बाइबल व्याख्या

लूका 6:27

बाइबल

पाठ

धन्य-वचनों और "हाय" की उस तीखी सूची के ठीक बाद, जहाँ यीशु ने धनवानों और तृप्तों को झकझोरा है, वे अचानक मुड़कर सीधे सुननेवालों को संबोधित करते हैं: "परन्तु मैं तुम सुननेवालों से कहता हूँ, कि अपने शत्रुओं से प्रेम रखो; जो तुम से बैर करें, उनका भला करो।" यह "परन्तु" महत्वपूर्ण है। यह पिछली बात को काटता नहीं, बल्कि उसे आगे बढ़ाता है: जिन्हें सताया जाएगा, निकाला जाएगा, जिनका नाम बुरा जानकर काट दिया जाएगा (पद 22), उन्हीं से अब कहा जा रहा है कि सतानेवालों से प्रेम रखें। और प्रेम यहाँ भावना नहीं है, वह क्रिया है: "भला करो।" शत्रु काल्पनिक नहीं है, वह वास्तविक है, उसका बैर वास्तविक है, और फिर भी उसके लिए भलाई करने का आदेश है।

मूल बात

यह आज्ञा नैतिकता का ऊँचा शिखर नहीं, बल्कि परमेश्वर के स्वभाव का प्रकटीकरण है। यीशु स्वयं इसका आधार आगे बताते हैं: परमेश्वर "उन पर जो धन्यवाद नहीं करते और बुरों पर भी कृपालु है" (पद 35)। यानी शत्रु-प्रेम कोई वीरतापूर्ण अतिरिक्त उपलब्धि नहीं, वह परिवार की पहचान है; जो ऐसा करते हैं वे "परमप्रधान के सन्तान ठहरोगे"। यहाँ सुसमाचार का केंद्र खुलता है: हम स्वयं वे शत्रु थे जिनसे परमेश्वर ने प्रेम किया, हम ही वे कृतघ्न थे जिन पर उन्होंने कृपा की। इसलिए यह आदेश पहले हमें दोषी ठहराता है, फिर हमें अनुग्रह की याद दिलाता है। जो व्यक्ति कभी क्षमा पाया ही नहीं, वह शत्रु से प्रेम नहीं कर सकता; और जिसने सचमुच क्षमा पाई है, उसके पास इनकार करने का कोई तर्क नहीं बचता।

मुख्य सूत्र

यह वाक्य हवा में नहीं लटका रहता; यह क्रूस पर उतरता है। जो कह रहे हैं "अपने शत्रुओं से प्रेम रखो", वे स्वयं कुछ ही समय बाद उन्हीं हाथों से पकड़वाए जाएँगे जिन्हें उन्होंने चुना था, और लूका ने पद 16 में पहले ही यहूदा को "उसका पकड़वानेवाला" कहकर चिह्नित कर दिया है। यीशु ने वह सिखाया जो वे जीने जा रहे थे: कोड़े खाते समय शाप के बदले आशीष, कीलों के नीचे "हे पिता, इन्हें क्षमा कर।" पुराने नियम में भी यह धारा बहती है, जब यूसुफ अपने भाइयों को रोटी खिलाता है, जब दाऊद शाऊल को बख्श देता है; पर वहाँ वे झलकियाँ थीं। मसीह में वह झलक देह बन जाती है। शत्रु-प्रेम इसलिए मसीही आचरण का नियम है क्योंकि यह पहले परमेश्वर का कार्य है: हमारे प्रति, हमारे शत्रु होते हुए।

दर्पण

आपका शत्रु शायद कोई तानाशाह नहीं, बल्कि वह सहकर्मी है जिसने आपकी पीठ पीछे बात की और पदोन्नति ले गया। या वह रिश्तेदार जिसने ज़मीन के बँटवारे में धोखा दिया और अब हर शादी में सामने पड़ता है। या वह पड़ोसी जिसका नाम सुनते ही आपके भीतर कुछ कस जाता है। ध्यान दीजिए, यीशु ने भावना नहीं माँगी, उन्होंने क्रिया माँगी: "भला करो।" यह राहत की बात है और चुनौती भी। राहत इसलिए कि आपको पहले अपने मन को सुंदर बनाने की प्रतीक्षा नहीं करनी; चुनौती इसलिए कि अब कोई बहाना नहीं बचा। हमारा असली डर यह है कि भलाई करने से वह जीत जाएगा और हम हार जाएँगे। पर मसीह के राज्य में हिसाब दूसरा है।

आज ही उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसका नाम सुनकर आपका पेट कसता है, और उस नाम के लिए दो मिनट ज़ोर से प्रार्थना कीजिए, उसकी भलाई माँगते हुए।

संदर्भ

लूका यह उपदेश "चौरस जगह" में रखता है, पहाड़ पर नहीं (पद 17)। यीशु रातभर प्रार्थना कर चुके हैं, बारह चुन चुके हैं, और अब यहूदिया, यरूशलेम, सोर और सीदोन से आई भीड़ के बीच खड़े हैं। यह रोमी कब्ज़े का गलील है, जहाँ सैनिक जबरन सामान ढुलवाते हैं, कर-वसूली कमर तोड़ती है, और प्रतिशोध सम्मान की निशानी माना जाता है। ऐसे समाज में "शत्रु" कोई दार्शनिक श्रेणी नहीं थी; वह वह आदमी था जिसने आपके पिता की ज़मीन कर्ज़ में हड़प ली, या वह जो हथियार लेकर आपके गाँव से गुज़रता था। और चेलों में एक "शमौन जो जेलोतेस कहलाता है" (पद 15) भी खड़ा है, यानी वह परंपरा जिसका उत्तर तलवार था। उसी के कानों में यह आज्ञा गिरती है।

कठिन प्रश्न

तो क्या शत्रु से प्रेम का अर्थ अन्याय के आगे घुटने टेकना है? यदि पिटी हुई पत्नी दूसरा गाल आगे कर दे, यदि शोषित मज़दूर चुप रह जाए, तो क्या यह वचन का पालन है या उसका दुरुपयोग? यीशु ने यह बात सतानेवालों को नहीं, सताए जानेवालों को कही; यह शक्तिशाली के हाथ में हथियार नहीं, कमज़ोर के हाथ में गरिमा है। दूसरा गाल फेरना आत्मसमर्पण नहीं, एक ऐसा कदम है जो मारनेवाले की व्यवस्था को तोड़ देता है। फिर भी सहज उत्तर मैं नहीं दे सकता। यीशु ने स्वयं कभी चुप्पी चुनी और कभी मेज़ें उलट दीं। यह वचन विवेक को समाप्त नहीं करता, पर वह एक चीज़ ज़रूर छीन लेता है: शत्रु को नुकसान पहुँचाने का अधिकार।

पहले सुननेवाले

उन गरीब, भूखे, रोते हुए लोगों ने अभी-अभी सुना था कि राज्य उनका है। वे शक्तिहीन थे, और शक्तिहीन लोगों की एकमात्र पूँजी अक्सर उनका आक्रोश होता है, वह सपना कि एक दिन हिसाब बराबर होगा। यीशु उनसे वही पूँजी माँग रहे हैं। उनके कानों में यह पहले लूट जैसा लगा होगा, फिर मुक्ति जैसा। क्योंकि जो व्यक्ति शत्रु से प्रेम करना सीख लेता है, वह शत्रु के वश से बाहर निकल आता है; अब उसका जीवन दूसरे की बुराई से तय नहीं होता, बल्कि उस पिता की दया से जो "बुरों पर भी कृपालु है"। उन्होंने यह भी सुना होगा: हम राज्य में केवल राहत पानेवाले नहीं, परिवार की पहचान ढोनेवाले हैं।

चिंतन

वह कौन-सा नाम है जिसे आप प्रार्थना में लाने से बचते रहे हैं, और उस बचाव के पीछे असल में कौन-सा डर छिपा है?

यदि आपके शत्रु-प्रेम का आधार यह है कि परमेश्वर ने आपसे शत्रु रहते हुए प्रेम किया, तो क्या आपने कभी अपने आपको सचमुच उस स्थान पर देखा है?

Luke में और गहराई से जानें

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Luke For Everyone

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Warm, readable commentary on the Gospel for outsiders and doubters.

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Luke 6:27 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

लूका 6:27 का क्या अर्थ है?
धन्य-वचनों और "हाय" की उस तीखी सूची के ठीक बाद, जहाँ यीशु ने धनवानों और तृप्तों को झकझोरा है, वे अचानक मुड़कर सीधे सुननेवालों को संबोधित करते हैं: "परन्तु मैं तुम सुननेवालों से कहता हूँ, कि अपने शत्रुओं से प्रेम रखो; जो तुम से बैर करें, उनका भला करो।" यह "परन्तु" महत्वपूर्ण है। यह पिछली बात को काटता नहीं, बल्कि उसे आगे बढ़ाता है: जिन्हें सताया जाएगा, निकाला जाएगा, जिनका नाम बुरा जानकर काट दिया जाएगा (पद 22), उन्हीं से अब कहा जा रहा है कि सतानेवालों से प्रेम रखें। और प्रेम यहाँ भावना नहीं है, वह क्रिया है: "भला करो।" शत्रु काल्पनिक नहीं है, वह वास्तविक है, उसका बैर वास्तविक है, और फिर भी उसके लिए भलाई करने का आदेश है।
लूका 6:27 किस विषय में है?
यह वाक्य हवा में नहीं लटका रहता; यह क्रूस पर उतरता है। जो कह रहे हैं "अपने शत्रुओं से प्रेम रखो", वे स्वयं कुछ ही समय बाद उन्हीं हाथों से पकड़वाए जाएँगे जिन्हें उन्होंने चुना था, और लूका ने पद 16 में पहले ही यहूदा को "उसका पकड़वानेवाला" कहकर चिह्नित कर दिया है। यीशु ने वह सिखाया जो वे जीने जा रहे थे: कोड़े खाते समय शाप के बदले आशीष, कीलों के नीचे "हे पिता, इन्हें क्षमा कर।" पुराने नियम में भी यह धारा बहती है, जब यूसुफ अपने भाइयों को रोटी खिलाता है, जब दाऊद शाऊल को बख्श देता है; पर वहाँ वे झलकियाँ थीं। मसीह में वह झलक देह बन जाती है। शत्रु-प्रेम इसलिए मसीही आचरण का नियम है क्योंकि यह पहले परमेश्वर का कार्य है: हमारे प्रति, हमारे शत्रु होते हुए।
लूका 6:27 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज ही उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसका नाम सुनकर आपका पेट कसता है, और उस नाम के लिए दो मिनट ज़ोर से प्रार्थना कीजिए, उसकी भलाई माँगते हुए।
लूका 6:27 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
तो क्या शत्रु से प्रेम का अर्थ अन्याय के आगे घुटने टेकना है? यदि पिटी हुई पत्नी दूसरा गाल आगे कर दे, यदि शोषित मज़दूर चुप रह जाए, तो क्या यह वचन का पालन है या उसका दुरुपयोग? यीशु ने यह बात सतानेवालों को नहीं, सताए जानेवालों को कही; यह शक्तिशाली के हाथ में हथियार नहीं, कमज़ोर के हाथ में गरिमा है। दूसरा गाल फेरना आत्मसमर्पण नहीं, एक ऐसा कदम है जो मारनेवाले की व्यवस्था को तोड़ देता है। फिर भी सहज उत्तर मैं नहीं दे सकता। यीशु ने स्वयं कभी चुप्पी चुनी और कभी मेज़ें उलट दीं। यह वचन विवेक को समाप्त नहीं करता, पर वह एक चीज़ ज़रूर छीन लेता है: शत्रु को नुकसान पहुँचाने का अधिकार।
लूका 6:27 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
वह कौन-सा नाम है जिसे आप प्रार्थना में लाने से बचते रहे हैं, और उस बचाव के पीछे असल में कौन-सा डर छिपा है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Luke 6 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 13

रातभर यीशु पहाड़ पर प्रार्थना करते रहे, और सुबह होते ही यह हुआ: "जब दिन हुआ, तो उसने अपने चेलों को बुलाकर उनमें से बारह चुन लिए, और उनको प्रेरित कहा।"

वे चुने गए क्योंकि पिता के सामने रातभर उनके नाम लिए गए थे। बुलाहट कोई जल्दबाजी का फैसला नहीं थी।

तेरा नाम भी ऐसे ही किसी प्रार्थना में से निकला है। तू भीड़ में से उठाया गया है, भेजे जाने के लिए।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 37

क्षमा करो, तो तुम्हारी भी क्षमा की जाएगी।" ध्यान दे, यीशु पहले दो बातें रोकने को कहते हैं, दोष लगाना और अपराधी ठहराना। पर तीसरी बात करने को कहते हैं। चुप रह जाना काफी नहीं है। जिस व्यक्ति का नाम अभी तेरे मन में आया, उसके बारे में तू कुछ न कहे, यह तो शुरुआत है। असली काम है उसे छोड़ देना, जैसे परमेश्वर ने तुझे छोड़ दिया।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 30

पिता, धन्यवाद कि आपने पहले मुझे दिया, बिना हिसाब जोड़े। जो कुछ मेरे हाथ में है, वह आपकी उदारता का फल है। धन्यवाद कि आप कहते हैं, "जो कोई तुझ से माँगे, उसे दे," और मुझे खुले हाथ रखने का साहस भी आप ही देते हैं।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 42

यीशु यह नहीं कहते कि भाई की आँख का तिनका पड़ा रहने दे। वह कहते हैं, "पहले अपनी आँख से लट्ठा निकाल ले, तब जो तिनका तेरे भाई की आँख में है, भली भाँति देखकर निकाल सकेगा।" सुधारना मना नहीं है, अंधे होकर सुधारना मना है। आँख बहुत कोमल चीज़ है। जिस हाथ ने अपनी पीड़ा पहचानी हो, वही किसी और की आँख छूने के योग्य है।

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