बाइबल व्याख्या

न्यायियों 18

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

मीका का एक वाक्य इस पूरे अध्याय का बोझ उठाता है: "तुम तो मेरे बनवाए हुए देवताओं और पुरोहित को ले चले हो; फिर मेरे पास क्या रह गया?" दान के गोत्र को अपना भाग नहीं मिला था, तो उन्होंने पाँच भेदियों को भेजा। रास्ते में वे मीका के घर रुके, उसके किराए के लेवीय पुरोहित से यात्रा की सफलता के बारे में पूछा, और उत्तर मिला: "कुशल से चले जाओ।" उत्तर में उन्होंने लैश को पाया, एक शान्त, निडर, अलग-थलग बसा नगर। छः सौ हथियारबंद लोग चल पड़े, लौटते हुए मीका की मूरतें और पुरोहित दोनों उठा ले गए, धमकी देकर मीका को चुप कराया, लैश को तलवार से काटकर जला दिया, और उस जगह का नाम दान रखकर वहाँ वही चुराई हुई मूरत खड़ी कर दी।

मर्म

इस पूरे अध्याय में परमेश्वर एक बार भी नहीं बोलते। उनका नाम ज़रूर बोला जाता है, दो बार, और दोनों बार मनुष्यों के मुँह से: पुरोहित कहता है "यहोवा की कृपादृष्टि है", और भेदिए कहते हैं "परमेश्वर ने उसे तुम्हारे हाथ में दे दिया है।" किसी वचन का, किसी दर्शन का, किसी आज्ञा का कोई ज़िक्र नहीं। यह अध्याय धर्म का अन्त नहीं दिखाता, बल्कि धर्म का सबसे ख़तरनाक रूप दिखाता है: वह जो काम करता है। यहाँ पुरोहित है, एपोद है, मूरत है, "परमेश्वर से सलाह" लेने की विधि है, और अन्त में एक बसा हुआ नगर भी है। सब कुछ है, सिर्फ़ वह जीवित परमेश्वर नहीं जिसे आप नियंत्रित न कर सकें। पहला पद यह सब समझाने की कुंजी देता है: "इस्राएलियों का कोई राजा न था।" जहाँ कोई सिंहासन नहीं, वहाँ ताक़त ही न्याय बन जाती है, और परमेश्वर का नाम उस ताक़त पर लगी मुहर।

मुख्य सूत्र

दान को उसका भाग दिया गया था; यहोशू की पुस्तक में उसकी सीमाएँ दर्ज हैं। समस्या अभाव की नहीं, विश्वास की थी। जो भाग परमेश्वर देते हैं उसे लड़ाई और धैर्य से लेना पड़ता है; जो भाग हम अपने लिए चुनते हैं उसे केवल कमज़ोर पड़ोसी पर हमला करके पाया जाता है। और ध्यान दें, अन्तिम पद बताता है कि इस पूरे समय "परमेश्वर का भवन शीलो में" मौजूद था। असली उपस्थिति उपलब्ध थी, मगर दान ने वह देवता चुना जिसे कंधे पर उठाकर ले जाया जा सके। यही उद्धार की कहानी का उलटा सिरा है। मसीह में परमेश्वर स्वयं आकर हमारे बीच डेरा खड़ा करते हैं, और वह पुरोहित जो न खरीदा जा सकता है न चुराया जा सकता है, हमें उठाता है; हम उसे नहीं उठाते।

दर्पण

मीका का प्रश्न आपके भीतर भी कहीं बैठा है। जिस दिन नौकरी चली जाए, रिपोर्ट ख़राब आए, बच्चा दूर हो जाए, उस दिन अगर आपके मन से यही निकले कि "फिर मेरे पास क्या रह गया?", तो सवाल यह है कि आप किसकी पूजा कर रहे थे, परमेश्वर की या उस सुरक्षा की जिसे आपने परमेश्वर के नाम से सजा रखा था। और दूसरी बात उन पाँच आदमियों की है। उन्होंने पुरोहित से पूछा, "जान लें कि जो यात्रा हम करते हैं वह सफल होगी या नहीं।" सफल होगी या नहीं, यह नहीं कि उचित है या नहीं। हम भी यही प्रार्थना करते हैं: सौदा हो जाए, तबादला मिल जाए, रिश्ता बन जाए। निर्णय पहले ले लिया गया है, प्रार्थना केवल मुहर लगाने आई है। और जिसे आपका निर्णय कुचलेगा, वह लैश की तरह शान्ति से बैठा है, बेख़बर।

आज दस मिनट निकालें। कागज़ पर वह एक निर्णय लिखें जिसके लिए आप परमेश्वर से हरी झंडी चाह रहे हैं, और उसके नीचे यह प्रश्न लिखकर ज़ोर से पढ़ें: "यह सफल होगा या नहीं, यह छोड़िए; क्या यह उचित है, और इसकी कीमत कौन चुकाएगा?"

एक बारीकी

तीसवाँ पद एक नाम गिरा देता है जिसे पढ़ते हुए पाँव फिसल जाना चाहिए: "वह योनातान जो गेर्शोम का पुत्र और मूसा का पोता था।" जिस व्यक्ति ने सीनै पर्वत पर "तू अपने लिये कोई मूर्ति न बनाना" सुना था, उसका पोता चोरी की मूरत का पुरोहित बना, और उसका वंश पीढ़ियों तक वहीं जमा रहा। भक्ति विरासत में नहीं मिलती; पद और प्रतिष्ठा मिल जाती है। इसी कड़ी में बीसवाँ पद देखिए: जब दानियों ने उस लेवीय से कहा कि एक घर का पुरोहित रहना अच्छा है या एक पूरे गोत्र का, तो "पुरोहित प्रसन्न हुआ"। उसे पैसे से नहीं, आकार से खरीदा गया। बड़ी सभा, बड़ा मंच, बड़ा नाम। और इससे पहले उन्होंने उससे कहा था, "चुप रह, अपने मुँह को हाथ से बन्द कर।" जिसकी ज़ुबान पदोन्नति के बदले बिक जाए, उसका चुप रहना बाद में मजबूरी नहीं, आदत होती है।

कठिन प्रश्न

सबसे असहज बात यह है कि दान सफल हो गया। शान्त लोग मारे गए, "कोई बचानेवाला न था", नगर जला, और विजेता वहाँ बस गए, नाम बदल दिया, और वह नाम सदियों तक चला। क्या इसका मतलब परमेश्वर ने उन्हें सही ठहराया? वृत्तान्त यह कहने से साफ़ इनकार करता है। वह "परमेश्वर ने उसे तुम्हारे हाथ में दे दिया है" को उद्धरण के रूप में रखता है, दावे के रूप में, न कि अपनी गवाही के रूप में। लेकिन वह एक छोटा वाक्यांश भी छोड़ जाता है: यह पुरोहिताई "देश की बँधुआई के समय" तक चली। यानी सज़ा आई, बस देर से। यह राहत नहीं देता। सवाल बना रहता है कि लैश के निर्दोष मरे हुए लोगों का हिसाब कहाँ है, और बाइबल यहाँ उसे खुला छोड़ देती है। कभी-कभी परमेश्वर की चुप्पी ही सबसे कड़ा फ़ैसला है।

पहले श्रोता

जो लोग यह अध्याय पहली बार सुन रहे थे, उनके लिए "दान" कोई अनजाना नाम नहीं था। वह उत्तर का प्रसिद्ध तीर्थस्थान था, जहाँ बाद में राजाओं ने भी पूजा-स्थल खड़ा किया, और "दान से बेर्शेबा तक" उनके लिए पूरे देश का नाप था। अब उन्हें बताया जा रहा था कि उस पवित्र जगह की जन्मकथा क्या है: एक गोत्र जो अपने भाग के लिए लड़ने से कतराया, एक चुराई हुई मूरत, एक बिका हुआ पुरोहित, और एक निहत्थे नगर का क़त्ल। और तीसवाँ पद के साथ जुड़ा संकेत उन्हें याद दिलाता था कि अश्शूर के आने पर सबसे पहले यही इलाका उजड़ा। श्रोता समझ गए कि उत्तर का पतन अचानक नहीं हुआ; उसकी नींव ही टेढ़ी रखी गई थी।

चिंतन

अगर कल वह चीज़ छिन जाए जिसके लिए आप सबसे ज़्यादा प्रार्थना करते हैं, तो क्या आपके मुँह से मीका का वाक्य निकलेगा, और यह आपके बारे में क्या बताता है?

आपके जीवन में वह कौन है जो "लैश" की तरह है, जिसे आपकी महत्वाकांक्षा की कीमत चुकानी पड़ रही है और जो इससे बेख़बर है?

Judges में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Judges For You

Timothy Keller

Keller shows how this dark book shines light on grace for flawed people.

Judges: Such a Great Salvation

Dale Ralph Davis

Brings the judges to life without taming the rough edges of the text.

The Message of Judges

Michael Wilcock

Steady guidance through the darkest chapters of Israel's story.

Judges and Ruth: An Introduction and Commentary

Arthur Cundall

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Judges, Ruth

K. Lawson Younger

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Judges 18 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

न्यायियों 18 का क्या अर्थ है?
मीका का एक वाक्य इस पूरे अध्याय का बोझ उठाता है: "तुम तो मेरे बनवाए हुए देवताओं और पुरोहित को ले चले हो; फिर मेरे पास क्या रह गया?" दान के गोत्र को अपना भाग नहीं मिला था, तो उन्होंने पाँच भेदियों को भेजा। रास्ते में वे मीका के घर रुके, उसके किराए के लेवीय पुरोहित से यात्रा की सफलता के बारे में पूछा, और उत्तर मिला: "कुशल से चले जाओ।" उत्तर में उन्होंने लैश को पाया, एक शान्त, निडर, अलग-थलग बसा नगर। छः सौ हथियारबंद लोग चल पड़े, लौटते हुए मीका की मूरतें और पुरोहित दोनों उठा ले गए, धमकी देकर मीका को चुप कराया, लैश को तलवार से काटकर जला दिया, और उस जगह का नाम दान रखकर वहाँ वही चुराई हुई मूरत खड़ी कर दी।
न्यायियों 18 किस विषय में है?
दान को उसका भाग दिया गया था; यहोशू की पुस्तक में उसकी सीमाएँ दर्ज हैं। समस्या अभाव की नहीं, विश्वास की थी। जो भाग परमेश्वर देते हैं उसे लड़ाई और धैर्य से लेना पड़ता है; जो भाग हम अपने लिए चुनते हैं उसे केवल कमज़ोर पड़ोसी पर हमला करके पाया जाता है। और ध्यान दें, अन्तिम पद बताता है कि इस पूरे समय "परमेश्वर का भवन शीलो में" मौजूद था। असली उपस्थिति उपलब्ध थी, मगर दान ने वह देवता चुना जिसे कंधे पर उठाकर ले जाया जा सके। यही उद्धार की कहानी का उलटा सिरा है। मसीह में परमेश्वर स्वयं आकर हमारे बीच डेरा खड़ा करते हैं, और वह पुरोहित जो न खरीदा जा सकता है न चुराया जा सकता है, हमें उठाता है; हम उसे नहीं उठाते।
न्यायियों 18 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज दस मिनट निकालें। कागज़ पर वह एक निर्णय लिखें जिसके लिए आप परमेश्वर से हरी झंडी चाह रहे हैं, और उसके नीचे यह प्रश्न लिखकर ज़ोर से पढ़ें: "यह सफल होगा या नहीं, यह छोड़िए; क्या यह उचित है, और इसकी कीमत कौन चुकाएगा?"
न्यायियों 18 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
सबसे असहज बात यह है कि दान सफल हो गया। शान्त लोग मारे गए, "कोई बचानेवाला न था", नगर जला, और विजेता वहाँ बस गए, नाम बदल दिया, और वह नाम सदियों तक चला। क्या इसका मतलब परमेश्वर ने उन्हें सही ठहराया? वृत्तान्त यह कहने से साफ़ इनकार करता है। वह "परमेश्वर ने उसे तुम्हारे हाथ में दे दिया है" को उद्धरण के रूप में रखता है, दावे के रूप में, न कि अपनी गवाही के रूप में। लेकिन वह एक छोटा वाक्यांश भी छोड़ जाता है: यह पुरोहिताई "देश की बँधुआई के समय" तक चली। यानी सज़ा आई, बस देर से। यह राहत नहीं देता। सवाल बना रहता है कि लैश के निर्दोष मरे हुए लोगों का हिसाब कहाँ है, और बाइबल यहाँ उसे खुला छोड़ देती है। कभी-कभी परमेश्वर की चुप्पी ही सबसे कड़ा फ़ैसला है।
न्यायियों 18 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
अगर कल वह चीज़ छिन जाए जिसके लिए आप सबसे ज़्यादा प्रार्थना करते हैं, तो क्या आपके मुँह से मीका का वाक्य निकलेगा, और यह आपके बारे में क्या बताता है?
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Judges 18 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

मीका के घर के पास आते ही उन लोगों ने उस जवान लेवीय की आवाज़ पहचान ली। आवाज़ तो वही थी, पर जगह गलत थी। वे पूछते हैं, "तुझे यहाँ कौन ले आया? और तू यहाँ क्या करता है? और यहाँ तेरे पास क्या है?"

ये तीन सवाल आज भी चुभते हैं। परमेश्वर की बुलाहट लेकर तू जहाँ खड़ा है, क्या वहाँ उसने तुझे भेजा था, या वेतन और सुविधा तुझे खींच लाई?

प्रार्थना संपादकीय पर पद 20

पिता, मेरा मन भी कभी उस ओर खिंच जाता है जहाँ ज़्यादा नाम, ज़्यादा सुरक्षा दिखती है। मुझे बचा ले, कहीं मैं तेरी बुलाहट छोड़कर भीड़ के पीछे न चल पड़ूँ। मेरे दिल की खुशी तेरे साथ चलने में हो, किसी और चीज़ में नहीं।

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