यहोशू 5
पाठ
यरदन पार होते ही कनान के राजाओं का साहस पिघल गया, और ठीक उसी घड़ी परमेश्वर यहोशू से कहते हैं: चकमक की छुरियाँ बनवाकर पूरी फौज का खतना करा दे। जंगल में जन्मी पूरी पीढ़ी गिलगाल में घायल पड़ी रहती है जब तक चंगी नहीं होती; फिर वे फसह मनाते हैं, देश की उपज खाते हैं, और मन्ना उसी सवेरे बन्द हो जाता है। अन्त में यरीहो के पास यहोशू को नंगी तलवार लिये एक पुरुष मिलता है, जो न शत्रु है न सहयोगी, बल्कि "यहोवा की सेना का प्रधान", और यहोशू को जूती उतारने का आदेश मिलता है।
मूल बात
यह अध्याय युद्ध की तैयारी नहीं, आत्मसमर्पण की तैयारी है। सैन्य तर्क कहता था: शत्रु डरा हुआ है, अभी हमला करो। परमेश्वर कहते हैं: पहले अपने शरीर पर मेरे वाचा का चिह्न लगाओ, और कुछ दिन असहाय पड़े रहो। यानी कनान जीतने की शक्ति इस्राएल की कुशलता में नहीं, बल्कि इस बात में है कि वे किसके लोग हैं। खतना, फसह, और मन्ना का बन्द होना, तीनों एक ही बात कहते हैं: पहचान पहले, पराक्रम बाद में। परमेश्वर अपने लोगों को पहले अपना बनाते हैं, तब काम सौंपते हैं। और जब सेना का प्रधान प्रकट होता है, तो वह यहोशू की योजना में शामिल होने नहीं आया; यहोशू को उसकी योजना में शामिल होना है।
मुख्य सूत्र
मन्ना का बन्द होना बहुत अर्थपूर्ण है। चालीस वर्ष तक परमेश्वर ने रोज़ चमत्कार से खिलाया; अब वे देश की उपज से खिलाते हैं। चमत्कार का अन्त त्याग नहीं, वरदान की पूर्ति है। वाचा का चिह्न, मेमने का लहू, और प्रतिज्ञा की भूमि की पहली रोटी, ये सब मिलकर उस ओर इशारा करते हैं जहाँ एक और फसह मनाया जाएगा और एक और मेमना कटेगा। पौलुस कहता है कि मसीह में हमारा खतना "हाथ से नहीं" हुआ, अर्थात् बाहरी चिह्न ने जो दिखाया, वह मसीह के द्वारा हृदय में पूरा होता है। गिलगाल में घायल पड़ी सेना उस मसीही सच्चाई का पूर्वाभास है: हम अपनी कमज़ोरी में ही परमेश्वर की विजय में प्रवेश करते हैं।
दर्पण
आपको यह अध्याय वहाँ चुभेगा जहाँ आप सबसे ज़्यादा सक्षम हैं। आप भी जानते हैं कि अवसर कब आता है: पदोन्नति का वह क्षण, सेवकाई का वह खुला दरवाज़ा, वह बातचीत जिसमें आप जीत सकते हैं। और परमेश्वर कहते हैं, रुको, पहले घायल हो जाओ। हमें यह असहनीय लगता है, क्योंकि हम उपयोगी बने रहना चाहते हैं। जिस दिन शरीर बीमार पड़ता है, नौकरी छूटती है, या बच्चा हमारे हाथ से निकल जाता है, तब पता चलता है कि हमने अपनी पहचान अपनी कार्यक्षमता पर टाँग रखी थी। यहोशू का प्रश्न भी हमारा है: "क्या तू हमारी ओर का है?" हम परमेश्वर को अपने पक्ष का बनाना चाहते हैं; वे हमें अपने पक्ष में बुलाते हैं।
आज, दिन ढलने से पहले, अपने जूते उतारकर एक कमरे में नंगे पाँव खड़े होकर ऊँची आवाज़ में कहिए: "अपने दास के लिये मेरे प्रभु की क्या आज्ञा है?" और फिर दो मिनट चुप रहिए।
श्रोताओं का चेहरा
जो लोग गिलगाल में खड़े थे, वे किसी को नहीं भूले थे। पद 6 उनके कानों में चुभा होगा: उनके माता-पिता जंगल में मरे क्योंकि "उन्होंने यहोवा की न मानी थी।" ये जवान वही बच्चे थे जिन्होंने चालीस साल तक कब्रें गिनी थीं और जिनके शरीर पर वाचा का चिह्न नहीं था, क्योंकि अवज्ञा की पीढ़ी ने उसे छोड़ दिया था। "तुम्हारी नामधराई जो मिस्रियों में हुई है उसे मैंने आज दूर किया है", यह वाक्य उनके लिए नए जन्म जैसा था: तुम अब दासों के बच्चे नहीं, भगोड़ों की संतान नहीं, तुम मेरी प्रजा हो। और फसह? वह उनका पहला फसह था जो मिस्र में नहीं, घर में मनाया गया।
कठिन प्रश्न
सेना का प्रधान यहोशू के सीधे प्रश्न का सीधा उत्तर नहीं देता। "नहीं", वह कहता है, और यही "नहीं" खटकता है। क्या परमेश्वर इस्राएल के पक्ष में नहीं थे? वे तो यरदन सुखा चुके थे। फिर भी वे किसी के "पक्ष" में बाँधे जाने से इनकार करते हैं। यह हमें असुरक्षित करता है, क्योंकि हमारी सब प्रार्थनाएँ चुपचाप यह मानकर चलती हैं कि परमेश्वर हमारी तरफ़ हैं, हमारी राजनीति, हमारी कलीसिया, हमारे परिवार की तरफ़। नंगी तलवार दोनों तरफ़ काट सकती है। मैं इसका कोई आरामदेह समाधान नहीं दे सकता; केवल यह कह सकता हूँ कि यहोशू ने बहस नहीं की, वह गिर पड़ा। जो परमेश्वर को अपने खेमे में क़ैद नहीं करता, वही उनकी अगुवाई पाता है।
एक बारीकी
"वे चंगे हो जाने तक अपने-अपने स्थान पर छावनी में रहे।" इस एक वाक्य में पूरी सेना कुछ दिनों के लिए पूरी तरह लाचार है, शत्रु के गढ़ से कुछ किलोमीटर दूर, खुले मैदान में। सैन्य दृष्टि से यह आत्मघात है। लेकिन यही उनका सबसे गहरा विश्वासकर्म था: उन्होंने अपनी सुरक्षा का भार पूरी तरह परमेश्वर पर डाल दिया। और ध्यान दीजिए, परमेश्वर ने तब कोई चमत्कारी दीवार नहीं खड़ी की; केवल राजाओं के पिघले मन (पद 1) ही उनकी ढाल थे। परमेश्वर कभी हमें ऐसी जगह ले जाते हैं जहाँ हमारे पास बचाव का कोई साधन नहीं बचता, और वहीं हम सीखते हैं कि बचाव कभी हमारा साधन नहीं था।
चिंतन के प्रश्न
मेरे जीवन में वह कौन सा "मन्ना" है जिसका बन्द होना मुझे त्याग जैसा लगता है, पर हो सकता है वह वरदान की पूर्ति हो?
अगर आज परमेश्वर मुझसे पूछें कि मैं किसके पक्ष में हूँ, तो मेरा ईमानदार उत्तर क्या होगा?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि जंगल में जो पीढ़ी मर गई, उसके साथ आपका वादा नहीं मरा। आपने उनके बच्चों को थामे रखा और कनान की सीमा तक पहुँचाया। धन्यवाद कि हमारी असफलताएँ आपकी योजना नहीं रोक सकतीं, और आप अगली पीढ़ी को भी अपनी विश्वासयोग्यता दिखाते हैं।
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