1 कुरिन्थियों 15:14
पाठ
पौलुस एक ऐसी बात कहते हैं जो कोई प्रचारक अपने ही उपदेश के बारे में कहने से डरेगा: "और यदि मसीह नहीं जी उठा, तो हमारा प्रचार करना भी व्यर्थ है; और तुम्हारा विश्वास भी व्यर्थ है।" वे यह नहीं कहते कि पुनरुत्थान के बिना भी मसीही जीवन में कुछ सुंदर बचा रहेगा। वे कहते हैं: सब खोखला। मेरा बोलना, तुम्हारा भरोसा, दोनों हवा में लटके हुए।
मूल बात
जिस शब्द का अनुवाद "व्यर्थ" हुआ है, वह यूनानी में केनोस है, जिसका अर्थ है "खाली", वह घड़ा जिसमें कुछ न हो। पौलुस यह नहीं कह रहे कि विश्वास गलत होगा; वे कह रहे हैं कि उसमें कुछ भी नहीं होगा। और यही मसीही विश्वास की सबसे असुविधाजनक विशेषता है: यह किसी विचारधारा पर नहीं, बल्कि एक घटना पर टिका है, जो या तो हुई या नहीं हुई। परमेश्वर ने अपने आपको इतिहास के हवाले कर दिया। वे यह नहीं कहते, "मुझ पर भरोसा करो, चाहे कुछ भी हुआ हो।" वे कहते हैं, "मैंने कब्र खोली, जाँच लो।" यह एक ऐसा परमेश्वर है जो खुद को झुठलाए जाने का जोखिम उठाता है।
सूत्र
पौलुस पहले ही कह चुके हैं कि यह सब "पवित्रशास्त्र के अनुसार" हुआ। यानी पुनरुत्थान कोई आपातकालीन योजना नहीं थी। पूरे पुराने नियम में परमेश्वर की एक ही आदत दिखती है: वे बंजर कोख से जाति खड़ी करते हैं, गुलामों की भीड़ से प्रजा, और सूखी हड्डियों से सेना। मृत्यु उनके लिए आखिरी शब्द कभी नहीं रही। इसलिए जब पौलुस आगे मसीह को "पहला फल" कहते हैं, तो वे फसल की भाषा उठा रहे हैं: पहली बालियाँ इसलिए काटी जाती थीं क्योंकि पूरा खेत पकने वाला है। मसीह का जी उठना अकेली घटना नहीं, बल्कि शुरुआत है। अगर वह पहला दाना नहीं उगा, तो खेत की बात करना बेमानी है।
दर्पण
अब सवाल आप पर आता है। आप जो हर सुबह पढ़ते हैं, जो समूह चलाते हैं, जो रविवार की तैयारी में घंटे लगाते हैं: क्या वह इसलिए कि इससे आपका जीवन संतुलित रहता है, या इसलिए कि एक कब्र सचमुच खाली मिली थी? पौलुस आपको यह बीच का रास्ता नहीं देते कि "विश्वास से मुझे शांति मिलती है, बाकी बातें गौण हैं।" वे कहते हैं: अगर वह नहीं जी उठा, तो आपकी शांति एक अच्छी तरह से सजाया गया खालीपन है। यह चुभता है, क्योंकि हममें से बहुत लोग धर्म को इसलिए थामे रहते हैं कि उसके बिना बच्चों को क्या सिखाएँगे, माता-पिता क्या कहेंगे, अपनी पहचान कहाँ रखेंगे। पर एक कब्र के किनारे खड़े होकर, जहाँ आपने किसी को उतारा है, वे सारे कारण एक साथ चुप हो जाते हैं। वहाँ केवल एक ही प्रश्न बचता है, और पौलुस उसी को पूछने की हिम्मत देते हैं।
मुख्य पात्र
पौलुस यहाँ अजीब तरह से निहत्थे खड़े हैं। वे अभी-अभी कह चुके थे कि उन्होंने "उन सबसे बढ़कर परिश्रम भी किया", और अब खुद ही कह रहे हैं कि वह सारा परिश्रम खाली हो सकता है। ऐसा आदमी जिसने कोड़े खाए, जहाज़ टूटते देखे, कलीसियाएँ खड़ी कीं, वह अपने पूरे जीवन को एक ही शर्त पर दाँव पर लगा देता है। यह आत्मविश्वास नहीं, ईमानदारी है। पौलुस को अपनी सेवा से नहीं, अपने प्रभु से चिपकना आता था। और शायद इसीलिए वे इतनी बेबाकी से बोल सके: जिस आदमी ने दमिश्क की सड़क पर जीवित मसीह को देखा हो, उसे तर्क के सहारे अपना विश्वास बचाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
संदर्भ
कुरिन्थुस एक बंदरगाह शहर था, यूनानी संस्कृति में भीगा हुआ, जहाँ पढ़े-लिखे लोगों के लिए आत्मा की अमरता स्वीकार्य थी पर शरीर का जी उठना हास्यास्पद। शरीर को वे कैद समझते थे, जिससे मरकर छुटकारा मिलता है। इसलिए कलीसिया के कुछ लोगों ने बीच का रास्ता निकाला: मसीह के बारे में सुंदर बातें रखो, पर "मरे हुओं का पुनरुत्थान है ही नहीं" वाली अटपटी शिक्षा छोड़ दो। यह समझौता सामाजिक रूप से समझदारी भरा था; इससे बाज़ार और अखाड़े में शर्मिंदगी नहीं उठानी पड़ती। पौलुस इस समझौते की जड़ काट देते हैं: अगर मुर्दे नहीं उठते, तो मसीह भी नहीं उठा, और तब सब कुछ ढह जाता है।
पाठकों की तस्वीर
वे लोग यह पत्र सुनते हुए असहज हुए होंगे, क्योंकि पौलुस उनकी बौद्धिक इज़्ज़त पर हाथ रख रहे थे। जिस बात से वे शहर में सम्मानित बने रह सकते थे, उसी को पौलुस खोखलेपन का रास्ता बता रहे थे। साथ ही उनमें से कई गुलाम थे, मजदूर थे, जिनका शरीर रोज़ पिसता था। उनके लिए यह खबर कि शरीर बचाया जाएगा, फेंका नहीं जाएगा, केवल सिद्धांत नहीं थी। यह उनके थके हुए हाथों के बारे में वादा था। और जब पौलुस अध्याय के अंत में कहते हैं कि "तुम्हारा परिश्रम प्रभु में व्यर्थ नहीं है", तो वे उसी शब्द को उलट देते हैं जिससे उन्होंने डराया था। खाली या भरा, यही चुनाव है।
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अगर आपको कल पता चले कि कब्र खाली नहीं थी, तो आपके जीवन में असल में क्या बदलेगा, और यह उत्तर आपके विश्वास के बारे में क्या बताता है?
आप किन कारणों से मसीही बने हुए हैं जो पुनरुत्थान पर नहीं, बल्कि आदत, पहचान या दूसरों की उम्मीदों पर टिके हैं?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आपके वचन के अनुसार प्रभु में हमारा परिश्रम व्यर्थ नहीं है। जो सेवा किसी की नज़र में नहीं आती, वह भी आपकी नज़र में सुरक्षित है। धन्यवाद कि आप हमें दृढ़ और अटल बनाए रखते हैं, और थकी हुई घड़ियों में भी काम करते रहने की शक्ति देते हैं।
पौलुस कहता है, "उसी के द्वारा तुम्हारा उद्धार भी होता है, यदि उस सुसमाचार को जो मैंने तुम्हें सुनाया था, स्मरण रखते हो।" ध्यान दे, बात नए अनुभव की नहीं, थामे रहने की है। जो सच तूने पहले दिन सुना था, वही आज भी तुझे संभालता है। सवाल यह है कि क्या तू उसे अब भी पकड़े हुए है, या धीरे धीरे हाथ ढीला हो गया?
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