लूका 14
पाठ
एक सब्त के दिन यीशु किसी फरीसी सरदार के घर रोटी खाने जाते हैं, और लूका बिना लाग-लपेट के बता देता है कि वहाँ का माहौल क्या था: "वे उसकी घात में थे।" उसी मेज़ के सामने जलोदर से फूला हुआ एक आदमी खड़ा है; यीशु पूछते हैं, चंगा करना उचित है या नहीं, और कोई उत्तर नहीं देता। इसके बाद पूरा अध्याय एक ही मेज़ के इर्द-गिर्द घूमता रहता है: कौन ऊँची जगह चुनता है, कौन किसे नेवता देता है, कौन बड़े भोज में आने से इनकार कर देता है, और आख़िर में भीड़ से यह कड़ी बात, कि जो अपना क्रूस उठाकर पीछे न चले, वह चेला नहीं हो सकता। भोजन, निमन्त्रण, और क़ीमत। तीनों एक साथ।
मूल मर्म
इस अध्याय में परमेश्वर एक मेज़बान की तरह सामने आते हैं, और यही इसकी जड़ है। वे भोज तैयार करते हैं, दास भेजते हैं, और जब आमन्त्रित लोग बहाने बनाते हैं तो वे भोज रद्द नहीं करते; वे दरवाज़ा और चौड़ा कर देते हैं। "फिर भी जगह है" – इस छोटे से वाक्य में अनुग्रह की पूरी धड़कन सुनाई देती है। परमेश्वर का राज्य किसी योग्यता की सीढ़ी नहीं, एक खुली मेज़ है, जहाँ बुलाए जाने का आधार यह नहीं कि आप बदला चुका सकते हैं या नहीं; बल्कि ठीक इसलिए कि आपके पास "बदला देने को कुछ नहीं" है। पर उसी साँस में यीशु कहते हैं कि इस मेज़ तक पहुँचने का रास्ता अपने सब कुछ को छोड़ने से होकर जाता है। मुफ़्त निमन्त्रण, और फिर भी सब कुछ माँग लेने वाला। यह विरोधाभास सुलझाने की चीज़ नहीं, इसके भीतर बैठने की चीज़ है। शायद इसीलिए, क्योंकि जो सचमुच खाली हाथ आता है, उसके पास त्यागने को कुछ बचता ही नहीं।
जोड़ने वाला सूत्र
पवित्रशास्त्र में परमेश्वर की कहानी बार-बार एक मेज़ पर आकर ठहरती है। यशायाह ने पहले ही देख लिया था कि एक दिन परमेश्वर सब जातियों के लिये पहाड़ पर उत्तम भोजन की दावत करेंगे; इस्राएल की आशा किसी अमूर्त स्वर्ग की नहीं, एक भोज की आशा थी। यीशु उसी आशा को उठाकर उस कमरे में रख देते हैं जहाँ लोग उनकी घात में बैठे हैं, और कहते हैं: भोजन तैयार है, अभी। और फिर वे स्वयं वही करते हैं जो दृष्टान्त में सिखाया: सबसे नीची जगह ले लेते हैं। ऊपरी कमरे में, अपनी मृत्यु की रात, वे रोटी तोड़ते हैं और सेवक बनकर बैठते हैं। जो कहता है "जो कोई अपने आपको छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा," वह पहले खुद उस रास्ते से चलकर गया। क्रूस, आख़िरकार, सबसे नीची जगह है।
दर्पण
हम मेज़ की जगहों को लेकर उतने ही सजग हैं जितने वे लोग थे, बस हमारी मेज़ें बदल गई हैं: बैठक में किसकी बात सबसे पहले सुनी जाती है, किसका नाम प्रोजेक्ट के साथ जुड़ता है, चर्च में कौन मंच के पास बैठता है। और वह दूसरी बात तो और चुभती है, कि किसे बुलाया जाए। अपनी पिछली दावत की सूची याद कीजिए। क्या उसमें कोई ऐसा था जो कभी लौटाकर नहीं बुला सकता? हम "धनवान पड़ोसियों" को बुलाते हैं क्योंकि सम्बन्ध चुकता होते रहें, हिसाब बराबर रहे। यीशु उस पूरे अर्थशास्त्र को तोड़ देते हैं। और बहाने? खेत, बैल, विवाह; कोई पाप नहीं, सब जायज़। ईएमआई, नई नौकरी, बच्चों की परीक्षा। राज्य से हमें प्रायः बुराई नहीं, हमारी अच्छी और व्यस्त ज़िन्दगी दूर रखती है।
पहले सुनने वाले
उस घर में बैठे लोग जानते थे कि भोज सिर्फ़ खाना नहीं था; वह इज़्ज़त का सार्वजनिक हिसाब था। मेज़ पर बैठने का क्रम बताता था कि समाज में आपका दर्जा क्या है, और किसी को उठाकर नीचे बिठा देना जीवन भर की शर्म थी। इसीलिए यीशु की सलाह उन्हें केवल विनम्रता का उपदेश नहीं, उनकी पूरी सामाजिक व्यवस्था पर चोट लगी। और जब उन्होंने सुना कि "कंगालों, टुण्डों, लँगड़ों और अंधों" को बुलाओ, तो उनके कानों में मन्दिर के वे नियम गूँजे जिनके अनुसार ऐसे लोग पवित्र स्थानों से दूर रखे जाते थे। यीशु उन्हीं को मुख्य अतिथि बना रहे हैं। लूका के ग़ैर-यहूदी पाठकों ने "सड़कों पर और बाड़ों की ओर" शब्दों में अपना ही पता सुना होगा।
कठिन प्रश्न
"अपने पिता और माता और पत्नी और बच्चों… वरन् अपने प्राण को भी अप्रिय न जाने।" इसे नरम करना आसान है: कह दीजिए कि यह सामी भाषा का मुहावरा है, तुलनात्मक बात है, "कम प्रेम करना।" यह सच भी है। पर यीशु ने कोमल शब्द चुना नहीं। उन्हें पता था कि उनके पीछे चलने से घर टूटेंगे, कि किसी को अपने पिता के विरुद्ध खड़ा होना पड़ेगा। जो व्यक्ति परिवार को परमेश्वर की देन कहता है, वही उससे ऊपर अपना दावा रखता है, और यह दावा या तो अहंकार की पराकाष्ठा है या फिर वे सचमुच वही हैं जो होने का संकेत देते हैं। तीसरा विकल्प नहीं है। शायद इस वचन के साथ बैठना ही इसका सही उत्तर है, इसे हल कर देना नहीं।
केन्द्रीय व्यक्ति
पूरे अध्याय में यीशु देखे जा रहे हैं और देख रहे हैं। वे जानते हैं कि यह भोज एक जाल है, फिर भी वे भीतर जाकर बैठते हैं, विरोधियों के साथ रोटी खाते हैं। बीमार आदमी को चंगा करने से पहले वे पूछते हैं, और मौन का सामना करते हैं; उस मौन में कितनी थकान रही होगी। चंगाई के बाद वे उसे "जाने दिया", बिना तमाशे के। फिर वे मेज़बान को भी नहीं बख़्शते, मेहमानों को भी नहीं, और बाहर निकलकर भीड़ को भी नहीं, जबकि भीड़ उनके साथ चल रही थी और किसी भी प्रचारक के लिये यह सबसे मीठा क्षण होता है। वे भीड़ बढ़ाने के बजाय क़ीमत बताते हैं। यह वह मेज़बान है जो दरवाज़ा सबसे चौड़ा खोलता है और सच्चाई सबसे कम छिपाता है।
मनन के प्रश्न
पिछले महीने आपकी मेज़ पर कौन बैठा, और उनमें से कौन आपको कभी लौटाकर कुछ नहीं दे सकता?
"फिर भी जगह है" – यह सुनकर आपके मन में पहले राहत उठती है या बेचैनी, और क्यों?
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