1 तीमुथियुस 6
पाठ
छठे अध्याय में पौलुस पहले दासों को उनके स्वामियों के प्रति आदर सिखाते हैं, ताकि परमेश्वर के नाम की निन्दा न हो, फिर उन झूठे शिक्षकों की ओर मुड़ते हैं जो "समझते हैं कि भक्ति लाभ का द्वार है"। इसके विरुद्ध वे एक अलग हिसाब-किताब रखते हैं: "सन्तोष सहित भक्ति बड़ी लाभ है", क्योंकि हम खाली हाथ आए और खाली हाथ जाएँगे। तीमुथियुस को धार्मिकता का पीछा करने और विश्वास की अच्छी कुश्ती लड़ने की आज्ञा मिलती है, और यह आज्ञा राजाओं के राजा की महिमा के स्तुतिगान में जा मिलती है। अन्त में धनवानों को चेतावनी और बुलावा: अनिश्चित धन पर आशा न रखें, बल्कि "भले कामों में धनी" बनें।
मर्म
ध्यान दीजिए कि पौलुस "लाभ" शब्द को झूठे शिक्षकों के हाथ से छीनकर उलट देते हैं। वे भक्ति को कमाई का साधन बनाते थे; पौलुस कहते हैं भक्ति स्वयं ही लाभ है, बशर्ते उसके साथ सन्तोष हो। यूनानी शब्द आउतार्केइया का अर्थ है "अपने में पर्याप्त होना", और यही इस अध्याय का धार्मिक विस्फोट है: विश्वासी अपनी पर्याप्तता स्वयं में नहीं, बल्कि उस परमेश्वर में पाता है जो "हमारे सुख के लिये सब कुछ बहुतायत से" देते हैं। यहाँ सृष्टि का सिद्धान्त और उद्धार का सिद्धान्त एक साथ बोलते हैं। परमेश्वर देनेवाले हैं, इसलिए वस्तुएँ बुरी नहीं; परन्तु वस्तुएँ बचा नहीं सकतीं, इसलिए उन पर आशा रखना मूर्तिपूजा है। लोभ को पौलुस "सब प्रकार की बुराइयों की जड़" कहते हैं, अर्थात् एक विकृत उपासना, जो हृदय को उस अकेले अधिपति से हटा देती है।
मूल सूत्र
बाइबल की पूरी कहानी खाली हाथों की कहानी है। अब्राहम एक देश छोड़कर वादे के भरोसे निकला, इस्राएल जंगल में एक दिन के मन्ना पर जीया, और वह भूमि उन्हें कमाई नहीं, दान के रूप में मिली। वाचा का ढाँचा हमेशा यही रहा: परमेश्वर देते हैं, मनुष्य भरोसा करता है। पौलुस उसी ढाँचे को मसीह में पूरा होते देखते हैं। पद 13 में वे यीशु को उस गवाह के रूप में खड़ा करते हैं "जिसने पुन्तियुस पिलातुस के सामने अच्छा अंगीकार किया"। यह संयोग नहीं है: जहाँ रोम की सारी शक्ति और सम्पत्ति एक ओर खड़ी थी, वहाँ यीशु के पास कुछ नहीं था, केवल सत्य। और वही निर्धन बन्दी "राजाओं का राजा, और प्रभुओं का प्रभु" ठहरा। मसीह का क्रूस यह सिद्ध करता है कि परमेश्वर का राज्य सम्पत्ति की तर्कशैली से नहीं चलता।
दर्पण
यह अध्याय हमारी उस चुपचाप पलती आशा को पकड़ता है कि थोड़ी और सुरक्षा मिल जाए तो मन शान्त हो जाएगा। वेतन बढ़ जाए, बीमा पूरा हो जाए, बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो जाए, तब भरोसा आसान होगा। पौलुस इसे भोलापन कहकर नहीं टालते, वे इसे फंदा कहते हैं, और कहते हैं कि कुछ लोग इसी दौड़ में "विश्वास से भटककर" खुद को छलनी कर बैठे। यह हमारे प्रार्थना-जीवन में दिखता है: हम माँगते बहुत हैं, धन्यवाद कम देते हैं। ध्यान दीजिए, पौलुस धनवानों को गरीब होने का आदेश नहीं देते, बल्कि "भले कामों में धनी" बनने का। आज ही एक काम कीजिए: अपने पास जो कुछ है उसकी एक छोटी सूची बनाकर, हर वस्तु के लिए नाम लेकर परमेश्वर को ऊँची आवाज़ में धन्यवाद दीजिए, और उस सूची में से एक चीज़ आज किसी को दे दीजिए।
प्रश्न
पद 1 और 2 सहज नहीं हैं। पौलुस दासता को खत्म करने को क्यों नहीं कहते, बल्कि दासों से कहते हैं कि वे अपने स्वामियों को "बड़े आदर के योग्य" जानें? इसे मीठा बनाकर टालना बेईमानी होगी। ध्यान दें कि उनका तर्क आर्थिक व्यवस्था के बचाव में नहीं है, बल्कि गवाही का है: "ताकि परमेश्वर के नाम और उपदेश की निन्दा न हो।" और उसी साँस में वे कहते हैं कि विश्वासी स्वामी अब "भाई" है, जो उस समय की समाज-व्यवस्था के भीतर एक बम था; भाइयों के बीच मालिकाना हक टिक नहीं सकता। फिर भी सवाल बचा रहता है कि सुसमाचार ने अन्याय को तुरन्त क्यों नहीं तोड़ा। उत्तर पूरा नहीं मिलता। यह अध्याय हमें प्रकट होने के समय की ओर देखने को कहता है, "ठीक समय" जो केवल परमेश्वर के हाथ में है।
शास्त्र की गूँज
पद 7 सीधे अय्यूब की ओर इशारा करता है, जहाँ सब कुछ खो देने के बाद अय्यूब स्वीकार करता है कि वह नंगा आया और नंगा जाएगा। पौलुस उसी वाक्य को अब सिद्धान्त बना देते हैं: जो जीवन का आरम्भ और अन्त दोनों खाली हाथ हैं, उसके बीच का हिस्सा जमा करने में नहीं, भरोसे में जीया जाता है। दूसरी गूँज पर्वत के उपदेश से आती है, जहाँ यीशु स्वर्ग में धन जमा करने और भोजन-वस्त्र की चिन्ता छोड़ने की बात करते हैं। पौलुस के "खाने और पहनने" में वही शब्द-जगत सुनाई देता है। यानी यह उपदेश पौलुस का व्यावहारिक सुझाव नहीं, प्रभु की सीधी शिक्षा का विस्तार है, "हमारे प्रभु यीशु मसीह की बातों" का।
पृष्ठभूमि
तीमुथियुस इफिसुस में है, एशिया माइनर का सबसे धनी और धार्मिक रूप से सबसे भीड़भाड़ वाला शहर, जहाँ अर्तिमिस का मन्दिर एक बैंक की तरह भी काम करता था। वहाँ धर्म और पैसा साथ चलते थे, और घुमक्कड़ शिक्षकों की भरमार थी जो वाक्-कौशल के बदले शिष्य और शुल्क बटोरते थे। ऐसे माहौल में यह कहना कि "भक्ति लाभ का द्वार" है, बिल्कुल स्वाभाविक लगता। कलीसिया में दास भी थे और धनी संरक्षक भी, एक ही मेज़ पर, जो रोमी समाज-नियमों के लिए असहनीय था। पौलुस, सम्भवतः कैद के बीच के किसी समय में, एक युवा अगुवे को लिख रहे हैं जिसकी हैसियत कम है और जिसे धनी सदस्यों को आज्ञा देनी है। इसीलिए वे उसे परमेश्वर की महिमा का स्तुतिगान थमाते हैं: जिसके पीछे "अगम्य ज्योति" खड़ी हो, वह किसी की दौलत से नहीं डरता।
चिन्तन
आपके अपने हिसाब में "लाभ" किसे मानते हैं आप, और पिछले महीने के आपके निर्णय इसका क्या उत्तर देते हैं?
यदि आपका सारा भरोसा "अनिश्चित धन" से हटाकर उस परमेश्वर पर रख दिया जाए जो बहुतायत से देते हैं, तो आपकी जीवनशैली में सबसे पहले क्या बदलना पड़ेगा?
1 Timothy में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
The Message of 1 Timothy and Titus
Healthy leaders, healthy churches: Paul's pastoral playbook.
Paul For Everyone: The Pastoral Letters
Timothy and Titus in Wright's accessible daily format.
The Pastoral Epistles: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
1 Timothy 6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 तीमुथियुस 6 का क्या अर्थ है?
1 तीमुथियुस 6 किस विषय में है?
1 तीमुथियुस 6 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 तीमुथियुस 6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 तीमुथियुस 6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Timothy 6 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आपने हमें शब्दों पर बहस करने के उस रोग से सचेत किया, जिससे डाह, झगड़े और बुरे संदेह पैदा होते हैं। धन्यवाद कि आपके मसीह के खरे वचन हमें घमंड से बचाकर नम्रता और शांति में थामे रखते हैं।
धन्यवाद, प्रभु, कि मेरी मेहनत की सबसे छोटी जगह भी तेरे नाम की गवाही बन सकती है। जिनके अधीन मुझे काम करना है, उन्हें आदर देने की शक्ति तू देता है, ताकि तेरे नाम और उपदेश की निन्दा न हो। मेरा हर दिन तेरी नज़र में कीमती है।
पिता, धन्यवाद कि आपने हमें सत्य से विहीन नहीं छोड़ा, बल्कि अपने वचन में स्थिर रखा है। धन्यवाद कि भक्ति हमारे लिए कमाई का द्वार नहीं, बल्कि आपके साथ जीने का आनंद है। व्यर्थ के रगड़े झगड़ों से हमारा मन बचाइए और शुद्ध बुद्धि दीजिए।
पिता, मेरे हाथ जो थामे बैठे हैं उसे खोलना सिखा। मुझे पैसों में नहीं, भलाई में अमीर बना दे। जब किसी की ज़रूरत मेरे सामने आए, तो मैं हिसाब लगाने की जगह बाँटने को तैयार रहूँ। तेरी उदारता ही मेरा नाप बने।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें
