भी नहीं हुए। यह केवल भावुक दूरदर्शिता नहीं है, यह परमेश्वर के काम करने का तरीका है। विश्वास आसमान से सीधा नहीं गिरता; वह "वचन के द्वारा" आता है, यानी किसी गवाह के मुँह से, किसी के टूटे-फूटे शब्दों से, किसी माँ की प्रार्थना या किसी थके हुए प्रचारक के उपदेश से। परमेश्वर ने अपने उद्धार को मानवीय ज़बान के साथ जोड़ दिया, और यह जोखिम भरा है। साथ ही यहाँ कुछ गहरा सांत्वना देने वाला है: आपका विश्वास आपकी खोज से शुरू नहीं हुआ। उससे पहले कोई आपके लिये प्रार्थना कर चुका था, और वह कोई यीशु मसीह स्वयं थे।
सूत्र-धारा
परमेश्वर की कहानी हमेशा एक से होकर बहुतों तक पहुँचती रही है। अब्राहम को बुलाया गया ताकि उसके द्वारा पृथ्वी के सारे कुल आशीष पाएँ; एक परिवार से एक राष्ट्र, एक राष्ट्र से एक शेष, और अंत में एक ही व्यक्ति, मसीह, जिसमें सब कुछ सिमट आता है। यूहन्ना 17:20 में वह धारा उलटी दिशा में फूटती है: एक से बहुतों की ओर, ग्यारह आदमियों से लेकर हर महाद्वीप तक। और ध्यान दीजिए कि यह विस्तार किसी सैन्य योजना से नहीं, बल्कि प्रार्थना से शुरू होता है। कलीसिया का जन्म प्रचार के पहले मसीह के इस निवेदन में हुआ। जो अगले पद में आता है, "कि वे सब एक हों", वही इस विस्तार का लक्ष्य है: एक फैला हुआ परिवार जो बिखरा नहीं, जुड़ा हुआ है।
दर्पण
आप शायद कभी-कभी सोचते हैं कि आपका विश्वास दूसरे दर्जे का है। आपने यीशु को चलते-फिरते नहीं देखा, कोई चमत्कार आपकी आँखों के सामने नहीं हुआ, आपके पास बस वह है जो किसी ने आपको बताया: एक दादी, एक शिक्षक, एक किताब, एक साधारण रविवार का उपदेश। और जब बीमारी आती है, या नौकरी का फैसला सिर पर होता है, या आपका बेटा कहता है कि वह अब विश्वास नहीं करता, तब यह सब बहुत पतला लगता है। यह पद उस पतलेपन को सीधे संबोधित करता है। यीशु ने दूसरे हाथ के विश्वास को कमतर नहीं कहा; उन्होंने उसी के लिये प्रार्थना की। आपका नाम उनकी सबसे गहरी प्रार्थना में पहले से शामिल था, उस रात, उस मेज़ पर।
और इसका उल्टा पहलू भी चुभता है: आपके शब्द भी किसी की कड़ी हैं। वह जोखिम आप उठा रहे हैं, चुप रहकर भी।
आज, दस मिनट के भीतर: उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसके कहे हुए शब्दों से आप तक मसीह पहुँचे, और उसके लिये ज़ोर से धन्यवाद दीजिए। अगर वह जीवित है, तो उसे वही बात एक संदेश में भेज दीजिए।
बारीकी
"इनके वचन के द्वारा।" यीशु यह नहीं कहते, "मेरे वचन के द्वारा", हालाँकि वही अंततः सच है। वे जानबूझकर शिष्यों की गवाही को बीच में रखते हैं। ये वही लोग हैं जो कुछ ही घंटों में भाग जाएँगे, जिनमें से एक तीन बार इनकार करेगा। उन्हीं के मुँह पर यीशु आने वाली सदियों का विश्वास टिका देते हैं। यह परमेश्वर का अजीब आत्मविश्वास है: वे अपने सत्य को नाज़ुक मिट्टी के बर्तनों में रखते हैं और फिर भी वह नहीं टूटता। इसका मतलब यह भी है कि कलीसिया में सुनाया गया वचन कोई गौण चीज़ नहीं। जब कोई काँपती आवाज़ में मसीह की बात करता है, तब ठीक वही हो रहा है जिसके लिये यीशु ने प्रार्थना की थी।
मुख्य पात्र
यहाँ यीशु को देखिए, कुछ घंटे पहले उस रात के जिसमें उन्हें पकड़ा जाएगा। कोई भी व्यक्ति ऐसे क्षण में अपने ही दर्द में सिमट जाता है। वे नहीं सिमटते। उनका मन सदियों आगे चला जाता है, उन चेहरों की ओर जिन्हें वे अभी नहीं देख सकते पर जिन्हें वे पहले से अपना कहते हैं। यह प्रेम की सबसे असाधारण विशेषता है: वह अपनी पीड़ा के समय दूसरों के लिये जगह बनाता है। और यह प्रार्थना उस रात के साथ खत्म नहीं हुई; वे आज भी मध्यस्थ हैं। जिस भरोसे के साथ वे पिता से बात करते हैं, "जो कुछ मेरा है वह सब तेरा है", उसी भरोसे के साथ उन्होंने आपका नाम उस सूची में जोड़ा।
प्रश्न
अगर मसीह ने स्वयं प्रार्थना की कि "वे सब एक हों", तो कलीसिया इतनी बँटी हुई क्यों है? यह प्रश्न टालने लायक नहीं। हमारे पास हज़ारों संप्रदाय, टूटी हुई मंडलियाँ, आपस में बात न करने वाले विश्वासी हैं। क्या पुत्र की प्रार्थना अनसुनी रह गई? आसान उत्तर यह कहेगा कि यह एकता "आत्मिक" है, दिखाई नहीं देती। पर पद 21 कहता है कि यह एकता इसलिए हो "इसलिए कि जगत विश्वास करे", और जो दिखता ही नहीं वह जगत को कैसे मनाएगा? ईमानदारी से: यह प्रार्थना अभी पूरी नहीं हुई। वह उत्तर की प्रतीक्षा में है, और जिस कड़वाहट को आप किसी मसीही भाई के प्रति पाले हुए हैं, वह उस उत्तर को रोक रही है।
चिंतन
आपके विश्वास की कड़ी किन लोगों से होकर आप तक पहुँची, और उनमें से किसको आपने कभी धन्यवाद नहीं कहा?
किस एक रिश्ते में आपकी चुप्पी या कड़वाहट उस एकता के विरुद्ध खड़ी है जिसके लिये यीशु ने प्रार्थना की?
पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें
आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।
अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।
चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।
परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास
रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।
नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।
प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
John 17:20 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यूहन्ना 17:20 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना 17:20 किस विषय में है?
यूहन्ना 17:20 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यूहन्ना 17:20 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना 17:20 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 17 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यीशु प्रार्थना में कहते हैं, "वह महिमा जो तूने मुझे दी, मैंने उन्हें दी है, ताकि वे एक हों जैसे हम एक हैं।" सोचो, जो महिमा पिता ने उन्हें दी, वही उन्होंने हमें सौंप दी, और उसका मकसद था एकता। तो जब तुम किसी भाई से मुँह फेर लेते हो, तुम उस महिमा को किनारे रख रहे होते हो। किससे मेल करना बाकी है?
पिता, धन्यवाद कि मैं तेरा हूँ और तेरे पुत्र का भी, क्योंकि "जो कुछ मेरा है वह सब तेरा है, और जो तेरा है वह मेरा है।" धन्यवाद कि तूने मुझे यीशु को सौंप दिया, और वह मुझ जैसे साधारण जन में महिमा पाता है। यह सोचकर मन भर आता है।
जो काम तू ने मुझे करने को दिया था, उसे पूरा करके मैं ने पृथ्वी पर तेरी महिमा की है।" यीशु यह क्रूस से पहले कहते हैं, जब सब कुछ बाकी दिखता था। पर उनका मन पहले ही मान गया था। और ध्यान दे, उन्होंने हर काम नहीं किया, बस वही जो पिता ने सौंपा था। तेरी थकान कहीं उन कामों से नहीं, जो तुझे दिए ही नहीं गए थे?
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें