मरकुस 4
पाठ
झील के किनारे भीड़ इतनी बड़ी हो जाती है कि यीशु नाव पर चढ़कर बैठते हैं और पानी से किनारे की ओर बोलते हैं। वे बीज बोनेवाले की कहानी सुनाते हैं: कुछ बीज मार्ग के किनारे, कुछ पत्थरीली भूमि पर, कुछ झाड़ियों में, और कुछ अच्छी भूमि पर, जो "तीस गुणा, कोई साठ गुणा और कोई सौ गुणा फल" लाता है। एकांत में वे चेलों को इसका अर्थ खोलते हैं, फिर दीये, अपने आप बढ़ते बीज और राई के दाने के दृष्टान्त जोड़ते हैं। उसी दिन साँझ को वे चेलों से कहते हैं, "आओ, हम पार चलें," आँधी उठती है, वे पिछले भाग में गद्दी पर सोते रहते हैं, और जागकर हवा को डाँटते हैं: "शान्त रह, थम जा!" अध्याय एक प्रश्न पर खत्म होता है: "यह कौन है?"
मर्म
यह अध्याय परमेश्वर के राज्य के बारे में एक बात कहता है जो हमें अक्सर खटकती है: राज्य बीज की तरह आता है, तलवार की तरह नहीं। बीज छोटा है, छिपा है, ज़्यादातर व्यर्थ जाता दिखता है, और उसका बढ़ना कोई देख नहीं सकता, "वह न जाने"। यीशु के दिनों में लोग एक ऐसे मसीहा की प्रतीक्षा कर रहे थे जो रोम को उखाड़ फेंके; यीशु कहते हैं कि राज्य वचन के बोए जाने से आता है, और वचन प्रतिरोध से गुज़रता है, शैतान से, क्लेश से, "धन का धोखा" से। पर यह हार नहीं है। जिस मिट्टी में वचन जड़ पकड़ता है, वहाँ फ़सल असाधारण है, तीस, साठ, सौ गुणा। यही परमेश्वर का तरीका है: छिपकर शुरू करना, खुलकर समाप्त होना, "क्योंकि कोई वस्तु छिपी नहीं, परन्तु इसलिए कि प्रगट हो जाए।" और बीज बोनेवाला अंततः यीशु स्वयं हैं, जो अपना वचन ही नहीं, अपने आप को भी भूमि में गिरा देंगे।
सूत्र
मरकुस ने दो पुराने नियम के संकेत जानबूझकर टाँके हैं, और दोनों यीशु की ओर उँगली उठाते हैं। पहला, यशायाह 6 की वह कठोर बात कि लोग "देखते हुए देखें और उन्हें दिखाई न पड़े"। यशायाह को यह मन्दिर में परमेश्वर की महिमा देखने के बाद कहा गया था; अब वही विभाजन एक गलीली बढ़ई के दृष्टान्तों के सामने पैदा हो रहा है। जहाँ यीशु खड़े होते हैं, वहीं दिल खुलते या बन्द होते हैं। दूसरा, भजन 107 का वह गीत जिसमें आँधी को थामनेवाला केवल यहोवा है। चेले पूछते हैं, "यह कौन है?" और पाठक जानता है कि उत्तर भजन में लिखा है। बोनेवाला, बीज और आँधी को डाँटनेवाला, तीनों एक ही व्यक्ति हैं।
दर्पण
झाड़ियों वाली मिट्टी सबसे ख़तरनाक है, क्योंकि वहाँ बीज सचमुच उगता है। वह आदमी बाइबल पढ़ता है, कलीसिया जाता है, और फिर भी "संसार की चिन्ता, और धन का धोखा, और वस्तुओं का लोभ" धीरे-धीरे सब घेर लेता है। यह नाटकीय पतन नहीं होता; यह EMI, प्रमोशन, बच्चों के नम्बर और एक थके हुए मन की चुपचाप बढ़ती हुई घास है। और आँधी में चेलों का सवाल, "हे गुरु, क्या तुझे चिन्ता नहीं," हममें से हर उस व्यक्ति का सवाल है जिसने रात में छत की ओर देखते हुए सोचा कि परमेश्वर सो रहे हैं। यीशु उस डर को झिड़कते नहीं, उसे विश्वास की कमी कहते हैं, फिर भी नाव किसी को डूबने नहीं देते।
आज एक कागज़ पर वह एक चिन्ता लिखिए जो इस हफ़्ते आपके भीतर वचन को दबा रही है, उसका नाम लिखिए, और उस कागज़ को हाथ में लेकर ऊँची आवाज़ में कहिए: "प्रभु, इस पर आप कहिए, शान्त रह, थम जा।"
संदर्भ
गलील की झील के उत्तरी किनारे पर ज़मीन प्याले की तरह ढलती है, और पानी पर बैठा वक्ता किनारे पर खड़ी भीड़ को आसानी से सुनाई देता है। यीशु नाव को मंच बनाते हैं, क्योंकि भीड़ अब भारी हो चुकी है। सुननेवाले किसान और मछुआरे थे। वे जानते थे कि बोनेवाला पहले बीज छींटता है, फिर हल चलाता है, इसलिए मार्ग, पत्थर और झाड़ियाँ हर साल की सच्चाई थीं। वे यह भी जानते थे कि सामान्य फ़सल सात-आठ गुणा होती है; तीस, साठ, सौ गुणा कहना उस दुनिया में लगभग असम्भव आँकड़ा था। और झील की वह अचानक आँधी, जो पहाड़ियों से नीचे उतरती है, उनके लिए मुहावरा नहीं, जान का जोखिम थी।
श्रोता
मरकुस का सुसमाचार उन विश्वासियों के लिए लिखा गया जो दबाव में जी रहे थे, जिनके लिए "वचन के कारण उन पर क्लेश या उपद्रव होता है" कोई काल्पनिक श्रेणी नहीं थी। वे छोटे समुदाय थे, साम्राज्य की विशाल मशीन के सामने राई के दाने जितने, और उन्हें बार-बार यह शक हुआ होगा कि क्या यह सब व्यर्थ जा रहा है। उनके कानों में "सब बीजों से छोटा" और फिर "सब साग-पात से बड़ा" एक वादा था, आँकड़ा नहीं। और डूबती नाव में सोते हुए यीशु की तस्वीर? वह उनकी अपनी कलीसिया की तस्वीर थी। मरकुस उन्हें यह नहीं कहता कि आँधी नहीं आएगी, बल्कि यह कि नाव में कौन है।
अंतर्पाठ
यशायाह 6:9,10 और भजन 107:29 इस अध्याय के दो खंभे हैं, और मरकुस ने दोनों को सतह पर छोड़ा है। यशायाह से आती है यह असहज सच्चाई कि प्रकाश स्वयं कुछ आँखों को बन्द कर देता है; दृष्टान्त पर्दा और खिड़की दोनों हैं, इस पर निर्भर कि सुननेवाला भीतर आना चाहता है या नहीं। भजन 107 से आती है वह पहचान जिसे चेले अभी शब्दों में नहीं रख पा रहे: "उसने आँधी को थाम दिया" यह इस्राएल के परमेश्वर के बारे में गाया जाता था। जब मरकुस इन दोनों को एक ही अध्याय में रखता है, तो वह हमसे यशायाह वाला निर्णय माँग रहा है और भजन वाला उत्तर दे रहा है।
चिंतन
आपके जीवन की कौन-सी "झाड़ी" इस समय सबसे तेज़ी से बढ़ रही है, और आप उसे काटने के बजाय किन नामों से उचित ठहराते हैं?
यदि यीशु नाव में सोते हुए भी प्रभु थे, तो आपकी उस प्रार्थना के बारे में यह क्या बदलता है जिसका उत्तर अब तक नहीं आया?
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Mark 4 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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मरकुस 4 का क्या अर्थ है?
मरकुस 4 किस विषय में है?
मरकुस 4 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मरकुस 4 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मरकुस 4 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Mark 4 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मेरे मन में चिंताएँ और पाने की भूख इतनी उग आई हैं कि तेरा वचन दबता जा रहा है। मुझे पहचानने दे कि क्या सच में ज़रूरी है, और इन काँटों को हटा दे। मेरे भीतर तेरी बात जड़ पकड़े और फल लाए।
चौकस रहो कि क्या सुनते हो? जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिए भी नापा जाएगा" (मरकुस 4:24)।
यीशु यहाँ सुनने को एक बर्तन की तरह बताते हैं। तुम जितना बड़ा बर्तन लेकर आओगे, उतना ही भरकर लौटोगे। आधे मन से सुना गया वचन आधा ही काम करता है।
आज जब तुम बाइबल खोलो, पूछो: मैं कितनी जगह लेकर आया हूँ?
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