मत्ती 16
पाठ
कैसरिया फिलिप्पी की धूल भरी सड़क पर चलते हुए यीशु मुड़कर पूछते हैं, "परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो?" और पतरस के मुँह से वह वाक्य निकलता है जिस पर सब कुछ टिका है: "तू जीविते परमेश्वर का पुत्र मसीह है।" इससे पहले फरीसी और सदूकी स्वर्ग से चिन्ह माँगते हैं और खाली हाथ लौटा दिए जाते हैं; चेले रोटी भूल जाते हैं और यीशु की चेतावनी को आटे की चिंता समझ बैठते हैं। और पतरस की महान स्वीकारोक्ति के तुरंत बाद वही पतरस, जब यीशु यरूशलेम, दुःख, मृत्यु और तीसरे दिन जी उठने की बात करते हैं, उन्हें अलग ले जाकर डाँटता है, और सुनता है: "हे शैतान, मेरे सामने से दूर हो!" अध्याय क्रूस उठाने के बुलावे पर आकर ठहरता है।
मर्म
ध्यान दीजिए कि प्रकाशन और अंधापन एक ही व्यक्ति में कितनी जल्दी बदल जाते हैं। पतरस ने जो कहा, वह माँस और लहू से नहीं आया था; परमेश्वर ने स्वयं उसकी आँखें खोलीं। फिर भी अगली ही साँस में वही पतरस "मनुष्यों की बातों पर मन लगाता है।" यहीं इस अध्याय का धड़कता हुआ हृदय है: मसीह को सही नाम देना काफी नहीं, जब तक हम उस नाम की कीमत स्वीकार न करें। "मसीह" शब्द सुनते ही उनके मन में विजयी राजा उभरता था, कोई काँटों का ताज नहीं। यीशु उस शब्द को छीनते नहीं, उसे भरते हैं: राजा वही है जो मारा जाता है और जी उठता है। और जो उसका अनुसरण करेगा, उसे भी अपना प्राण खोकर ही पाना होगा। परमेश्वर का राज्य चिन्हों की माँग करने वालों को नहीं, अपने आपका इन्कार करने वालों को खुलता है।
सूत्र
योना का चिन्ह इस अध्याय की चाबी है। यीशु उन्हें कोई आकाशीय तमाशा नहीं देते, केवल एक भविष्यद्वक्ता की ओर इशारा करते हैं जो गहराई में उतरा और तीसरे दिन जीवित लौटा। और कुछ ही पंक्तियों बाद वही बात सादे शब्दों में खुल जाती है: "मार डाला जाऊँ; और तीसरे दिन जी उठूँ।" पूरा पुराना नियम इसी लय में चलता है, जहाँ परमेश्वर बचाने के लिए पहले उतरते हैं। दाऊद का वंशज सिंहासन पर बैठने से पहले खारिज किया जाता है; मेम्ना काटा जाता है ताकि लोग जीएँ। पतरस की स्वीकारोक्ति उस लंबी प्रतीक्षा का उत्तर है, पर यीशु तुरंत जोड़ते हैं कि यह मसीह कब्र से होकर आएगा। कलीसिया इसी चट्टान पर खड़ी है: एक क्रूस पर चढ़ाया गया और जिलाया गया मसीह, जिसके सामने अधोलोक के फाटक टूट जाते हैं।
दर्पण
पतरस की डाँट में प्रेम था, यही तो चुभता है। "हे प्रभु, परमेश्वर न करे!" यह किसी शत्रु की आवाज़ नहीं, बल्कि उस मित्र की है जो अपने प्रिय को दुःख से बचाना चाहता है। हम भी ऐसे ही प्रार्थना करते हैं: बेटा उस कठिन रास्ते पर न जाए, नौकरी सुरक्षित रहे, शरीर की रिपोर्ट साफ आए, रिश्ते में टकराव न हो। ये इच्छाएँ बुरी नहीं, पर इनके नीचे अक्सर एक चुपचाप शर्त छिपी रहती है: प्रभु, मैं आपके पीछे चलूँगा, बशर्ते रास्ता क्रूस के पास से न गुज़रे। यीशु उस शर्त को नरमी से नहीं हटाते, वे उसे "शैतान" कहकर काटते हैं। आज ही एक काम कीजिए: कागज़ पर वह एक चीज़ लिखिए जिसे खोने से आप सबसे ज़्यादा डरते हैं, और उसे ज़ोर से कहते हुए प्रभु के हाथ में सौंप दीजिए।
संदर्भ
कैसरिया फिलिप्पी यहूदी इलाके का किनारा है, गैर-यहूदी भूमि। वहाँ एक विशाल चट्टान के मुँह से पानी फूटता है, और उसी चट्टान में मूर्तिपूजा के मंदिर बने हैं; लोग उस गुफा को पाताल का द्वार मानते थे। पास ही रोमी सम्राट के सम्मान में बना मंदिर खड़ा है। ठीक वहाँ, साम्राज्य और झूठे देवताओं की छाया में, यीशु पूछते हैं कि लोग उन्हें क्या कहते हैं, और चट्टान तथा फाटकों की भाषा में उत्तर देते हैं। इससे पहले का दृश्य इसका उल्टा है: फरीसी और सदूकी, जो आपस में लड़ते थे पर यीशु के विरुद्ध एक हो गए, "परखने के लिये" चिन्ह माँगते हैं। यीशु उत्तर देकर चले जाते हैं। बहस नहीं, प्रस्थान।
श्रोता
मत्ती जिन विश्वासियों के लिए लिख रहे थे, वे यहूदी पृष्ठभूमि से आए मसीही थे, जिन्हें आराधनालय से निकाला जा रहा था और जो पूछते थे कि क्या हम ही सचमुच परमेश्वर की प्रजा हैं। उनके कानों में "मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊँगा" कोई संगठनात्मक घोषणा नहीं थी, बल्कि जीने का आधार। जिनके पास मंदिर नहीं रहा, उन्हें बताया गया कि परमेश्वर एक नया घर बना रहे हैं। "कुँजियाँ" शब्द उन्हें तुरंत समझ आया: शास्त्री जो ज्ञान का द्वार बंद रखते थे, अब वह अधिकार मछुआरों के हाथ में है। और जब उनके भाई-बहन गिरफ्तार हो रहे थे, तो "अपना क्रूस उठाए" कोई रूपक नहीं था; वे रोमी सड़कों पर वह दृश्य देख चुके थे।
प्रश्न
अंतिम वचन काँटे की तरह अटकता है: कुछ लोग मृत्यु का स्वाद चखने से पहले मनुष्य के पुत्र को उसके राज्य में आते देखेंगे। वे सब मर चुके हैं, और आकाश अब भी शांत है। कुछ लोग इसे अगले अध्याय के रूपांतरण की ओर मोड़ देते हैं, कुछ पुनरुत्थान या यरूशलेम के विनाश की ओर। इनमें से हर उत्तर कुछ समझाता है और कुछ छोड़ देता है। ईमानदारी यही है कि यीशु के मुँह से निकले कुछ वाक्य हमारे कैलेंडर में पूरी तरह नहीं समाते। पर ध्यान दीजिए कि यह वाक्य किससे जुड़ा है: प्रतिफल से, न्याय से, उस दिन से जब खोया हुआ प्राण लौटाया जाएगा। जो जल्दी चाहते हैं वे चिन्ह माँगते हैं; जो भरोसा करते हैं वे प्रतीक्षा करते हैं।
चिंतन
अगर यीशु आज आपसे पूछें, "परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो?", तो आपका उत्तर आपकी इस सप्ताह की डायरी और खर्च में कहाँ दिखाई देगा?
आपके जीवन में वह कौन-सी जगह है जहाँ आप प्रेम के नाम पर परमेश्वर से कह रहे हैं, "परमेश्वर न करे, ऐसा कभी न होगा"?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
हे प्रभु, मेरे मन को सतर्क रख। छोटी छोटी बुरी बातें, गलत सोच और झूठी शिक्षाएँ चुपके से भीतर आ जाती हैं और सब कुछ बदल देती हैं। मुझे विवेक दे कि पहचान सकूँ क्या मुझे भीतर लेना है और क्या नहीं। तेरी सच्चाई में मुझे थामे रख।
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