मत्ती 19
पाठ
यीशु गलील छोड़कर यरदन के पार यहूदिया पहुँचते हैं, और वहाँ फरीसी एक फंदा लेकर आते हैं: क्या हर कारण से पत्नी को त्यागना उचित है? उनका उत्तर मूसा की व्यवस्था से नहीं, बल्कि सृष्टि के आरम्भ से आता है। इसके बाद तीन दृश्य एक के बाद एक आते हैं: बालकों को आशीष मिलती है जबकि चेले उन्हें डाँटते हैं, एक धनी जवान आज्ञाओं की सूची लेकर आता है और उदास होकर लौट जाता है, और पतरस हिसाब माँगता है, "हमें क्या मिलेगा?" अध्याय एक चेतावनी पर खत्म होता है जो सब कुछ उलट देती है: पहले पिछले होंगे, पिछले पहले।
मर्म
इस पूरे अध्याय का धागा एक शब्द है: "आरम्भ"। फरीसी व्यवस्था के भीतर रियायतें खोज रहे थे, और यीशु उन्हें रियायत से पीछे, सृष्टि की मूल मंशा तक ले जाते हैं। मूसा का त्यागपत्र परमेश्वर की इच्छा नहीं था, वह "मन की कठोरता" के कारण दी गई सीमा थी, एक पट्टी जो घाव को स्वीकार करती है पर उसे अच्छा नहीं कहती। यही तर्क धन पर भी लागू होता है: जो वस्तु व्यवस्था में आशीष की निशानी थी, वह राज्य में अड़चन बन जाती है। परमेश्वर जो माँगते हैं वह मनुष्य की पहुँच के बाहर है, और इसीलिए वचन २६ पूरे अध्याय का केंद्र है: "मनुष्यों से तो यह नहीं हो सकता, परन्तु परमेश्वर से सब कुछ हो सकता है।" उद्धार योग्यता नहीं, सृजनकर्ता का काम है।
सूत्र
"आरम्भ से नर और नारी" कहकर यीशु उत्पत्ति के पहले दो अध्यायों को एक साथ पढ़ते हैं और उन्हें विवाह की नींव बनाते हैं। पर गौर कीजिए: वे न केवल आदि की ओर देखते हैं, बल्कि अंत की ओर भी। वचन २८ में "नई उत्पत्ति" का शब्द आता है, वही सृष्टि जो नबियों ने नए आकाश और नई पृथ्वी के रूप में देखी थी। मसीह वह हैं जो टूटी हुई सृष्टि को उसकी मूल मंशा में लौटाते हैं, और बारह सिंहासन इस्राएल के बारह गोत्रों के पुनर्गठन की ओर इशारा करते हैं। जो धनी जवान अपनी सम्पत्ति नहीं छोड़ सका, उसके सामने वही खड़े थे जिन्होंने स्वर्ग की सारी महिमा छोड़ दी थी। क्रूस ही वह जगह है जहाँ "परमेश्वर से सब कुछ हो सकता है" साकार होता है।
दर्पण
यह अध्याय दो जगह चुभता है। पहला, हम भी "हर एक कारण" की तलाश में माहिर हैं: वह सीमा कहाँ है जिसके भीतर रहकर मैं तकनीकी रूप से सही रहूँ? रिश्ते में, अनुबंध में, कर के विवरण में, यह प्रश्न बहुत सभ्य लगता है और बहुत कठोर हृदय से निकलता है। दूसरा, धनी जवान। उसने कुछ गलत नहीं किया था; उसकी सूची साफ थी। फिर भी एक चीज़ उसके और यीशु के बीच खड़ी थी, और वह चीज़ बुरी नहीं, बस प्यारी थी। आपके जीवन में वह क्या है जिसे छोड़ने की बात सुनकर आप चुपचाप बातचीत बदल देते हैं?
आज, दिन खत्म होने से पहले, कागज़ पर वह एक चीज़ लिख लीजिए जिसके बिना आप अपने भविष्य की कल्पना नहीं कर सकते, और उसे परमेश्वर के सामने ज़ोर से पढ़कर कहिए: "यह मेरा नहीं, आपका है।"
अंतर्पाठ
फरीसियों का प्रश्न व्यवस्थाविवरण २४ पर टिका था, जहाँ त्यागपत्र का उल्लेख है; उनके स्कूलों में बहस यही थी कि "कुछ लज्जा की बात" का अर्थ क्या है। यीशु उस बहस में घुसने से इनकार करते हैं और उत्पत्ति पर लौट जाते हैं, मानो कह रहे हों कि व्यवस्था की धारा से पहले परमेश्वर का डिज़ाइन आता है। मलाकी २ में परमेश्वर कहते हैं कि वे त्याग से घृणा करते हैं और विवाह को वाचा कहते हैं, और यीशु उसी स्वर को और तीखा करते हैं। फिर तनाव भी देखिए: भजनों और नीतिवचनों में धन अक्सर आशीष की निशानी है, पर यहाँ ऊँट और सूई का नाका उसे बाधा बना देता है। और "पहले पिछले होंगे" वाला वचन तुरन्त अगले अध्याय की दाख की बारी की कहानी में खुलता है, जहाँ मज़दूरी हिसाब से नहीं, मालिक की उदारता से मिलती है। पतरस के "हमें क्या मिलेगा?" का यही उत्तर है।
मुख्य पात्र
यीशु इस अध्याय में एक साथ बहुत कोमल और बहुत बेरहम हैं, और यही उनका चरित्र है। वे भीड़ को चंगा करते हैं, बालकों को गोद में लेने के लिए चेलों को टोकते हैं, और धनी जवान से बात करते समय उसे नीचा नहीं दिखाते। फिर भी वे रियायत नहीं देते। वे जानते हैं कि जवान को क्या चाहिए और ठीक वही माँगते हैं, और जब वह उदास होकर चला जाता है, वे उसे वापस बुलाने के लिए शर्तें ढीली नहीं करते। यही प्रेम है जो समझौता नहीं करता। साथ ही वे नपुंसकों की बात करते समय समाज के सबसे अपमानित वर्ग को राज्य के भीतर जगह देते हैं। जो कठोर लगते हैं, वही सबसे ज़्यादा जगह बनाते हैं।
श्रोता
मत्ती के पहले पाठक मुख्यतः यहूदी पृष्ठभूमि के मसीही थे, जो आराधनालय से कटने का दर्द जानते थे। उनके लिए "घरों या भाइयों या बहनों या पिता या माता" छोड़ने की बात रूपक नहीं थी; यह उनका असली अनुभव था, परिवार से बहिष्कृत होना। वचन २९ का सौ गुना वादा उनके लिए नई कलीसिया थी जो उनका नया परिवार बनी। "बारह सिंहासन" सुनकर उन्हें राहत मिली होगी: भले आज हम अल्पसंख्यक और बेघर हों, इस्राएल का भविष्य उन्हीं के हाथ में है जो इस रब्बी के पीछे चले। और संतानहीनता जिस संस्कृति में अभिशाप मानी जाती थी, वहाँ "स्वर्ग के राज्य के लिये" अविवाहित रहने वालों को सम्मानित स्थान देना क्रांतिकारी था।
चिंतन
वह कौन सा प्रश्न है जो मैं परमेश्वर से इसलिए पूछता हूँ कि सीमा जान सकूँ, न कि इसलिए कि उनकी मंशा जान सकूँ?
अगर मैं पतरस की जगह होता, तो "हमें क्या मिलेगा?" के बजाय क्या पूछता, और यह प्रश्न मेरे हृदय के बारे में क्या बताता है?
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Matthew 19 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, तूने बच्चों को अपने पास आने से कभी नहीं रोका। मुझे भी वैसा ही सरल और भरोसेमंद मन दे, जो बिना शर्त तेरी गोद में बैठ जाए। और जब कोई छोटा या कमज़ोर तेरी ओर बढ़े, मैं रुकावट नहीं, रास्ता बनूँ।
चेलों ने हल्के मन से कहा था कि विवाह न करना ही अच्छा है, पर यीशु ने कोई सस्ता जवाब नहीं दिया। उन्होंने तीन तरह के जीवन गिनाए: कोई जन्म से ऐसा, किसी को लोगों ने ऐसा बना दिया, और कोई स्वर्ग के राज्य के लिए खुद ऐसा बना। फिर कहा, "जो इसे ग्रहण कर सकता है, वह ग्रहण करे।" हर अकेलापन चुना हुआ नहीं होता। पर जो जीवन तुझे अधूरा लगता है, वह उसके हाथों में व्यर्थ नहीं।
पिता, जो रिश्ता आपने अपने हाथों से जोड़ा है, उसे संभालने की समझ हमें दीजिए। जहाँ दूरियाँ बढ़ी हैं, वहाँ फिर से नज़दीकी लाइए। हमारे बीच जो टूटता है, उसे आपका प्रेम जोड़ दे, और हम एक होकर आपकी छाया में चलते रहें।
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