बाइबल व्याख्या

मत्ती 14:29

बाइबल
यह वचन Manna Faith Home द्वारा समर्पित है

पाठ

रात का चौथा पहर, यानी भोर से ठीक पहले का सबसे अँधेरा और सबसे थका देने वाला समय। नाव लहरों में डगमगा रही है, हवा सामने की है, और चेले अभी-अभी चिल्लाए हैं कि "वह भूत है।" इसी शोर के बीच पतरस की आवाज़ उठती है: यदि सचमुच आप ही हैं, तो मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं पानी पर चलकर आपके पास आऊँ। और उत्तर में प्रभु यीशु केवल एक शब्द कहते हैं: "आ!" बस इतना ही। कोई समझाइश नहीं, कोई चेतावनी नहीं, कोई वादा नहीं कि तू डूबेगा नहीं। और पतरस नाव का किनारा पकड़े, पैर बाहर निकालता है, और सचमुच पानी पर चलने लगता है, उस ओर जहाँ यीशु खड़े हैं।

मर्म

ध्यान दीजिए कि पतरस को जो चीज़ थामे रखती है, वह उसका साहस नहीं, उसका संतुलन नहीं, उसकी नाविक-कुशलता नहीं। वह केवल एक शब्द है: "आ!" यही इस पद का धर्मशास्त्रीय केंद्र है। विश्वास अपने भीतर से उपजी हिम्मत नहीं, बल्कि मसीह के बोले हुए वचन का उत्तर है। पतरस ने स्वयं नहीं कहा, "मैं चलकर दिखाता हूँ"; उसने आज्ञा माँगी, क्योंकि वह जानता था कि असंभव तभी संभव होता है जब प्रभु उसे कहें। और यहाँ परमेश्वर के बारे में कुछ चौंकाने वाला प्रकट होता है: वे अपने लोगों को सुरक्षित दूरी पर नहीं रखते। जो प्रभु क्षण भर पहले कह चुके हैं "मैं हूँ; डरो मत", वे अब अपने डरे हुए शिष्य को उसी भयानक पानी पर बुलाते हैं जिससे वह काँप रहा था। अनुग्रह केवल सांत्वना नहीं देता; वह बुलाता है।

सूत्र

पानी पर चलना बाइबल में केवल एक चमत्कार नहीं, एक दावा है। इस्राएल की स्मृति में समुद्र वह जगह है जहाँ मनुष्य का बस नहीं चलता; अय्यूब कहता है कि परमेश्वर ही "समुद्र की लहरों पर चलते" हैं, और लाल समुद्र पर इस्राएल तभी पार हुआ जब परमेश्वर ने स्वयं रास्ता बनाया। इसलिए जब यीशु लहरों पर खड़े होकर "मैं हूँ" कहते हैं, तो यह वही नाम है जो जलती झाड़ी में से सुनाई दिया था। और अब वही नाम एक शब्द में सिकुड़कर आमंत्रण बन जाता है: "आ!" पुराने नियम में परमेश्वर समुद्र को चीरकर अपने लोगों को सूखी भूमि पर ले जाते हैं; यहाँ मसीह समुद्र को चीरते नहीं, वे अपने शिष्य को अपने पास बुला लेते हैं। उद्धार की पूरी कहानी इसी दिशा में बहती है: परमेश्वर खतरे को हटाने से पहले अक्सर स्वयं को देते हैं।

दर्पण

हम में से अधिकांश नाव में बैठे रहना पसंद करते हैं, और नाव के पक्ष में अच्छे तर्क भी हैं। वह लकड़ी असली है। वेतन असली है, जिसे छोड़कर आप उस काम की ओर नहीं जाते जिसकी ओर मन खिंचता है। वह चुप्पी सुरक्षित है, जिसे तोड़कर आप दफ़्तर में सच नहीं बोलते। वह दूरी आरामदेह है, जिसे पार करके आप बीमार माता-पिता की ज़िम्मेदारी अपने कंधे पर नहीं लेते, या उस रिश्ते को नहीं छूते जिसमें आख़िरी बार कड़वी बात हुई थी। पतरस की हिम्मत उसकी बहादुरी नहीं थी; उसने पहले पूछा, "आज्ञा दे।" यही अंतर है लापरवाही और विश्वास में। विश्वास बिना आदेश के छलाँग नहीं लगाता, पर आदेश मिलने पर किनारा नहीं पकड़े रहता। आज एक कागज़ पर उस एक काम का नाम लिखिए जिससे आप महीनों से बच रहे हैं, और उसके नीचे लिखिए: "प्रभु, यदि यह आपकी आज्ञा है, तो कहिए: आ।" फिर उसे ज़ोर से पढ़िए।

प्रसंग

यह रात उसी अध्याय में आती है जिसमें हेरोदेस के जन्मदिन की दावत में यूहन्ना का सिर थाल में परोसा गया। यीशु यह समाचार सुनकर एकांत में जाना चाहते थे, पर भीड़ ने पीछा किया, और दिन भूखों को घास पर बिठाकर रोटी तोड़ने में बीता। फिर उन्होंने चेलों को ज़बरदस्ती नाव पर चढ़ाया और स्वयं पहाड़ पर प्रार्थना करने चले गए। गलील की झील पहाड़ियों से घिरी है; रात में ठंडी हवा नीचे उतरकर अचानक तूफ़ान खड़ा कर देती है। रात का चौथा पहर यानी तीन से छह बजे के बीच, सबसे लंबी, सबसे खाली घड़ी। ये मछुआरे पानी से डरते नहीं थे, वे पानी को जानते थे, और इसीलिए जानते थे कि उस पर कोई चलता नहीं। जो उन्होंने देखा, उसके लिए उनके पास केवल एक शब्द था: भूत।

प्रश्न

यीशु ने "आ!" क्यों कहा, जबकि वे जानते थे कि पतरस डूबेगा? यह सवाल टालने लायक नहीं है। एक पल को लगता है कि यह बुलावा एक जाल था, नाकामी की पटकथा पहले से लिखी हुई। और यह कहकर बात खत्म नहीं होती कि "डूबना ही सबक था", क्योंकि इसी अध्याय में एक आदमी ने परमेश्वर की आज्ञा मानी और उसका सिर थाल में आया। हर आज्ञाकारिता हाथ थामे जाने पर खत्म नहीं होती। जो हम कह सकते हैं वह यह है: बुलावा सुरक्षा का वादा नहीं था, उपस्थिति का वादा था। पतरस ने उस रात दो चीज़ें सीखीं जो नाव में बैठे रहकर कभी न सीखता, कि लहरें उसे झेल नहीं सकतीं, और कि वह हाथ पानी से ज़्यादा नज़दीक है। बाकी रहस्य बना रहता है।

श्रोता

मत्ती जिनके लिए लिख रहा था, वे ऐसे विश्वासी थे जिनकी अपनी नाव भी हवा के सामने थी: आराधनालय से निकाले जाने का डर, रोमी शासन, परिवारों में फूट। उनके लिए पतरस कोई धुँधला नाम नहीं था, वह कलीसिया का जाना-पहचाना अगुवा था, वही जिसने बाद में प्रभु का इनकार भी किया। उन्होंने इस कहानी में अपने ही अगुवे को पानी पर चलते और डूबते देखा, और यह उन्हें राहत देता था: तो हमारी कमज़ोरी नई नहीं है। और जब उन्होंने "मैं हूँ" सुना, तो उनके कानों में वह निर्गमन का नाम गूँजा, और समझ आया कि जो व्यक्ति उन्हें तूफ़ान में बुला रहा है, वही है जिसने समुद्र को आज्ञा दी थी।

मनन

नाव आपके जीवन में किस चीज़ का नाम है, और आप कैसे जाँचेंगे कि आप उसमें बैठे हैं क्योंकि प्रभु ने नहीं कहा "आ", या क्योंकि आपने सुनना बंद कर दिया है?

पतरस ने चलने से पहले आज्ञा माँगी। पिछली बार आपने कोई बड़ा फैसला लेने से पहले परमेश्वर से आज्ञा कब माँगी थी, और उत्तर की प्रतीक्षा कितनी देर की?

Matthew में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Matthew For Everyone, Part 1

N.T. Wright

Short, fresh readings that make Matthew feel newly written.

The Message of Matthew

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The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

R.T. France

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Matthew

Michael Wilkins

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

The Message of the Sermon on the Mount

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Stott's classic on Matthew 5-7, the charter of the kingdom.

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Matthew 14:29 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 14:29 का क्या अर्थ है?
रात का चौथा पहर, यानी भोर से ठीक पहले का सबसे अँधेरा और सबसे थका देने वाला समय। नाव लहरों में डगमगा रही है, हवा सामने की है, और चेले अभी-अभी चिल्लाए हैं कि "वह भूत है।" इसी शोर के बीच पतरस की आवाज़ उठती है: यदि सचमुच आप ही हैं, तो मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं पानी पर चलकर आपके पास आऊँ। और उत्तर में प्रभु यीशु केवल एक शब्द कहते हैं: "आ!
मत्ती 14:29 किस विषय में है?
पानी पर चलना बाइबल में केवल एक चमत्कार नहीं, एक दावा है। इस्राएल की स्मृति में समुद्र वह जगह है जहाँ मनुष्य का बस नहीं चलता; अय्यूब कहता है कि परमेश्वर ही "समुद्र की लहरों पर चलते" हैं, और लाल समुद्र पर इस्राएल तभी पार हुआ जब परमेश्वर ने स्वयं रास्ता बनाया। इसलिए जब यीशु लहरों पर खड़े होकर "मैं हूँ" कहते हैं, तो यह वही नाम है जो जलती झाड़ी में से सुनाई दिया था। और अब वही नाम एक शब्द में सिकुड़कर आ
मत्ती 14:29 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यह रात उसी अध्याय में आती है जिसमें हेरोदेस के जन्मदिन की दावत में यूहन्ना का सिर थाल में परोसा गया। यीशु यह समाचार सुनकर एकांत में जाना चाहते थे, पर भीड़ ने पीछा किया, और दिन भूखों को घास पर बिठाकर रोटी तोड़ने में बीता। फिर उन्होंने चेलों को ज़बरदस्ती नाव पर चढ़ाया और स्वयं पहाड़ पर प्रार्थना करने चले गए। गलील की झील पहाड़ियों से घिरी है; रात में ठंडी हवा नीचे उतरकर अचानक तूफ़ान खड़ा कर देती है। रात का चौथा पहर यानी तीन से छह बजे के बीच, सबसे लंबी, सबसे खाली घड़ी। ये मछुआरे पानी से डरते नहीं थे, वे पानी को जानते थे, और इसीलिए जानते थे कि उस पर कोई चलता नहीं। जो उन्होंने देखा, उसके लिए उनके पास केवल एक शब्द था: भूत।
मत्ती 14:29 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती जिनके लिए लिख रहा था, वे ऐसे विश्वासी थे जिनकी अपनी नाव भी हवा के सामने थी: आराधनालय से निकाले जाने का डर, रोमी शासन, परिवारों में फूट। उनके लिए पतरस कोई धुँधला नाम नहीं था, वह कलीसिया का जाना-पहचाना अगुवा था, वही जिसने बाद में प्रभु का इनकार भी किया। उन्होंने इस कहानी में अपने ही अगुवे को पानी पर चलते और डूबते देखा, और यह उन्हें राहत देता था: तो हमारी कमज़ोरी नई नहीं है। और जब उन्होंने "मैं हूँ" सुना, तो उनके कानों में वह निर्गमन का नाम गूँजा, और समझ आया कि जो व्यक्ति उन्हें तूफ़ान में बुला रहा है, वही है जिसने समुद्र को आज्ञा दी थी।
मत्ती 14:29 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पतरस ने चलने से पहले आज्ञा माँगी। पिछली बार आपने कोई बड़ा फैसला लेने से पहले परमेश्वर से आज्ञा कब माँगी थी, और उत्तर की प्रतीक्षा कितनी देर की?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Matthew 14 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

यूहन्ना ने कोई विद्रोह नहीं किया था, कोई सेना खड़ी नहीं की थी। उसने बस सच कहा था। "क्योंकि हेरोदेस ने अपने भाई फिलिप्पुस की पत्नी हेरोदियास के कारण यूहन्ना को पकड़कर बाँधा और बन्दीगृह में डाल दिया था।" एक स्त्री के कारण, यानी एक ऐसे पाप के कारण जिसे हेरोदेस छोड़ना नहीं चाहता था। सोचो, क्या तुम्हारे जीवन में भी कोई सच है जिसे तुमने चुप करा दिया है, सिर्फ इसलिए कि वह तुम्हें बदलने को कहता है?

प्रार्थना संपादकीय पर पद 12

पिता, जब दिल टूटता है और शब्द नहीं मिलते, हमें बस यही रास्ता याद रहे कि सीधे तेरे पास आ जाएँ। हमारे आँसू, हमारा खालीपन, हमारे अनकहे सवाल, सब तेरे सामने रख देते हैं। तू सुनता है, यही हमारे लिए काफी है। हमें थामे रख।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 27

तूफान थमा नहीं था जब यीशु ने कहा, "ढाढ़स बाँधो! मैं हूँ; डरो मत।" लहरें वैसी ही ऊँची थीं, हवा वैसी ही तेज़। बदला सिर्फ़ इतना कि वे अब अकेले नहीं थे। ध्यान दे, चेलों ने उन्हें देखकर चिल्लाया था, क्योंकि डर में हम अपने उद्धारकर्ता को भी भूत समझ बैठते हैं। तेरी रात के जिस पहर में डर सबसे गहरा है, वहीं वे चल कर आते हैं।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 16

यीशु ने चेलों से कहा, "उनका जाना ज़रूरी नहीं, तुम ही उन्हें खाने को दो।" कितनी अजीब बात है। भीड़ भूखी थी, और चेलों के पास सिर्फ़ पाँच रोटी और दो मछली थीं। फिर भी यीशु ने ज़िम्मेदारी उन्हीं के हाथ में थमा दी।

आज भी वह यही करता है। तेरे पास जो थोड़ा है, वही उसके हाथ में रख। कमी तेरी नहीं, उसकी चिंता है। तू बस देना शुरू कर।

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