लूका 10:19
पाठ
सत्तर लौटे हैं, धूल भरे पाँव, चमकती आँखें, एक-दूसरे को काटती हुई आवाज़ें: "प्रभु, तेरे नाम से दुष्टात्मा भी हमारे वश में है।" उसी उछाल के बीच यीशु मसीह उन्हें रोकते नहीं, बल्कि उनकी खुशी को और गहरा कर देते हैं। वे कहते हैं कि जो हुआ वह कोई तुक्का नहीं था: "मैंने तुम्हें साँपों और बिच्छुओं को रौंदने का, और शत्रु की सारी सामर्थ्य पर अधिकार दिया है; और किसी वस्तु से तुम्हें कुछ हानि न होगी।" यानी उनके पास जो अधिकार है, वह उधार का है, दिया हुआ है, और उसका दायरा किसी एक चमत्कार तक सीमित नहीं, बल्कि "शत्रु की सारी सामर्थ्य" तक फैला है। अगले ही वाक्य में वे इस खुशी को और ऊपर उठा देंगे, पर पहले वे इसे पुष्ट करते हैं।
मूल मर्म
ध्यान दीजिए, वाक्य का कर्ता कौन है: "मैंने तुम्हें… दिया है।" शिष्यों ने कोई शक्ति खोजी नहीं, कमाई नहीं, किसी साधना से अर्जित नहीं की। वे बटुआ, झोली और जूते तक छोड़कर गए थे, खाली हाथ, और खाली हाथों में ही यह अधिकार रखा गया। यही इस पद का धर्मशास्त्रीय हृदय है: परमेश्वर का राज्य पहुँचता है तो केवल संदेश के रूप में नहीं, बल्कि सत्ता के हस्तांतरण के रूप में। जो शक्तियाँ मनुष्य को तोड़ती, बीमार करती और डराती रहीं, उनके ऊपर अब मसीह के भेजे हुए लोग खड़े हैं, इसलिए नहीं कि वे बलवान हैं, बल्कि इसलिए कि जिसने भेजा है वह शैतान को बिजली की तरह गिरते देख चुका है। अधिकार का स्रोत हमारे भीतर नहीं, हमें भेजनेवाले में है।
बड़ी कहानी का सूत्र
साँप और बिच्छू केवल जंगल के जीव नहीं हैं; बाइबल में साँप की छवि उस पहले बग़ीचे तक जाती है, जहाँ आदमी की एड़ी और साँप के सिर के बीच बैर ठहराया गया था। उत्पत्ति 3 की वह पुरानी प्रतिज्ञा यहाँ अचानक ज़मीन पर उतरती दिखती है: गलील के गाँवों से लौटे सत्तर साधारण लोग, और उनके पाँवों के नीचे वह सामर्थ्य जो सदियों से मनुष्य को कुचलती आई थी। यीशु मसीह यह अधिकार अपने पास नहीं रखते, बाँट देते हैं। यही मसीह के काम का ढंग है: वे जो जीतते हैं, उसे अकेले नहीं भोगते। क्रूस और पुनरुत्थान के बाद यह अधिकार कलीसिया तक फैलेगा, पर बीज यहीं पड़ चुका है, इस धूल भरी वापसी की शाम को, जब राज्य पहली बार अपने दूतों के पाँवों से बोलता है।
दर्पण
हम में से अधिकांश साँपों और बिच्छुओं से नहीं, बल्कि बहुत सभ्य दिखनेवाली शक्तियों से डरते हैं। बैंक का संदेश जो महीने के आख़िर में आता है। वह रिश्तेदार जिसकी एक टिप्पणी आपको तीन दिन तक बेचैन रखती है। डॉक्टर की रिपोर्ट जो अगले हफ़्ते आनी है। वह पुरानी आदत जो आपको लगता है आपसे बड़ी है। इन सबके सामने खड़े होकर हम अक्सर यह मानते हैं कि हमारे पास कोई अधिकार नहीं, केवल सहने की मजबूरी है। यह पद उस मजबूरी को चुनौती देता है, पर सस्ते आत्मविश्वास से नहीं। यह नहीं कहता कि आप ताक़तवर हैं; यह कहता है कि आपको अधिकार दिया गया है, और देनेवाला अब भी सिंहासन पर है।
आज एक काग़ज़ पर वह एक नाम लिखिए जिसकी सामर्थ्य आपके ऊपर सबसे भारी लगती है, फिर उसे हाथ में पकड़कर ऊँची आवाज़ में कहिए: "यह शत्रु की सामर्थ्य है, और इस पर अधिकार मुझे दिया गया है", और उसी काग़ज़ के साथ दो मिनट प्रार्थना कीजिए।
संदर्भ
यह दृश्य यीशु मसीह की यरूशलेम की ओर लंबी यात्रा के आरंभ में घटता है। उन्होंने सत्तर को दो-दो करके उन नगरों में भेजा था जहाँ वे स्वयं जानेवाले थे, बिना बटुए, बिना झोली, बिना जूते; यानी बिना किसी सुरक्षा-जाल के, पूरी तरह मेज़बानों की दया पर निर्भर। उस समाज में यह भारी जोखिम था: अजनबी गाँव, संदेहभरी नज़रें, और यदि कोई द्वार न खुले तो रात खुले में। उन्हें साफ़ चेतावनी मिली थी कि वे भेड़ों की तरह भेड़ियों के बीच जा रहे हैं। अब वे लौटे हैं, ज़िंदा, और कुछ ऐसा लेकर लौटे हैं जिसकी उन्हें उम्मीद नहीं थी। यीशु मसीह का यह वचन किसी शांत कक्षा में नहीं, बल्कि इस हाँफती हुई, चमकती हुई वापसी के ठीक बीच में बोला गया है।
एक बारीकी
"रौंदने" शब्द पर ठहरिए। यह चोट पहुँचाने या भगाने की बात नहीं है; यह पाँव रखकर आगे बढ़ जाने की भाषा है। जो चीज़ रौंदी जाती है, वह रास्ते की रुकावट नहीं रह जाती, वह रास्ता बन जाती है। बिच्छू फ़िलिस्तीन के पथरीले इलाकों में असली ख़तरा था; नंगे पाँव चलनेवाला किसान उससे सचमुच डरता था। यीशु मसीह उस डर को हटाते नहीं, उसे पाँवों के नीचे रख देते हैं। और ध्यान दीजिए, यह क्रिया चलने से जुड़ी है: यह अधिकार बैठे-बैठे भोगने की वस्तु नहीं, भेजे जाने पर मिलनेवाली चीज़ है। जो घर पर रहता है उसे रौंदने के लिए कुछ नहीं मिलता। अधिकार मिशन के भीतर काम करता है, उसके बाहर नहीं।
मुख्य पात्र
इस दृश्य में सबसे दिलचस्प चेहरा शिष्यों का नहीं, यीशु मसीह का है। वे उत्साहित लोगों को ठंडा नहीं करते, न ही उन्हें फुला देते हैं। पहले वे उनकी खुशी की पुष्टि करते हैं: हाँ, जो तुमने देखा वह सच था, और उससे कहीं बड़ा था। फिर, अगले ही वाक्य में, वे उस खुशी की जड़ बदल देंगे। यहाँ एक शिक्षक दिखता है जो जानता है कि सफलता कितनी जल्दी नशा बन जाती है, और फिर भी जो अपने लोगों की पहली सच्ची जीत को छोटा नहीं करता। साथ ही यहाँ वह दिखता है जिसने शैतान को बिजली की तरह गिरते देखा है: एक ऐसी दृष्टि जो इतिहास के ऊपर से देखती है, और जिसके पास बाँटने के लिए अपना अधिकार है।
शास्त्र के भीतर की गूँज
पीछे भजन संहिता 91 खड़ा है, वह भजन जिसमें परमेश्वर पर भरोसा रखनेवाले के लिए सिंह और साँप को पाँवों के नीचे कुचलने की बात कही गई है। पहले सुननेवालों के कानों में यह गूँज तुरंत बजी होगी, और उसके साथ एक झटका भी: वह प्रतिज्ञा जो कभी भरोसे की कविता थी, अब एक जीवित व्यक्ति के मुँह से, वर्तमान काल में, उन्हें सौंपी जा रही है। दूसरी गूँज इसी अध्याय के भीतर है: "मैं तुम्हें भेड़ों के समान भेड़ियों के बीच में भेजता हूँ।" भेड़ें, और फिर भी रौंदनेवाले पाँव। बाइबल इस विरोधाभास को सुलझाती नहीं; वह उसे साथ-साथ रखती है, क्योंकि मसीह की सामर्थ्य कमज़ोरी को हटाकर नहीं, उसके भीतर काम करती है।
पहले श्रोता
लूका जिनके लिए लिख रहा था, वे रोमी साम्राज्य में फैली छोटी-छोटी मंडलियाँ थीं: कुछ यहूदी, बहुत सारे ग़ैर-यहूदी, अधिकतर बिना नाम, बिना ओहदा, कई गुलाम। उनकी दुनिया आत्माओं, जादू-टोने, शाप और ताबीज़ों से भरी थी; और उनके ऊपर एक ऐसी सत्ता थी जो किसी भी दिन उन्हें अदालत में घसीट सकती थी। जब उन्होंने यह पद सुना होगा, तो उन्हें कोई रूपक नहीं सुनाई दिया होगा, बल्कि एक ठोस घोषणा: जिन शक्तियों के आगे तुम्हारा पड़ोस काँपता है, उन पर तुम्हारे प्रभु ने तुम्हें अधिकार दिया है। और यह अधिकार सम्राट से नहीं, मंदिर से नहीं, किसी मंत्र से नहीं, बल्कि उस भेजनेवाले से आया है जिसे उन्होंने कभी आँखों से नहीं देखा।
कठिन प्रश्न
"किसी वस्तु से तुम्हें कुछ हानि न होगी।" यह वाक्य ईमानदार पाठक के गले में अटकता है। स्तिफनुस पर पत्थर बरसे। पौलुस की पीठ पर कोड़ों के निशान थे। आज भी विश्वासी कैंसर से, अकाल से, हिंसा से मरते हैं। तो क्या यह प्रतिज्ञा टूट गई? दो बातें कहनी पड़ेंगी, और दोनों अधूरी लगेंगी। पहली: यह वचन उसी मुँह से आया जिसने कुछ ही देर पहले कहा था कि वह उन्हें भेड़ियों के बीच भेज रहा है। यीशु मसीह ख़तरे से इनकार नहीं कर रहे; वे उसकी अंतिम सत्ता से इनकार कर रहे हैं। दूसरी: अगला ही पद बताता है कि असली सुरक्षा कहाँ लिखी है, स्वर्ग में दर्ज नामों में, न कि चोट से बच निकलने में। इससे दर्द कम नहीं होता। पर इससे यह तय हो जाता है कि दर्द के पास आख़िरी शब्द नहीं है। बाक़ी हमें भरोसे में छोड़ना पड़ता है, समझ में नहीं।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन में इस समय कौन-सी "सामर्थ्य" है जिसके आगे आप बिना सोचे झुक जाते हैं, और क्या आपने कभी उस पर मिले हुए अधिकार को गंभीरता से लिया है?
सत्तर को यह अधिकार भेजे जाने पर मिला था, बैठे रहने पर नहीं। आपके जीवन में वह "भेजा जाना" इस समय किस रूप में है?
जब प्रार्थना का उत्तर नहीं मिलता और हानि सचमुच पहुँचती है, तब आप इस पद के साथ क्या करते हैं: उसे टाल देते हैं, या उसके सामने ईमानदारी से खड़े होते हैं?
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Luke 10:19 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
लूका 10:19 का क्या अर्थ है?
लूका 10:19 किस विषय में है?
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लूका 10:19 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Luke 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
शास्त्री ने परखने के लिए सवाल पूछा, और यीशु ने जवाब देने के बजाय पलटकर पूछा, "व्यवस्था में क्या लिखा है? तू कैसे पढ़ता है?" उसे नई जानकारी की ज़रूरत नहीं थी, वचन तो उसे याद था। कमी पढ़ने के ढंग में थी। आज भी सवाल यही है। तू बाइबल पढ़ता तो है, पर कैसे पढ़ता है? बहस जीतने के लिए, या जीने के लिए?
यीशु ने क्रम बताया: पहले चंगा करो, फिर कहो। "वहाँ के बीमारों को चंगा करो और उनसे कहो, 'परमेश्वर का राज्य तुम्हारे निकट आ पहुँचा है।'" राज्य पहले छुआ गया, फिर सुनाया गया। आपके पड़ोसी के लिए वह राज्य उतना ही निकट है, जितना आप उसके दुःख के पास बैठने को तैयार हैं। शब्द बाद में भी मिल जाएँगे।
याजक और लेवी ने भी उसे देखा था। फर्क आँखों में नहीं, दिल में था। "परन्तु एक सामरी यात्री वहाँ आ निकला, और उसे देखकर तरस खाया।" उस सामरी को भी कहीं पहुँचना था, पर उसने अपनी यात्रा रोक दी। आज कौन सा घायल व्यक्ति तेरे रास्ते में पड़ा है, जिसे तू देख तो रहा है, पर रुक नहीं रहा?
पिता, धन्यवाद कि आपने प्रेम को इतना साफ कर दिया: "तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख; और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।" धन्यवाद कि आपने पहले हमसे प्रेम किया, इसलिए हमारे पास देने को प्रेम है। और धन्यवाद उस पड़ोसी के लिए जिसे आपने आज हमारे पास रखा।
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