यूहन्ना 9
पाठ
एक जन्म से अंधा व्यक्ति सड़क किनारे बैठा है। यीशु उसे देखते हैं, थूक और मिट्टी से लेप बनाते हैं, और उसे शीलोह के कुण्ड में धोने भेजते हैं। वह देखता हुआ लौटता है, और उसी क्षण से एक लम्बी पूछताछ शुरू होती है, पहले पड़ोसियों की, फिर फरीसियों की, फिर माता-पिता की, और फिर से उसकी। अंत में जब वह आराधनालय से निकाला जाता है, तब यीशु उसे दोबारा ढूँढ़ते हैं और वह विश्वास करके दण्डवत् करता है।
मर्म
यह अध्याय केवल एक चंगाई की कहानी नहीं है। यह इस बारे में है कि जब सच्चाई सामने आती है, तो लोग क्या करते हैं। एक आदमी को दिखाई देने लगा; यह तथ्य है। इस तथ्य के सामने कोई विनम्र होता है, कोई डरता है, कोई इनकार करता है, कोई शत्रुता में बदल जाता है। यीशु के काम केवल शरीर पर नहीं होते, वे हर देखने वाले के भीतर एक निर्णय की माँग रखते हैं। और जो सोचते हैं कि वे पहले से देख रहे हैं, वही सबसे अंधे निकलते हैं। यह सुसमाचार का एक कठोर सत्य है: आत्मिक अंधापन ज्ञान की कमी नहीं, अहंकार की उपस्थिति है।
सूत्र
पद 5 में यीशु स्वयं को "जगत की ज्योति" कहते हैं, और फिर एक अंधे को आँखें देते हैं। यशायाह 35:5 का वादा, "तब अंधों की आँखें खोली जाएँगी," यहाँ शरीर बनकर सामने खड़ा है। पुराने नियम में परमेश्वर ने मिट्टी से मनुष्य बनाया था; यहाँ मसीह मिट्टी से आँखें बनाते हैं, मानो सृष्टि का काम फिर से हो रहा हो। और शीलोह का अर्थ, "भेजा हुआ," यूहन्ना संयोग से नहीं बताते। जो कुण्ड में धोने भेजा जाता है, वह असल में उस "भेजे हुए" के पास भेजा जा रहा है जो पिता से आया।
आईना
यह अध्याय हमारी सुविधा को हिलाता है। माता-पिता को देखिए: वे सच जानते हैं कि उनका बेटा अब देखता है, पर आराधनालय से निकाले जाने के डर से टाल जाते हैं, "वह सयाना है, उसी से पूछ लो।" यह डर आज भी वैसा ही काम करता है। दफ्तर में जब किसी सहकर्मी के साथ अन्याय होता है और चुप रहना सुरक्षित है; परिवार में जब किसी बुज़ुर्ग की गलत बात के विरुद्ध खड़ा होना पड़ता है; चर्च में जब अगुवों का व्यवहार असुसमाचारीय है और सब जानते हैं पर कोई नहीं बोलता। हम भी कहते हैं, "वह सयाना है।" सच जानना और सच बोलना दो अलग साहस हैं, और यह अध्याय दूसरा माँगता है। साथ ही, वह अंधा आदमी सिखाता है कि गवाही देने के लिए हर धर्मशास्त्रीय उत्तर नहीं चाहिए, केवल ईमानदारी: "मैं अंधा था और अब देखता हूँ।"
मुख्य पात्र
यह पूर्व-अंधा आदमी यूहन्ना के सुसमाचार के सबसे साहसी पात्रों में से एक है। शुरू में वह यीशु को केवल "यीशु नामक एक व्यक्ति" कहता है। फिर "भविष्यद्वक्ता।" फिर "परमेश्वर की ओर से।" अंत में "प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ।" उसकी दृष्टि केवल आँखों की नहीं, समझ की भी क्रमशः खुलती है, और यह जीवन जितनी वास्तविक बात है। दिलचस्प यह भी है कि उसका साहस दबाव में बढ़ता है, घटता नहीं। जितना फरीसी उसे धमकाते हैं, उसका उत्तर उतना ही तीखा होता जाता है, अंत में तो व्यंग्य तक, "क्या तुम भी उसके चेले होना चाहते हो?" जब उसे बाहर निकाला जाता है, तब यीशु उसे ढूँढ़ते हैं। समुदाय ने उसे त्यागा, पर मसीह ने नहीं।
बारीकी
पद 6 में एक विचित्र बात है: यीशु थूक से मिट्टी सानते हैं। वे चाहते तो केवल शब्द से चंगा कर सकते थे, जैसे और जगहों पर किया। पर यहाँ वे मिट्टी लगाते हैं, वह भी सब्त के दिन, जिसमें मिट्टी सानना रब्बियों की व्यवस्था के अनुसार वर्जित काम था। यह संयोग नहीं है। यीशु जानबूझकर उस नियम को छूते हैं जो सब्त के मूल उद्देश्य, विश्राम और चंगाई, को ही भूल चुका है। धार्मिक ढाँचे इतने कठोर हो सकते हैं कि वे उसी परमेश्वर के काम को रोकने लगें जिनके नाम पर वे खड़े हैं। यह हमारी परम्पराओं के लिए भी चेतावनी है: क्या हमारे अच्छे नियम कभी-कभी लोगों को चंगाई तक पहुँचने से रोकते हैं?
प्रश्न
पद 3 अटपटा है। यीशु कहते हैं, "न इसने पाप किया, न इसके माता-पिता ने, परन्तु यह इसलिए हुआ कि परमेश्वर के काम उसमें प्रगट हों।" क्या इसका मतलब है कि परमेश्वर ने इस आदमी को दशकों तक अंधा रखा केवल इसलिए कि एक दिन एक चमत्कार हो? यह सुनने में क्रूर लगता है। ईमानदारी से कहूँ, यीशु यहाँ पीड़ा के कारण की पूरी व्याख्या नहीं देते। वे केवल एक झूठे समीकरण को तोड़ते हैं, कि हर दुःख किसी के पाप का सीधा फल है। पीड़ा का "क्यों" खुला रहता है। पर एक बात स्पष्ट है: इस आदमी का जीवन व्यर्थ नहीं था। परमेश्वर उसे भूला नहीं था। यह उत्तर नहीं है जो सब कुछ समझा दे, पर यह उतना है जितना मसीह देना चाहते हैं, और शायद उतना ही जितना हम सह सकते हैं।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन-सी जगह है जहाँ आप सच जानते हैं पर "वह सयाना है, उसी से पूछ लो" कहकर टाल जाते हैं?
*फरीसी कहते हैं "हम देखते हैं,"
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John 9 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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यूहन्ना 9 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 9 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
जब तक मैं जगत में हूँ, तब तक जगत की ज्योति हूँ।" यीशु ये बात एक ऐसे आदमी के सामने कहते हैं जिसने कभी रोशनी देखी ही नहीं। और फिर ज्योति उसकी आँखों तक कैसे पहुँची? मिट्टी बनकर, धूल और थूक बनकर। कभी सोचा है कि जो चीज़ तुम्हारी आँखों पर बोझ जैसी लगी, वही उजाला लेकर आई हो?
जब वह अंधा व्यक्ति देखने लगा, तो उसके पड़ोसी और वे लोग जो पहले उसे भीख माँगते देखते थे, कहने लगे, "क्या यह वही नहीं, जो बैठा भीख माँगा करता था?" कुछ पहचान ही नहीं पाए। यीशु का स्पर्श उसे इतना बदल चुका था कि लोग हैरान थे।
सोचिए, जब मसीह किसी के जीवन में सचमुच काम करते हैं, तो आसपास के लोग भी चौंक जाते हैं। क्या आपके बदलाव को देखकर कोई पूछता है, "क्या यह वही व्यक्ति है?
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