लूका 10:25
पाठ
यीशु अभी-अभी अपने चेलों से एकान्त में कह चुके हैं कि धन्य हैं वे आँखें जो यह सब देखती हैं, जिसे बहुत से भविष्यद्वक्ता और राजा देखना चाहते थे पर न देख सके। ठीक उसी क्षण भीड़ में से एक व्यवस्थापक खड़ा होता है। वह शास्त्र का जानकार है, व्यवस्था उसकी रोज़ी और उसकी पहचान दोनों है। वह यीशु को "हे गुरु" कहकर संबोधित करता है, पर लूका हमें साफ़ बता देता है कि उसके मन में क्या चल रहा था: वह "उसकी परीक्षा करने लगा।" और फिर वह सवाल आता है जो पूरे अध्याय का रुख़ मोड़ देता है: "अनन्त जीवन का वारिस होने के लिये मैं क्या करूँ?" एक ही वाक्य में आदर, चुनौती और गहरी बेचैनी, तीनों घुले हुए हैं।
मूल बात
इस आदमी के अपने शब्दों में ही एक दरार है, और शायद उसे इसका पता भी नहीं। वह "वारिस" होना चाहता है, पर पूछता है "मैं क्या करूँ"। वारिस कोई अपनी मेहनत से नहीं बनता; वारिस तो जन्म से, रिश्ते से, पिता की इच्छा से बनता है। विरासत कमाई नहीं जाती, सौंपी जाती है। फिर भी वह उसी साँस में एक ऐसा काम खोज रहा है जो उसे यह अधिकार दिला दे। यही मनुष्य की सबसे पुरानी और सबसे सम्मानित बीमारी है: परमेश्वर के सामने खाली हाथ खड़े होने से बचने के लिए हम कोई न कोई काम ढूँढ़ते हैं, कोई सूची, कोई शर्त, कोई नापने का पैमाना। यीशु इस दरार पर तुरंत हथौड़ा नहीं मारते। वे उसे व्यवस्था की ओर लौटाते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि जो अपने करने पर भरोसा रखता है, उसे पहले अपने करने की हद तक पहुँचना ज़रूरी है।
जोड़नेवाला सूत्र
"अनन्त जीवन का वारिस होने के लिये मैं क्या करूँ?" यह सवाल पूरे पुराने नियम की धड़कन है। इस्राएल को देश विरासत में मिला था, कमाई में नहीं; अब्राहम को वचन दिया गया था, उसने उसे अर्जित नहीं किया था। फिर भी व्यवस्था के भीतर एक सच्ची शर्त भी थी, और यीशु उसे छिपाते नहीं: "यही कर तो तू जीवित रहेगा।" व्यवस्था झूठ नहीं बोलती। वह सचमुच जीवन का रास्ता है, बशर्ते कोई उसे पूरी तरह चल सके। यहीं पर मसीह खड़े हैं, उस सवाल के ठीक बीच में जिसका जवाब वे स्वयं हैं। जो आदमी पूछ रहा है "मैं क्या करूँ", वह उस व्यक्ति से पूछ रहा है जो उसके लिए वह सब करने जा रहा है जो वह कभी नहीं कर पाएगा। और आगे चलकर यीशु जो कहानी सुनाते हैं, उसमें पड़ोसी वह नहीं जो घायल की मदद करता है, बल्कि वह जो एक अधमरे आदमी के पास आता है जब कोई और नहीं आया। यह विरासत की तस्वीर है, कमाई की नहीं।
दर्पण
आप भी यह सवाल पूछते हैं, बस दूसरे शब्दों में। "क्या मैं काफ़ी कर रहा हूँ?" रविवार की सेवकाई के बाद, बच्चों को डाँटने के बाद, महीने के अंत में दान की रसीद देखते हुए, या रात को जब नींद नहीं आती और आप अपने दिन का हिसाब लगाते हैं। यह सवाल भक्ति जैसा लगता है, पर अक्सर यह डर है जो धर्म का चोला पहनकर आता है। ध्यान दीजिए, व्यवस्थापक ने यह नहीं पूछा कि परमेश्वर कौन हैं; उसने पूछा कि उसे क्या करना है। उसका केंद्र वह स्वयं था। और शायद आपका भी है। आप परमेश्वर के सामने खाली हाथ खड़े होने से इतना डरते हैं कि हर प्रार्थना में कोई न कोई उपलब्धि साथ ले जाते हैं, ताकि बातचीत बराबरी की लगे। पर वारिस बराबरी पर नहीं खड़ा होता; वह बस बेटा या बेटी होता है।
आज एक कागज़ पर वे तीन काम लिखिए जिनके बल पर आप चुपचाप परमेश्वर के सामने खुद को स्वीकार्य मानते हैं। फिर उन तीनों के ऊपर बड़े अक्षरों में लिखिए "वारिस", और वह कागज़ लेकर ज़ोर से कहिए: "यह विरासत है, मज़दूरी नहीं।"
मुख्य पात्र
यह व्यवस्थापक मूर्ख नहीं है और न ही दुष्ट। वह शास्त्र जानता है, इतना कि अगले ही पल वह व्यवस्था का सार बिना अटके बोल देता है। उसकी समस्या ज्ञान की कमी नहीं, नीयत की बनावट है। लूका कहते हैं कि वह "परीक्षा करने लगा", यानी वह सीखने नहीं, जाँचने आया था। वह यीशु के ऊपर खड़ा रहना चाहता है, नीचे बैठना नहीं। और यह वही आदमी है जो थोड़ी देर बाद "अपने आपको धर्मी ठहराने की इच्छा से" दूसरा सवाल पूछेगा। यही उसका असली रोग है: खुद को सही साबित करने की भूख। उसके भीतर एक बेचैनी ज़रूर है, वरना वह उठता ही नहीं; पर वह बेचैनी उसे घुटनों तक नहीं, बहस तक ले जाती है। हम में से कितने ऐसे ही हैं, बाइबल खोलकर बैठे, पर पहले से तय कर चुके कि हमें क्या सुनना है।
कठिन सवाल
यीशु उसे सीधे अनुग्रह क्यों नहीं बताते? "यही कर तो तू जीवित रहेगा" सुनने में तो ऐसा लगता है मानो उद्धार कामों से मिलता हो। यह टालने लायक बात नहीं। यीशु उस आदमी को उसी की शर्तों पर पकड़ते हैं, क्योंकि जो अपने करने पर भरोसा रखता है, उसे उपदेश नहीं, आईना चाहिए। "सारे मन, सारे प्राण, सारी शक्ति और सारी बुद्धि" से प्रेम, यह कोई ऐसा पैमाना नहीं जिसे कोई पार कर सके। यीशु का "हाँ, यही कर" दरअसल एक दरवाज़ा है जो उस आदमी को अपनी असमर्थता तक ले जाता है। पर ईमानदारी से कहें तो पाठ हमें यह नहीं बताता कि वह आदमी अंत में समझा या नहीं। लूका उसे अधूरा छोड़ देते हैं, शायद इसलिए कि हम उसकी जगह खड़े होकर खुद जवाब दें।
अन्य शास्त्रवचन
व्यवस्थापक जिस आज्ञा को दोहराता है, वह व्यवस्थाविवरण 6 की है, इस्राएल की रोज़ की प्रार्थना, जो हर बच्चे को कंठस्थ थी। यानी उसने कुछ नया नहीं कहा; उसने वही बोला जो वह जीवन भर से बोलता आया था। जानना और जीना के बीच की यह खाई ही पूरे अध्याय का घाव है। और ठीक इसी अध्याय के अंत में मरियम यीशु के "पाँवों के पास बैठकर उसका वचन सुनती थी", जबकि मार्था "बहुत बातों के लिये चिन्ता करती और घबराती" है। व्यवस्थापक, मार्था और वह सामरी, तीनों एक ही सवाल के तीन जवाब हैं। एक बहस करता है, एक भागदौड़ करती है, और एक चुपचाप सुनती है। यीशु कहते हैं कि "उत्तम भाग" सुनने वाली ने चुना है।
मनन के प्रश्न
आपकी प्रार्थनाओं में कितनी बार "मैं क्या करूँ" आता है, और कितनी बार "आप कौन हैं"?
वह कौन सा काम है जिसे आप चुपके से परमेश्वर के सामने अपनी योग्यता की तरह पेश करते हैं?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
याजक और लेवी ने भी उसे देखा था। फर्क आँखों में नहीं, दिल में था। "परन्तु एक सामरी यात्री वहाँ आ निकला, और उसे देखकर तरस खाया।" उस सामरी को भी कहीं पहुँचना था, पर उसने अपनी यात्रा रोक दी। आज कौन सा घायल व्यक्ति तेरे रास्ते में पड़ा है, जिसे तू देख तो रहा है, पर रुक नहीं रहा?
पिता, धन्यवाद कि आपने प्रेम को इतना साफ कर दिया: "तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख; और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।" धन्यवाद कि आपने पहले हमसे प्रेम किया, इसलिए हमारे पास देने को प्रेम है। और धन्यवाद उस पड़ोसी के लिए जिसे आपने आज हमारे पास रखा।
व्यवस्थापक ने पूछा था, "मेरा पड़ोसी कौन है?" पर यीशु ने सवाल उलट दिया, "इन तीनों में से उसका पड़ोसी कौन हुआ?" ध्यान दे, वह पूछते हैं कौन पड़ोसी *बना*। पड़ोसी कोई श्रेणी नहीं, एक फैसला है। सड़क किनारे पड़े उस आदमी की सूची में तू है या नहीं, यह तेरे रुकने से तय होगा।
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