बाइबल व्याख्या

लूका 5:32

बाइबल
यह वचन GCF MISSION INDIA FOUNDATION द्वारा समर्पित है

पाठ

लेवी के घर भोज चल रहा है, मेज़ पर चुंगी लेनेवाले और "पापी" बैठे हैं, और धर्म के विशेषज्ञ बाहर खड़े कुड़कुड़ा रहे हैं। यीशु उनकी शिकायत का उत्तर दो वाक्यों में देते हैं: "वैद्य भले चंगों के लिये नहीं, परन्तु बीमारों के लिये अवश्य है। मैं धर्मियों को नहीं, परन्तु पापियों को मन फिराने के लिये बुलाने आया हूँ।" यानी, जहाँ बीमारी है वहीं वैद्य का काम है; और जिन्हें अपनी बीमारी का पता है, वही उसे बुलाते हैं। यीशु अपने जीवन के उद्देश्य को एक वाक्य में बाँध देते हैं, और वह उद्देश्य उन लोगों की ओर मुड़ा हुआ है जिन्हें समाज ने मेज़ से हटा रखा था।

मर्म

यह वचन परमेश्वर के बारे में एक ऐसी बात कहता है जो हमें सहज नहीं लगती: वे योग्यता के आधार पर नहीं, आवश्यकता के आधार पर आते हैं। हम सोचते हैं कृपा उसे मिलती है जो उसके लायक बनने की कोशिश करे। यीशु कहते हैं कृपा उसे मिलती है जो स्वीकार करे कि वह लायक नहीं। और यहाँ एक काँटा छिपा है: अगर आप सचमुच धर्मी हैं, तो यीशु आपके लिए नहीं आए। वे व्यंग्य कर रहे हैं, क्योंकि फरीसी बीमार हैं और जानते नहीं। बुलाहट का दरवाज़ा इतना नीचा है कि वहाँ से केवल झुककर घुसा जा सकता है। घमंड सीधा खड़ा रहकर बाहर ही रह जाता है। और "मन फिराने के लिये" जोड़कर यीशु यह भी साफ़ कर देते हैं कि यह बुलाहट पाप को सहलाती नहीं, उसे बदलती है।

सूत्र

पूरे पुराने नियम में परमेश्वर उन्हीं के पास जाते हैं जो गिने नहीं जाते: भागी हुई हाजिरा, छोटा दाऊद, निर्वासित इस्राएल। यहेजकेल 34 में परमेश्वर कहते हैं कि वे खोई हुई भेड़ को ढूँढ़ेंगे और घायल को बाँधेंगे, जबकि इस्राएल के चरवाहे मोटी भेड़ों की देखभाल करते रहे। लूका 5 में वही चरवाहा देह धरकर एक चुंगी लेनेवाले की मेज़ पर बैठा है। यही सूत्र क्रूस तक खिंचता है, जहाँ वही "वैद्य" रोगियों के साथ नहीं, रोगियों के स्थान पर मरते हैं। इसीलिए यह वचन केवल यीशु की रणनीति नहीं, पूरे छुटकारे के इतिहास की दिशा है: परमेश्वर हमेशा नीचे की ओर चलते हैं, और वहीं राज्य की शुरुआत होती है।

दर्पण

अब ईमानदारी से: आप इस कहानी में कहाँ बैठे हैं, मेज़ पर या दरवाज़े के बाहर? दरवाज़े के बाहर खड़ा होना बहुत धार्मिक दिखता है। वह तब दिखता है जब आप अपने जवान बेटे की "आजकल की जीवनशैली" पर मन ही मन निर्णय सुनाते हैं, जब दफ़्तर के उस सहकर्मी के पतन की ख़बर पर भीतर कहीं एक हल्की संतुष्टि उठती है, जब आप प्रार्थना में परमेश्वर को अपनी नियमितता याद दिलाते हैं। और डर यह है कि अगर आप अपनी असली हालत मान लें, तो शायद परमेश्वर हट जाएँ, जैसे पतरस ने सोचा था। पर यीशु ने पतरस के पास से हटने से इनकार कर दिया। आपकी बीमारी वैद्य को भगाती नहीं, बुलाती है।

आज, दस मिनट में, किसी के सामने ज़ोर से बोलकर नहीं, परमेश्वर के सामने अकेले में एक वाक्य कहिए: "प्रभु, मैं बीमार हूँ," और उसके बाद अपने उस एक पाप का नाम लीजिए जिसे आप सालों से "कमज़ोरी" कहकर ढाँपते आए हैं। नाम लीजिए, बहाना नहीं।

श्रोता

लूका जिनके लिए लिख रहा था, उनमें बहुत से गैर-यहूदी थे, वे लोग जिन्हें यहूदी धर्म की सीमाओं के किनारे खड़ा रहने की आदत थी। उनके कानों में यह वाक्य राहत की साँस की तरह गिरा होगा: मसीह उन्हीं को बुलाने आए जिन्हें कोई नहीं बुलाता। पर जो यहूदी विश्वासी इस सुसमाचार को पढ़ रहे थे, उनके लिए यह चुभन थी, क्योंकि "धर्मी" शब्द उनके समाज में एक सम्मानित वर्ग का नाम था, न कि मज़ाक का। पहली सदी की कलीसिया में सबसे गरम बहस यही थी: मेज़ पर कौन बैठ सकता है? लूका इस वचन को वहीं रखता है जहाँ वह सबसे अधिक दुखता है, एक भोज की मेज़ पर।

संदर्भ

गलील, रोमी शासन के अधीन, जहाँ चुंगी लेनेवाला अपने ही लोगों से रोम के लिए पैसा वसूलता था और ऊपर से अपना हिस्सा भी। वह केवल बेईमान नहीं, देशद्रोही माना जाता था; आराधनालय में उसकी गवाही मान्य नहीं थी। और भोजन उस संस्कृति में पेट भरने का मामला नहीं, पहचान का मामला था। जिसके साथ आप खाते हैं, आप उसके हैं। इसीलिए फरीसी यीशु के चेलों से शिकायत करते हैं, सीधे यीशु से नहीं; वे मर्यादा में रहकर वार करते हैं। और ध्यान दीजिए, यह दृश्य उस अध्याय में है जहाँ पहले कोढ़ी को छुआ गया और फिर लकवे के रोगी के पाप क्षमा हुए। लूका एक ही बात तीन बार दिखा रहा है।

विवरण

"बुलाने" शब्द पर रुकिए। यूनानी में यही शब्द, कालेओ, भोज में निमंत्रण देने के लिए इस्तेमाल होता था। यीशु लेवी के भोज में बैठे हुए कहते हैं कि वे बुलाने आए हैं, और सुननेवाला समझ जाता है कि यह अदालत की तलब नहीं, मेज़ का निमंत्रण है। परमेश्वर का राज्य यहाँ एक नियम-पुस्तिका नहीं, एक खुला द्वार है जहाँ से खाने की ख़ुशबू आ रही है। पर निमंत्रण के साथ एक शर्त जुड़ी है: "मन फिराने के लिये।" आप जैसे हैं वैसे बुलाए जाते हैं, पर जैसे हैं वैसे छोड़े नहीं जाते। लेवी ने "सब कुछ छोड़कर" जवाब दिया, और फिर अपना घर खोल दिया। निमंत्रण स्वीकारने का यही आकार है।

चिंतन

आप अपने भीतर किस व्यक्ति के बारे में चुपचाप यह मानते हैं कि वह "वैसा" है, और क्या आप इस हफ़्ते उसके साथ एक बार खाना खा सकते हैं?

अगर यीशु आज आपके घर भोज में बैठें, तो आप किन लोगों को बुलाने में शर्मिंदगी महसूस करेंगे, और वह शर्मिंदगी आपके बारे में क्या कहती है?

Luke में और गहराई से जानें

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Luke For Everyone

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Warm, readable commentary on the Gospel for outsiders and doubters.

The Message of Luke

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Luke 5:32 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

लूका 5:32 का क्या अर्थ है?
लेवी के घर भोज चल रहा है, मेज़ पर चुंगी लेनेवाले और "पापी" बैठे हैं, और धर्म के विशेषज्ञ बाहर खड़े कुड़कुड़ा रहे हैं। यीशु उनकी शिकायत का उत्तर दो वाक्यों में देते हैं: "वैद्य भले चंगों के लिये नहीं, परन्तु बीमारों के लिये अवश्य है। मैं धर्मियों को नहीं, परन्तु पापियों को मन फिराने के लिये बुलाने आया हूँ।" यानी, जहाँ बीमारी है वहीं वैद्य का काम है; और जिन्हें अपनी बीमारी का पता है, वही उसे बुलाते हैं। यीशु अपने जीवन के उद्देश्य को एक वाक्य में बाँध देते हैं, और वह उद्देश्य उन लोगों की ओर मुड़ा हुआ है जिन्हें समाज ने मेज़ से हटा रखा था।
लूका 5:32 किस विषय में है?
पूरे पुराने नियम में परमेश्वर उन्हीं के पास जाते हैं जो गिने नहीं जाते: भागी हुई हाजिरा, छोटा दाऊद, निर्वासित इस्राएल। यहेजकेल 34 में परमेश्वर कहते हैं कि वे खोई हुई भेड़ को ढूँढ़ेंगे और घायल को बाँधेंगे, जबकि इस्राएल के चरवाहे मोटी भेड़ों की देखभाल करते रहे। लूका 5 में वही चरवाहा देह धरकर एक चुंगी लेनेवाले की मेज़ पर बैठा है। यही सूत्र क्रूस तक खिंचता है, जहाँ वही "वैद्य" रोगियों के साथ नहीं, रोगियों के स्थान पर मरते हैं। इसीलिए यह वचन केवल यीशु की रणनीति नहीं, पूरे छुटकारे के इतिहास की दिशा है: परमेश्वर हमेशा नीचे की ओर चलते हैं, और वहीं राज्य की शुरुआत होती है।
लूका 5:32 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज, दस मिनट में, किसी के सामने ज़ोर से बोलकर नहीं, परमेश्वर के सामने अकेले में एक वाक्य कहिए: "प्रभु, मैं बीमार हूँ," और उसके बाद अपने उस एक पाप का नाम लीजिए जिसे आप सालों से "कमज़ोरी" कहकर ढाँपते आए हैं। नाम लीजिए, बहाना नहीं।
लूका 5:32 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
गलील, रोमी शासन के अधीन, जहाँ चुंगी लेनेवाला अपने ही लोगों से रोम के लिए पैसा वसूलता था और ऊपर से अपना हिस्सा भी। वह केवल बेईमान नहीं, देशद्रोही माना जाता था; आराधनालय में उसकी गवाही मान्य नहीं थी। और भोजन उस संस्कृति में पेट भरने का मामला नहीं, पहचान का मामला था। जिसके साथ आप खाते हैं, आप उसके हैं। इसीलिए फरीसी यीशु के चेलों से शिकायत करते हैं, सीधे यीशु से नहीं; वे मर्यादा में रहकर वार करते हैं। और ध्यान दीजिए, यह दृश्य उस अध्याय में है जहाँ पहले कोढ़ी को छुआ गया और फिर लकवे के रोगी के पाप क्षमा हुए। लूका एक ही बात तीन बार दिखा रहा है।
लूका 5:32 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आप अपने भीतर किस व्यक्ति के बारे में चुपचाप यह मानते हैं कि वह "वैसा" है, और क्या आप इस हफ़्ते उसके साथ एक बार खाना खा सकते हैं?
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Luke 5 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 25

जो खाट सालों तक उसे उठाए फिरती थी, अब वह उसे उठाकर चल पड़ा। "वह तुरन्त उनके सामने उठा, और जिस पर वह पड़ा था उसे उठाकर, परमेश्वर की बड़ाई करता हुआ अपने घर चला गया।" यीशु ने पहले पाप क्षमा किए, फिर पाँव मजबूत किए। तेरी वह कमज़ोरी जो तुझे दबाए रखती है, क्या तू उसे मसीह के सामने रखेगा? और घर लौटते हुए क्या तेरे होंठों पर उसकी बड़ाई होगी?

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